पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ६७
द्वादसो दिवस दिन चल्ल करि । चउद्द खद्द कीनी नृपति ॥
' जित तिनह दिप्पि तिहि सन दुचित्त । न चिय राज कछु छिन विपति ॥
छं० ॥ ४८४ ॥ रू० ॥ २३८ ॥
पद्धरी ॥ वर विसन्न लोक पुक्कर प्रकास । सुर नर सु नाग रिषि सुनि अवास ॥
धर धरन करम सुभ परम पाइ । जय सुर चवंत गुन अगम गाइ ॥ छं० ॥ ४८५ ॥
निर्तिय अगनवार दिन कर प्रकास । गय दार तपनि करि कपट पास ॥
तन रचित नीर उर ध्यान देव । नृप मानि रहस करि वर अभेव ॥ छं० ॥ ४८६ ॥
वाँढ विकल झाझ तम धूम नैन । गछि कुस सकुथ्य दइ दुसिप वैन ॥
धर चरति अंग जल धार भार । हथ पटक गंग जट समुष पार ॥ छं० ॥ ४८७ ॥
धरि ध्यान ध्यान तिन अगनि ईस । पंडे सु जग्गि तंपे जगीस ॥
रवि पहस पाय सासन सरूढ । उर धरे देव तिन देव गूढ ॥ छं० ॥ ४८८ ॥
जुग पानि नाभि ताली उगांय । रमि द्रिष्ट द्रिष्ट गिरि वंभ राय ॥
तिर पुटिय भाल शिल कमलम्मूर । इह भांति ताव तप तपनि जूर ॥ छं० ॥ ४८९ ॥
तप चवन्न मुक्कि किय विरथ काम । कर मंखि राज मुक्कु आप ताम ॥
छं० ॥ ४९० ॥ रू० ॥ २३९ ॥
दूहा ॥ पुची वनिक सराप दिय । अर पुक्कर नर लोइ ॥
असुर होइ बीसल नृपति । नरपञ्चारी सोइ ॥
छं० ॥ ४९१ ॥ रू० ॥ २४० ॥
॥ गौरी का बीसलदेवजी को भयभीत देखकर कहना कि
तुम्हारा पोता तुम्हारी सुकीर्त्ति करै ॥
दूहा ॥ दिष्पि राज भय भीत तन । तन मंन धूजत तथ्य ॥
मो उद्धारन पय गहन । कथ कुसुमन वर कथ्य ॥
छं० ॥ ४९२ ॥ रू० ॥ २४१ ॥
२३९ पाठान्तरः-वर । प्रकाश । रिप । करकम । पाय । गाय । अनग । चिन कर । ध्यान ।
ज्वाल । नैन । कुश । सकुथ । दय । बैन । बैन । हरत । पिट्टि । ध्यान ध्यान । जंगि । तंडे ।
तंभे । सुष्ट । पांनि । नाभा । द्रष्टि द्रष्टि । राइ । तरपटीय शील शिल कमल मूल । नांति ।
तप प्रवल मुनिं कियय विरथ वंम । सराप । तांम ॥
२४०-४१ पाठान्तरः-वर्णिक । उपति । नर भषन करे सोय ॥ २४० ॥ दिपि । तथ । कथ ।
कुसुम । चर । कथ ॥ २४१ ॥