पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ]
रच्यौ चार चिय सङ्गि । मडि चिय चार सु रंमिय ॥
नूपुर पय सो अवंत । अवत नूपुर पय अंगियं ॥
अविसय न पुहप घन बन रसिय । रसय बनी घन पुफ्फ सुम ॥
भू इंद रचसि रक्सि वस रमिय । बीसल रस भू इंद रम ॥
छं० ॥ ४७९ ॥ रु० ॥ २३३ ॥
॥ पुष्कर की तपस्वनी की बीसलदेवजी के प्रति अरदासि ॥
दूहा ॥ हैं राजंन मंगो थहै। इह मेरी अरदासि ॥
पुहकर की कहै तपसनी । रूप रंग की रासि ॥
छं० ॥ ४८० ॥ रु० ॥ २३४ ॥
अरिल्ला ॥ पिच सनेह सपूत सवांनिय । देवनि भूमिन संब संमानिय ॥
खो रति मांन थरैं घन डंबर । असय मडि निज उज्जलं अंबर ॥
छं० ॥ ४८१ ॥ रु० ॥ २३५ ॥
दूहां ॥ उज्जलं पष दसमीं दिवस । अह दसरथ के नंद ॥
नयर वंइ अर कंथ दस । रुचिकै किए निकंद ॥
छं० ॥ ४८२ ॥ रु० ॥ २३६ ॥
दीप माल दीप सुरग । ग्रह ग्रह महखं अवास ॥
हरिपुर हर मानत मनह । चितवत चिंतत वास ॥
छं० ॥ ४८३ ॥ रु० ॥ २३७ ॥
॥ बीसलदेवजी का पुष्कर में बनिकसुता गौरी का सतीत्व भ्रष्ट
करना और उस का उन को दानव होने का शाप देना ॥
कवित्त ॥ एकादसमी दिवस । देव नर नाग सब्ब मिल ॥
सुर सक्कव तजि वास । आनि पुहकर प्रसाद पिल्ल ॥
तहां बनिक नंदिनी । पुत्रि गवरी तप मंढौ ॥
दिषि ता ह बीसल नरिंद । बढि मार प्रचंढौ ॥
२३४-३७ पाठान्तर :- हों। इहै। अरदास । दै । तपशनी ॥ २३४ ॥ मुरिल्ल । सवांनिय ।
सवांनीय । संवानीय । सब । समानिय । मांन । मधि । उज़ल ॥ २३५ ॥ नैर । बध । अरि ।
निकंव ॥ २३६ ॥ सुरंम । चिंतवत्त ॥ २३७ ॥
२३८ पाठान्तर :- एकादशमी । द्वाव । मिलि । पास । आंनि । पिलि । देषि । द्वादशी ।
असू । सद । तितहिं । दिंषिति । तहु । मंन । कहुं ॥