पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 106, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ६५
॥ बीसलदेवजी का पीछा अजमेर आना और वहां उन का
हास होना ॥
दूहा ॥ इह विधि मंड्यौ राज वरि । जव्य वणिक अजमेर ॥
वरष चयोदस मद्धि वय । भयौ हास सब नैर ॥
छं० ॥ ४७३ ॥ रु० ॥ २३० ॥
॥ बणिकसुता गौरी का पुष्कर में तप करना और बीसलदेवजी
का उस पर मोहित होना ॥
पद्धरी ॥ आषाढ मास उज्जाल पष्व । दिन तोय सोम वंदन सरुष्प ॥
सटिवाय गज्जि नीसांन गैन । अति उंच मंडि न्रिप अवधि छैन ॥ छं० ॥ ४७४ ॥
किलकांत उपन्न आकान्त अभ्भ । वियुस्यौ मद्धि जन्न पहुमि गब्भ ॥
विल्लसंत राज तिय देव साथ । निकसै बार कहु एक भाय ॥ छं० ॥ ४७५ ॥
चिहुँ कोद घूम घन पुब्ब पूर । दिन पांच आनि दरसाइ सूर ॥
रस वार सोम वीरंम दिन्न । ते वंस सेव जन वंद किन्न ॥ छं० ॥ ४७६ ॥
सो षंड मास लगि रत स मान । घर घरे धुंम जन्न मद्दिर आन ॥
छं० ॥ ४७७ ॥ रु० ॥ २३१ ॥
साटक ॥ स्यामंगं रवरंग अंग रवनी । अनी सु रंगेसवे ॥
साहंसं सक पाइ राइ सुगता । जुग्ता सरित्तारणे ॥
नीलं वास वनूर बंध विधना । चरि चार् धारा तनं ॥
भूमिं संकि स्वधीन पुन्य तनयं । देवा रहस्सं मनं ॥
छं० ॥ ४७८ ॥ रु० ॥ २३२ ॥
कवित्त ॥ धरतिय धरि उर वास । वास धर उर तिय धारिय ॥
दिग कज्जल लगि धार । धार कज्जल दिग धारिय ॥
२३० पाठान्तर :-परि । मधि ॥
२३१ पाठान्तर :-उजास । पष । सुरुप्प । सरूष । मिटिंबाय । गज । नीसांन । गैन । उंच ।
वैन । उपज्ल । अभ्र । वियूस्यौ । मधि । पुहमि । गभ । निकसै । चिहुं । धुंमि । पुब । पंच । दरसाई ।
विरंम । दिनं । तैं । बंध । किन । स नाभ । आभ ॥
२३२ पाठान्तर :-स्यामांगं । अवनी । पाय । जुगता । सरितारण । विधिना । हार । भूमि ॥
२३३ पाठान्तर :-धरतिय उर । धारि । मधि । हिय । रंगिय । नूपर । सा । पुहुप । पहुप ।
रहस्सि ॥