पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९८ पृथ्वीराजरासौ ! [ आदि पर्व
दूहा ॥ तो सुत्र सुत्त उद्दार मति । गति तिन देव प्रकास ॥
धर मंडन डंडन भरन । सो तुम कर हु सु वास ॥
कूं० ॥ ४८३ ॥ रु० ॥ २४२ ॥
॥ तपस्वनी के कोप से बीसलदेवजी का सांप के काटने से
अलोप होना ॥
कवित्त ॥ सपत दिवस अनुसिष्ष । सुष्ष मधि दिग्ग प्रजारिय ॥
असि विष वड़ैन अंग । अगनि गन दनुज उदारिय ॥
सहस अङ्ग तन बङ्ग । झार मुष चार विकारिनि ।
सर्व असन करि असम । सैन छिन चैन निकारनि ॥
आहुट्ठ दीघ साहुट्ठ मधि । पलप पदम बिन कदम बिन ॥
गृह गवरि ग्यान गन गल्ह करि । रम्य राज आरन्न छिन ॥
कूं० ॥ ४८४ ॥ रु० ॥ २४३ ॥
दूहा ॥ भय दिवाच आहुट्ठ दुति । तप सरनी कौ दोष ॥
जल बेली विहु ब्राग विष । ते छिन भये अलोप ॥
कूं० ॥ ४८५ ॥ रु० ॥ २४४ ॥
॥ जिस तपस्वनी के शाप से बीसलदेवजी असुर हुए उस के
तप का आना की मा सविस्तर वर्णन करती है ॥
दूहा ॥ सुनंच पुत्त तिन तपनि तप । भिन्न भिन्न परिमान ॥
जिद्दि दुसिष्ष नृप असुर हुअ । रच्यौ सवर बुरमान ॥
कूं० ॥ ४८६ ॥ रु० ॥ १४५ ॥
बनिक पुच्च मन इम धरिय । मो पति ताप अपार ॥
जो तप्पह मंडौं प्रबख । तौ कुछौं संसार ॥
कूं० ॥ ४८७ ॥ रु० ॥ २४६ ॥
२४२ पाठान्तर :- सुत सुत । उद्दार । मंड ॥
२४३ पाठान्तर :- अनुसिष । सुष । द्विग । उद् भच्चिय । वार । विकारनि । सैन । चैन ।
आहुठ । साहुठ । ग्यांन । गल्ह । आरंन ॥
२४४-४६ पाठान्तर :- भये । भए । आंगुठ । कौ । कोपु । विहुं । वृष । भए ॥ २४४ ॥
भिंने । भिंन । परिमांन । जिहिं । दुसिष । नृप । भय । वरमांन ॥ २४५ ॥ धरीय । मो तन पाप
अपार । मो पित ताप अपार । जो तप मंडौ निय प्रवल ॥ २४६ ॥