प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
६० प्रत्यभिज्ञाहृदय
'सर्वेषां चार्वाकादिदर्शनानां 'स्थितयः'-सिद्धान्ताः 'तस्य' एतस्य
आत्मनो नटस्येव स्वेच्छावगृहीताः कृत्रिमा 'भूमिकाः' ।
तथा च
'चैतन्यविशिष्टं शरीरमात्मा ।'
इति चार्वाकाः
नैयायिकादयो ज्ञानादिगुणगणाश्रयं बुद्धितत्त्वप्रायमेव आत्मानं
संसृतौ मन्यन्ते, अपवर्गे तु तदुच्छेदे शून्यप्रायम् ।
अहंप्रतीतिप्रत्येयः सुखदुःखाद्युपाधिभिः तिरस्कृतः आत्मा-इति
मन्वाना मीमांसा अपि बुद्धावेव निविष्टाः ।
ज्ञानसंतान एव तत्त्वम्-इति सौगता बुद्धिवृत्तिषु एव पर्यवसिताः ।
प्राण एव आत्मा-इति केचित् श्रुत्यन्तविदः ।
भाष्य :--सर्वदर्शन स्थितयः सर्वेषां दर्शनानां स्थितयः । अर्थात् सब
दर्शनों-चार्वाक आदि दर्शनों की स्थितियां । स्थितियां का अर्थ है सिद्धान्त
तद्भूमिकाः--तस्य भूमिकाः अर्थात् उस (आत्मा) की नट के समान अपनी
इच्छा से गृहीत कृत्रिम भूमिकाएँ । पूरे सूत्र का तात्पर्य है--
सभी दर्शनों के सिद्धांत आत्मा की नट के समान अपनी इच्छा से गृहीत
कृत्रिम भूमिकाएँ हैं ।
चार्वाक मतानुयायी कहते हैं-चैतन्य से विशिष्ट शरीर ही आत्मा है ।
नैयायिक (न्याय दर्शन के सिद्धान्त को माननेवाले) इत्यादि❊ संसार दशा
में ज्ञान इत्यादि गुणसमूहों के आधार बुद्धि तत्त्व को ही प्रायः आत्मा मानते
हैं । अपवर्ग अर्थात् मोक्ष दशा में जब बुद्धि का उच्छेद हो जाता है (अर्थात्
जब बुद्धि नहीं रह जाती) तब वे आत्मा को प्रायः शून्य ही समझते हैं ।
जो अहं (मैं) की प्रतीति से जाना जाता है और सुखदुःखादि
उपाधियों६४ के ढका हुआ हैं वह आत्मा है-ऐसा माननेवाले मीमांसक लोग
भी बुद्धि में ही चिपटे हुए हैं (अर्थात् बुद्धि को ही आत्मा समझते हैं) ।
सुगत६५ के अनुयायी ज्ञानसन्तति (ज्ञान के सतत प्रवाह) को ही तत्त्व
मानते हैं । इसलिए उनके दर्शन का भी बुद्धि के व्यापार में ही पर्यवसान हैं ।
कुछ वेदान्त के जानकार कहते हैं कि प्राण ही आत्मा है ।
❊ इत्यादि से वैशेषिक समझना चाहिए ।
प्रत्यभिज्ञाहृदय ६१
असदेव इदमासीत्-इत्यभावब्रह्मवादिनः शून्यभुवमवगाह्य स्थिताः ।
माध्यमिका अपि एवमेव ।
परा प्रकृतिः भगवान् वासुदेवः तद्विस्फुलिङ्गप्राया एव जीवाः-
इति पाञ्चरात्राः परस्या प्रकृतेः परिणामाभ्युपगमात् अव्यक्ते एव
अभिनिविष्टाः ।
सांख्यादयस्तु विज्ञानाकलप्रायां भूमिम् अवलम्बन्ते ।
सदेव इदमग्र आसीत्-इति ईश्वरतत्त्वपदमाश्रिता अपरे
श्रुत्यन्तविदः ।
शब्दब्रह्ममयं पश्यन्तीरूपम् आत्मतत्त्वम्-इति वैयाकरणाः श्रीसदा-
शिवपदमध्यासिताः । एवमन्यदपि अनुमन्तव्यम् । एतच्च आगमेषु
(उपनिषद् में जो यह कहा गया है कि) यह सब कुछ (पहले) असत् ही
था । (इसके आधार पर कुछ वेदान्ती) जो अभाव को ही ब्रह्म कहते हैं वे
शून्यपद में ही प्रवेश कर स्थित हैं ।
माध्यमिक ६६ लोग भी इसी प्रकार हैं (इसी दशा में हैं) । पांचरात्रों ६७
का कहना है कि भगवान् वासुदेव ही सबसे उत्कृष्ट प्रकृति (कारण) हैं ।
जीव उनकी चिनगारी की तरह ही हैं । अतः जीव को परा (सर्वोत्कृष्ट)
प्रकृति के परिणाम ६९ मानने के कारण वे अव्यक्त ७० में ही चिपटे हुए हैं ।
सांख्य ७१ इत्यादि प्रायः विज्ञानाकल ७२ भूमि का आश्रय लेते हैं ।
पहले यह सत् ही था— (इस उपनिषद् वाक्य के आधार पर) दूसरे
वेदान्ती लोग ईश्वर तत्त्व पद पर आश्रित रहते हैं (अर्थात् ईश्वरतत्त्व को
सर्वोच्च पद मानते हैं) ।
वैयाकरण ७३ लोग आत्मतत्त्व पश्यन्ती ७४ रूप में शब्द ब्रह्ममय ७५ है—
यह मानते हुए सदाशिव पद में ही भटके रहते हैं (अर्थात् सदाशिव पद को
ही परमार्थ समझ बैठते हैं) ।
इसी प्रकार अन्य दर्शनों के विषय में भी अनुमान कर लेना चाहिए
(कि वे त्रिक दर्शन के एक अंश तक ही परिसीमित हैं)। यही बात आगमों ७६
में भी (निम्नलिखित शब्दों में) कही गई है :
६२ प्रत्यभिज्ञाहृदय
'बुद्धितत्त्वे स्थिता बौद्धा गुणेष्वेवार्हताः स्थिताः ।
स्थिता वेदविदः पुंसि अव्यक्ते पाञ्चरात्रिकाः ॥
इत्यादिना निरूपितम् ।
विश्वोत्तीर्णमात्मतत्त्वम्-इति तान्त्रिकाः ।
विश्वमयम् इति-कुलाद्याम्नायनिविष्टाः ।
विश्वोत्तीर्णं विश्वमयं च-इति त्रिकादिदर्शनविदः ।
एवम् एकस्यैव चिदात्मनो भगवतः स्वातन्त्र्यावभासिताः सर्वा इमा
भूमिकाः स्वातन्त्र्यप्रच्छादनोन्मीलनतारतम्यभेदिताः । अत एक एव
एतावद्व्याप्तिक आत्मा । मितदृष्टयस्तु अंशांशिकासु तदिच्छयैव अभिमानं
ग्राहिताः, येन देहादिषु भूमिषु पूर्वपूर्वप्रमातृव्याप्तिसारताप्रथायामपि
उक्तरूपां महाव्याप्तिं परशक्तिपातं विना न लभन्ते । यथोक्तम्
बौद्ध बुद्धितत्त्व में स्थित हैं, आर्हंत७७ गुणों में, वेदविद् पुरुष में, और
पांचरात्रिक७८ अव्यक्त में स्थित हैं—
तांत्रिक७९ यह कहते हैं कि आत्मतत्त्व विश्व से परे है। कुल आदि८०
आम्नायों (आध्यात्मिक शास्त्रों) में जिनका अनुराग है वे आत्मतत्त्व को
विश्वमय कहते हैं ।
त्रिकादि८१ दर्शनके जानने वाले कहते हैं कि आत्मतत्त्व विश्व से परे भी
है और विश्वमय भी है ।
इस प्रकार जितने शास्त्र हैं वे सब चित् रूपी भगवान् की विभिन्न
भूमिकाएँ हैं जिनको भगवान् अपने स्वातंत्र्य से प्रदर्शित करते हैं । इन भूमि-
काओं के भेद उसी स्वातंत्र्य के आत्मगोपन और आत्म प्रकाशन के तारतम्य
के कारण हैं। अतः एक ही आत्मा यहाँ तक (इन शास्त्रों की भूमिकाओं में)
व्याप्त है। जिनकी परिमित (सीमित) दृष्टि है वे एक एक अंश में उस
परमात्मा की इच्छा से भिन्न-भिन्न भूमिकाओं से तादात्म्य स्थापित कर
बैठते हैं और जब कि (शास्त्र द्वारा) यह स्पष्ट भी कर दिया जाता है कि
पहले के (वर्णित) प्रमाताओं की व्याप्ति का सार देह इत्यादि तक सीमित है
तब भी ऊपर कहे हुए (आत्मतत्त्व विश्व से परे और विश्वमय दोनों है)
महाव्याप्ति को पर (उच्चतम)८२ शक्तिपात के बिना नहीं प्राप्त कर
पाते। जैसा कि कहा गया है।
प्रत्यभिज्ञाहृदय ६३
'वैष्णवाद्यास्तु ये केचिद्विद्यारागेण रञ्जिताः ।
न विदन्ति परं देवं सर्वज्ञं ज्ञानशालिनम् ॥'
इति । तथा
'भ्रमयत्येव तान्माया ह्यमोक्षे मोक्षलिप्सया ।
इति ।
'त आत्मोपासकाः शैवं न गच्छन्ति परं पदम् ॥'
इति च ।
अपि च सर्वेषां दर्शनानां'-समस्तानां नीलसुखादिज्ञानानां याः
'स्थितयः'-अन्तर्मुखरूपा विश्रान्तयः ताः तद्भूमिकाः'-चिदानन्द-
वैष्णव इत्यादि जो (परिमित) विद्या' के रंग से रँगे हुए हैं उस परम
देव को नहीं जानते जो सर्वज्ञ है और ज्ञानस्वभाव वाला है। इसी प्रकार
(स्वच्छन्द तन्त्र के १० वें पटल, श्लोक ११४१ में कहा गया है कि)
यह माया ही जो उन लोगों को (जो कि अन्य मार्गों के अनुयायी हैं)
चक्कर में डाल देती हैं जो अमोक्ष (अन्य दर्शन और मार्ग जो मोक्ष नहीं
प्राप्त करा सकते) मैं मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं। और (नेत्र तन्त्र
८वें पटल के ३०वें श्लोक में कहा है)
“वे जो परिच्छिन्न (सीमित) को आत्मा समझ कर उसमें अनुराग
रखते हैं (अर्थात् जो देह बुद्धि इ० को आत्मा समझ कर उनमें अनुराग रखते
हैं) वे शिव रूपी परम पद को नहीं पहुँच सकते ।
और भी (अर्थात् इस सूत्र की एक दूसरी भी व्याख्या है)। सर्वेषां
दर्शनानां सब दर्शनों का अर्थात् नील सुख इत्यादि ज्ञानों का (इस दूसरी
व्याख्या में दर्शन का अर्थ ज्ञान-सरणि नहीं है, ज्ञान है अर्थात् बाह्यज्ञान जैसे
नील इत्यादि रंग, और आन्तर ज्ञान जैसे सुख इत्यादि) स्थितयः-स्थितियाँ
अर्थात् अन्तर्मुख रूप विश्रान्तियाँ (इस व्याख्या में स्थिति का अर्थ सिद्धान्त
नहीं, किन्तु अन्तर्मुख विश्रान्ति है)
तद्भूमिकाः-तत्-उसकी अर्थात् चिदानन्दघन रूपी आत्मस्वरूप की,
भूमिकाएँ अर्थात् अभिव्यक्ति के उपाय (इस व्याख्या में भूमिका का अर्थ
अवस्था या भेद नहीं है, किन्तु अभिव्यक्ति का उपाय है)।
६४ प्रत्यभिज्ञाहृदय
घनस्वात्मस्वरूपामिव्यक्त्युपायाः । तथा हि यदा यदा बहिर्मुखं रूपं
स्वरूपे विश्राम्यति, तदा तदा बाह्यवस्तूपसंहारः; अन्तः प्रशान्त-
पदावस्थितिः ; तत्तदुदेष्यत्सं वित्संतत्यासूत्रणम्; -इति सृष्टि-स्थितिसंहार-
मेलनरूपा इयं तुरीया संविद्भट्टारिका तत्तत्सृष्ट्यादि भेदान् उद्वमन्ती
संहरन्ती च, सदा पूर्णा च, कृशा च, उभयरूपा च अनुभयात्मा च,
अक्रममेव स्फुरन्ती स्थिता ।
इस व्याख्या के अनुसार पूरे सूत्र का अर्थ इस प्रकार हुआ । सब दर्शनों
(ज्ञानों) की स्थितियां अर्थात् अन्तर्मुख विश्रान्तियाँ उसकी अर्थात् उस
शिव रूपी आत्मा की जिसका स्वरूप चित् और आनन्दघन है भूमिकाएँ
अर्थात् अभिव्यक्ति के उपाय हैं। जब जब (ज्ञान का) बहिर्मुख रूप स्वरूप
में अर्थात् ज्ञाता के वास्तविक स्वभाव में विश्रान्ति प्राप्त करता है, तब-तब
बाह्य वस्तुओं का उपसंहार अर्थात् समाप्ति या निराकरण हो जाता है,
(दूसरे शब्दों में) तब-तब एक आन्तरिक शान्त पद में ठहराव हो जाता है
और भिन्न-भिन्न उदय होने वाले ज्ञान क्रमों का प्रारंभ भी यहीं से होता है-
इस प्रकार यह पूज्य तुरीया संवित् ८४ जो सृष्टि आदि भेदों को बाहर प्रकट
करती हुई, पुनः अपने भीतर उपसंहार करती हुई, सदा कृश होते हुए भी
पूर्ण रहती हुई, दोनों रूप में (कृश और पूर्ण दोनों रूप में) और वस्तुतः
इन दोनों में से किसी भी रूप में न रहती हुई, बिना क्रम के (अर्थात् सदा)
स्फुरण करती हुई स्थित है ।
[ कुल चार विकल्प हो सकते हैं-(१) पूर्ण, (२) कृश, (३) पूर्ण और
कृश दोनों एक साथ (४) न पूर्ण, न कृश । तुरीया इन चारों से परे हैं। भाव
यह है कि यद्यपि तुरीया से ही सब सृष्टि होती है जो कि यह सिद्ध करता है
कि सभी पदार्थ उसमें भरे पड़े हैं: इसलिए वह पूर्ण है और यद्यपि तुरीया
में ही सभी पदार्थों का संहार होता है अर्थात् तुरीया में ही सब पदार्थ समेट
लिए जाते हैं जिससे ऐसा लगता है कि वह कृश है और उसे सभी पदार्थों को
बटोर कर अपने को पूर्ण करना है, तथापि न वह कृश होती है, न पूर्ण ।
वह इन सब विकल्पों से परे हैं। तुरीया कोई भौतिक पदार्थ नहीं है जिसमें से
कुछ निकल जाता है तो वह खाली हो जाता है और वापिस आ जाता है,
तो भर जाता है। तुरीया तो एक संवित् शक्ति है जिसमें सृष्टि, स्थिति,
संहार के कारण न कुछ घटता है, न कुछ बढ़ता है ]
प्रत्यभिज्ञाहृदय ६५
उक्तं च श्रीप्रत्यभिज्ञाटीकायाम्—
'तावदर्थाविलेहेन उत्तिष्ठति, पूर्णा च भवति'
इति। एषा च भट्टारिका क्रमात्क्रमम् अधिकमनुशील्यमाना
स्वात्मसात्करोत्येव भक्तजनम् ॥ ८ ॥
यदि एवंभूतस्य आत्मनो विभूतिः, तत् कथम् अयं मलावृतः अणुः
कलादिवलितः संसारी अभिधीयते ? -इत्याह—
चिद्वत्तच्छक्तिसंकोचात् मलावृतः संसारी ॥६॥
यदा 'चिदात्मा'परमेश्वरः स्वस्वातान्त्र्यात् अभेदव्याप्तिं निमज्ज्य
भेदव्याप्तिम् अवलम्बते, तदा 'तदीया इच्छादिशक्तयः' असंकुचिता
अपि 'संकोचवत्यो भान्ति; तदानीमेव च अयं 'मलावृतः संसारी'
भवति। तथा च अप्रतिहतस्वातन्त्र्यरूपा इच्छाशक्तिः संकुचिता
श्री प्रत्यभिज्ञा टीका में कहा भी है।
अर्थों (पदार्थों, सभी प्रमेयों) को चाट लेने से अर्थात् ग्रास कर लेने से
वह उठती है अर्थात् अपने स्वरूप में स्फुरण करती है और इस प्रकार पूर्ण
होती है। यदि इस पूज्य चेतना का अधिक अनुशीलन किया जाय तो वह
भक्तों को क्रमशः अपने में मिला लेती है ॥ ८ ॥
यदि इस प्रकार वाले (जैसा कि ऊपर बतलाया गया है) आत्मा की
(ऐसी) विभूति (महत्ता) है, तो यह (आत्मा) कैसे मल ८५ से ढका
जाकर, कला ८६ इत्यादि कंचुकों से घेरा जाकर अणु (जीव) और संसारी
(एक जीवन से दूसरे जीवन में संसरण करने वाला) कहा जाता है?—
इस प्रश्न के उत्तर में यह कहते हैं :-
सूत्र ६—जो चित्स्वरूप है वह शक्ति के संकोच से मल से ढका हुआ
संसारी बन जाता है।
भाष्य—जब परमेश्वर जो चित्स्वरूप है अपने स्वातंत्र्य से अभेद को
लीन कर भेद का अवलम्बन करता है तब उसकी इच्छा तथा अन्य शक्तियाँ
स्वभावतः असंकुचित होते हुए भी संकुचित जैसी लगने लग जाती हैं, तब यह
जीव मल से ढका हुआ संसारी बन जाता है। इस प्रकार परमेश्वर की
६६ प्रत्यभिज्ञाहृदय
सती अपूर्णम्मन्यतारूपम् आणवं मलम् ; ज्ञानशक्तिः क्रमेण संकोचात्
भेदे सर्वज्ञत्वस्य किंचिज्ज्ञत्वाप्तेः अन्तःकरण-बुद्धीन्द्रियतापत्तिपूर्वकम्
अत्यन्तं संकोचग्रहणेन भिन्नवेद्यप्रथारूपं मायीयं मलम्; क्रियाशक्तिः
क्रमेण भेदे सर्वकर्तृत्वस्य किंचित्कर्तृत्वाप्तेः कर्मेन्द्रियरूप-संकोचग्रहण-
पूर्वम् अत्यन्तं परिमिततां प्राप्ता शुभाशुभानुष्ठानमयं कार्मं मलम् । तथा
सर्वकर्तृत्व-सर्वज्ञत्व-पूर्णत्व नित्यत्व-व्यापकत्वशक्तयः संकोचं गृह्णाना
यथाक्रमं कला-विद्या-राग-काल-नियतिरूपतया भान्ति । तथाविधश्च
अयं शक्तिदरिद्रः संसारी उच्यते ; स्वशक्तिविकासे तु शिव एव ॥ ६ ॥
ननु संसार्यवस्थायाम् अस्य किंचित् शिवतोचितम् अभिज्ञानमस्ति
येन शिव एव तथावस्थितः ?-इत्युद्घोष्यते 'अस्ति'-इत्याह
स्वातन्त्र्यरूप इच्छाशक्ति जो स्वरूपतः अबाध है संकुचित होकर आणव मल
बन जाती है जिसके द्वारा जीव अपने को अपूर्ण मानने लगता है । क्रम से
संकोच के कारण भेद की अवस्था में ज्ञान शक्ति का सर्वज्ञत्व किंचिज्ज्ञत्व को
पहुँच जाता है और अत्यन्त संकोच ग्रहण करने पर वह अन्तःकरण और
ज्ञानेन्द्रियों की अवस्था प्राप्त कर मायीयमल धारण कर लेती है जिसका
स्वभाव है सब वस्तुओं को भिन्न रूप में जानना । क्रम से भेद की अवस्था में
क्रियाशक्ति का सर्वकर्तृत्व ( सब कुछ कर लेने की शक्ति ) किंचित्कर्तृत्व
( कुछ ही करने की शक्ति ) की दशा को पहुँच जाता है और क्रियाशक्ति
कर्मेन्द्रियरूप संकोच को ग्रहण करके अत्यन्त परिमित अवस्था को प्राप्त
होकर कार्म मल^८८ को धारण कर लेती है जिसका स्वभाव है शुभ और
अशुभ कर्मों का करना । इसी प्रकार सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञत्व, पूर्णत्व, नित्यत्व,
व्यापकत्व शक्तियाँ संकोच ग्रहण करके यथाक्रम कला, विद्या, राग, काल,
और नियति के रूप में भान होती हैं ।^८९ इस रूप में यह जीव शक्ति में
दरिद्र होकर संसारी कहलाता है । अपनी शक्तियों के विकास होने पर तो
वह शिव ही है ॥ ६ ॥
प्रश्न यह है कि जब अणु ( जीव ) संसारी की अवस्था में रहता है तो
क्या उस अवस्था में शिवत्व के अनुरूप कोई ऐसी पहिचान है जिससे यह
जाना जा सके कि शिव ही इस प्रकार से ( अर्थात् संसारी की दशा में )
अवस्थित है ? शास्त्र यह घोषणा करता है कि हाँ, है । इसे ( आगे का
सूत्र ) कहता है :-
प्रत्यभिज्ञाहृदय ६७
तथापि तद्वत् पञ्च कृत्यानि करोति ॥ १० ॥
इह ईश्वराद्वयदर्शनस्य ब्रह्मवादिभ्यः अयमेव विशेषः, यत्
‘सृष्टिसंहारकर्तारं विलयस्थितिकारकम् ।
अनुग्रहकरं देवं प्रणतार्तिविनाशनम् ॥
इति श्रीमत्स्वच्छन्दादिशासनोक्तनीत्या सदा पञ्चविधकृत्यका-
रित्वं चिदात्मनो भगवतः । यथा च भगवान् शुद्धेतराध्वस्फारणाक्रमेण
स्वरूपविकासरूपाणि सृष्ट्यादीनि करोति, ‘तथा’ संकुचितचिच्छ-
क्तितया संसारभूमिकायामपि ‘पञ्चकृत्यानि’ विधत्ते । तथा हि
‘तदेवं व्यवहारेऽपि प्रभुर्देहादिमाविशन् ।
भान्तमेवान्तरर्थौघमिच्छया भासयेद्बहिः ॥’
इति प्रत्यभिज्ञाकारिकोक्तार्थदृष्ट्या देहप्राणादिपदम् आविशन्
चिद्रूपो महेश्वरो बहिर्मुखीभावावसरे नीलादिकमर्थं नियतदेशका-
सूत्र १०—इस दशा (संसारी की दशा) में भी उसी (शिव) के समान
जीव पाँच कृत्य करता है ।
यहाँ ईश्वराद्वयदर्शन ८९ का ब्रह्मवादियों ९१ से यह भेद है कि चित्स्व-
रूप भगवान् का श्रीमत् स्वच्छन्द इत्यादि शास्त्र में कहे हुए ढंग (निम्न-
लिखित) के अनुसार सदा पाँच प्रकार का कृत्य चलता रहता है: “मैं सृष्टि
और संहार को करनेवाले, विलय और स्थिति को करनेवाले अनुग्रह करने-
वाले और अपने सम्मुख नत (भक्त) के दुःख का नाश करनेवाले देव को
प्रणाम करता हूँ” (स्वच्छन्द तंत्र प्रथम पटल, तृतीय श्लोक) । जिस
प्रकार भगवान् अशुद्ध अध्वा ९२ में विस्तारक्रम से अपने स्वरूप का विकास
रूप सृष्टि इत्यादि करते हैं, वैसेही संकुचित चित् शक्ति से संसार दशा में
भी वह पंचकृत्य करते हैं । जैसा कहा गया है ।
“इस प्रकार व्यवहार दशा में भी प्रभु देह इत्यादि में प्रवेश कर अपने
भीतर प्रकाशमान अर्थ-समूह को अपनी इच्छा से बाहर व्यक्त करते हैं ।
(ई० प्र० ६-७) ।”
इस प्रकार प्रत्यभिज्ञा कारिका में कहे हुए अर्थ की दृष्टि से चिद्रूप
महेश्वर देहप्राण इत्यादि में प्रवेश करके बहिर्मुखीभाव के अवसर पर जब
६८ प्रत्यभिज्ञाहृदय
लादितया यदा आभासयति, तदा नियतदेशकालाद्याभासांशे अस्य
स्रष्टृता; अन्यदेशकालाद्याभासांशे अस्य संहर्तृता; नीलाद्याभासांशे
स्थापकता; भेदेन आभासांशे विलयकारिता; प्रकाशैक्येन प्रकाशने
अनुग्रहीतृता । यथा च सदा पञ्चविधकृत्यकारित्वं भगवतः, तथा
मया वितत्य स्पन्दसंदोहे निर्णीतम् ।
एवमिदं पञ्चविधकृत्यकारित्वम् आत्मीयं सदा दृढप्रतिपत्त्या
परिशील्यमानं माहेश्वर्यम् उन्मीलयत्येव भक्तिभाजाम् । अत एव ये
सदा एतत् परिशीलयन्ति, ते स्वरूपविकासमयं विश्वं जानाना जीव-
न्मुक्ता-इत्याम्नाताः । ये तु न तथा, ते सर्वतो विभिन्नं मेयजातं
पश्यन्तो बद्धात्मानः ॥ १० ॥
न च अयमेव प्रकारः पञ्चविधकृत्यकारित्वे, यावत् अन्योऽपि
कश्चित् रहस्यरूपोऽस्ति १-इत्याह
नील इत्यादि विषयों को नियत देश, काल इत्यादि में आभासित करते हैं,
तब नियत देश, काल इत्यादि में जो आभासित हो रहा है यह उनकी
सृष्टिक्रिया है; विषयों का अन्य देश और काल में आभासित होना उनकी
संहार क्रिया है। नील इत्यादि के आभास का बना रहना उनकी स्थापकता
अथवा स्थितिक्रिया है; भेद से आभास होना उनकी विलयक्रिया ९४ है और
विषयों का चित्प्रकाश के ऐक्य से प्रकाशित होना ९५ उनकी अनुग्रह
क्रिया है। भगवान् जिस प्रकार सदा पाँच प्रकार के कृत्य करते हैं उसे मैंने
विस्तारपूर्वक 'स्पन्दसंदोह' (नामक ग्रंथ) में स्पष्ट कर दिया है।
इस प्रकार अपने भीतर जो पाँच प्रकार का कृत्य चलता रहता है यदि
अच्छी तरह समझ कर उसका परिशीलन किया जाय तो वह भक्तजनों के
निकट प्रभु के महान् ऐश्वर्य को व्यक्त कर देता है। अतएव जो सदा इसका
परिशीलन करते हैं वे विश्व को चित् का विकास समझ कर जीवन्मुक्त हो
जाते हैं—ऐसा आम्नायों (परम्परागत शास्त्र) का कहना है। जो इस
प्रकार परिशीलन नहीं करते, वे सब ज्ञेय विषयों को भिन्न समझते हुए
बन्धन में ही पड़े रहते हैं ॥ १० ॥
पाँच प्रकार के कृत्य करने का केवल यही एक प्रकार नहीं है, दूसरा भी
रहस्यरूप (पंचकृत्य) है—इसे लिए अब सूत्रकार कहते हैं।
प्रत्यभिज्ञाहृदय ६६
आभासन-रक्ति-विमर्शन-बीजावस्थापन-
विलापनतस्तानि ।।११।।
'पञ्चविधकृत्यानि करोति' इति पूर्वतः संबध्यते । श्रीमन्महा-
र्थदृष्ट्या दृगादिदेवीप्रसरणक्रमेण यत् यत् आभाति, तत् तत् सृज्यते;
तथा सृष्टे पदे तत्र यदा प्रशान्तनिमेषं कंचित् कालं रज्यति, तदा
स्थितिदेव्या तत् स्थाप्यते; चमत्कारापरपर्यायविमर्शनसमये
संह्रियते । यथोक्तं श्रीरामेण ।
समाधिवज्रेणाप्यन्यैरभेद्यो भेदभूधरः ।
परामृष्टश्च नष्टश्च त्वद्भक्तिबलशालिभिः ।'
इति। यदा तु संह्रियमाणमपि एतत् श्रन्तः विचित्रशङ्कादिसंस्का-
रम् आधत्ते, तदा तत् पुनः उद्भविष्यत्संसारबीजभावमापन्नं विलय
सूत्र ११—प्रकाशन- आस्वादन, आत्मबोध, बीज का अवस्थापन, विलापन
(भेद) से इनको अर्थात्
इन पाँच कृत्यों को करता ९६ है। इस प्रकार इसका पूर्व (सूत्र)
से संबंध है। महार्थदृष्टि से ९७ (सर्वोत्कृष्ट लक्ष्य की दृष्टि से) नेत्रेन्द्रिय
इत्यादि देवियों के प्रसरण क्रम से (अर्थात् भिन्न-भिन्न इन्द्रियों के कार्य
के द्वारा) जो कुछ प्रकाशित होता है वह सृष्टि है। (यह आभासन
वा प्रकाशन है)। सृष्टि हो जाने पर (अर्थात् किसी पदार्थ के
प्रकाशन हो जाने पर) बिना आँख बन्द किये हुए कुछ काल तक जब जीव
उसमें आस्वादन वा आनन्द लेता है, तब स्थिति देवी द्वारा वह (अनुभव में)
स्थापित किया जाता है। (यही स्थिति है)। विमर्शन जिसकी दूसरी संज्ञा
चमत्कार ९८ है—के समय (उस पदार्थ का) संहार ९९ होता है। (पदार्थ
की यह अनुभूति संहार है)। जैसा कि श्रीराम ने कहा है “वह भेद का
पर्वत, जिसका और लोग समाधिवज्र से भी भेदन नहीं कर सकते, वह उन
लोगों के द्वारा जिन्होंने तुम्हारी भक्ति का बल प्राप्त कर लिया है, आत्म-
चेतनावत् प्रतीत होता है (परामृष्टः) और इस प्रकार वह (भेदपर्वत)
नष्ट हो जाता है"।
जब (ज्ञानरूप में) सिमट जाने पर भी (साधक के) भीतर विचित्र
शंका इत्यादि के संस्कार खड़े हो जाते हैं, तो फिर से होनेवाले संसार के
७४ प्रत्यभिज्ञाहृदय
पदम् अध्यारोपितम् । यदा पुनः तत् तथा अन्तः स्थापितम् अन्यत् वा
अनुभूयमानमेव हठपाकक्रमेण अलंग्रासयुक्त्या चिदग्निसद्भावम्
आपद्यते, तदा पूर्णतापादनेन अनुगृह्यते एव । ईदृशं च पञ्चविध-
कृत्यकारित्वं सर्वस्य सदा संनिहितमपि सद्गुरूपदेशं विना न प्रका-
शते, इति सद्गुरुसपर्यैव एतत्प्रथार्थम् अनुसर्तव्या ।। ११ ।।
यस्य पुनः सद्गुरूपदेशं विना एनत्परिज्ञानं नास्ति, तस्य अवच्छादित-
स्वस्वरूपाभिः निजाभिः शक्तिभिः व्यामोहित्वं भवति । -इत्याह
तदपरिज्ञाने स्वशक्तिभिर्व्यामोहितता
संसारित्वम् ।। १२ ।।
‘तस्य’ एतस्य सदा संभवतः पञ्चविधकृत्यकारित्वस्य ‘अपरिज्ञाने’
-शक्तिपातहेतुकस्वबलोन्मीलनाभावात् अप्रकाशने ‘स्वाभिः शक्तिभिः
बीज भाव को पहुँचे हुए विलय का (अर्थात् आत्मस्वरूप के गोपन) का
अध्यारोप होता है । जब फिर वह (संसार बीज) अथवा भीतर में स्थापित
और कुछ जिसका अनुभव हो रहा है हठपाक क्रम१०० से और अलंग्रास-
युक्ति१०१ से चिदग्निसद्भाव को प्राप्त हो जाता है (अर्थात् चित् रूपी
अग्नि में जलकर चित् रूप ही हो जाता है) तो पूर्णता प्राप्त हो जाने के
कारण वह (साधक) अनुग्रह का अनुभव करता है । इस प्रकार की पंच-
कृत्य की कर्तृता सबके लिए सदा निकट होने पर भी सद्गुरु के उपदेश के
बिना प्रकाशित नहीं होती । इसलिए इसके स्पष्ट होने के लिए सद्गुरु की
सेवा का अनुसरण करना चाहिए ।। ११ ।।
सद्गुरु के उपदेश के बिना जिसको यह ज्ञान (पंचकृत्य का ज्ञान)
नहीं होता उसको अपनी ही उन शक्तियों से मोह (अज्ञान) होता है जिनका
(अपना अपना) वास्तविक स्वरूप ढका हुआ है ।
सूत्र १२—संसारदशा उसके (पंचकृत्य के) अज्ञान के कारण अपनी ही
शक्तियों से मोहित हो जाना है ।
भाष्य-सूत्र में जो तत् शब्द आया है उसका अर्थ है 'सदा होते
रहनेवाले पाँच प्रकार के कृत्यों के करने का' 'अज्ञान' का अर्थ है शक्तिपात के
कारण अपने बल का जो प्राकट्य होता है उसके अभाव के कारण अप्रकाशन
प्रत्यभिज्ञाहृदय ७१
व्यामोहितत्वं' - विविधलौकिकशास्त्रीयशङ्काशंकुकीलितत्वं यत्, इदमेव
'संसारित्वम्' । तदुक्तं श्रीसर्ववीरभट्टारके
'अज्ञानाच्छङ्कते लोकस्ततः सृष्टिश्च संहृतिः ॥
इति ।
'मन्त्रा वर्णात्मकाः सर्वे सर्वे वर्णाः शिवात्मकाः ॥'
इति च तथा हि-चित्प्रकाशात् अव्यतिरिक्ता नित्योदितमहामन्त्र-
रूपा पूर्णाहंविमर्शमयी या इयं परा वाक्शक्तिः आदि-क्षान्त-रूपाशेष-
शक्तिचक्रगर्भिणी, सा तावत् पश्यन्तीमध्यमादिक्रमेण ग्राहकभूमिकां
भासयति । तत्र च परारूपत्वेन स्वरूपम् अप्रथयन्ती मायाप्रमातुः
अस्फुटासाधारणार्थविभासरूपां प्रतिक्षणं नवनवां विकल्पक्रियामुल्लास-
यति, शुद्धामपि च अविकल्पभूमिं तदाच्छादितामेव दर्शयति । तत्र च
(न प्रकाश होना) । 'अपनी ही शक्तियों से मोहित हो जाने का' अर्थ है नाना
प्रकार की लौकिक और शास्त्रीय शंका रूपी कीलों से जकड़ उठना । यही
संसार दशा है ।
श्रीसर्ववीरभट्टारक में कहा है "लोगों में अज्ञान से ही शंका होती है
और उसी से जन्म-मरण होता रहता है"। यह भी कहा गया है "सभी
मंत्र१०२ वर्णरूप (अक्षररूप) हैं और सभी वर्ण शिवरूप हैं।" तो फिर
जो यह चित्प्रकाश से अभिन्न परावाक्१०३ शक्ति है जो नित्योदित (नित्य
उच्चरित) महामन्त्र रूप है जो पूर्ण अहं (मैं) ज्ञानरूपी है जो 'अ' से
लेकर 'क्ष' तक१०४ समस्त शक्ति-समूह को अपने गर्भ में धारण किये हुए है
वही पश्यन्ती, मध्यमा१०५ इत्यादि क्रम से ग्राहक (ज्ञाता) अवस्था को
अवभासित करती है ।
इसमें (अर्थात् ग्राहक भूमिका में) वह (शक्ति) अपने परारूप जो
कि उसका वास्तविक स्वरूप है—का गोपन करती हुई मायाप्रमाता में प्रति-
क्षण नई-नई विकल्प-क्रिया१०६ को उद्भासित करती है जिस क्रिया द्वारा
अस्फुट और विशेष पदार्थों का अवभास होता है, और अविकल्प-भूमि१०७
को जो अपने स्वरूप में शुद्ध ही है उससे (विकल्प क्रिया से) आच्छादित
रूप में प्रस्तुत करती है। ऐसी अवस्था में मूढ़जन ब्राह्मी इत्यादि देवताओं से
७२ प्रत्यभिज्ञाहृदय
ब्राह्म्यादिदेवताधिष्ठितककारादिविचित्रशक्तिभिः व्यामोहितो देह-
प्राणादिमेव परिमितम् अवशम् आत्मानं मन्यते मूढजनः । ब्राह्म्यादि-
देव्यः पशुदशायां भेदविषये सृष्टिस्थिती, अभेदविषये च संहारं प्रथयन्त्यः
परिमितविकल्पपात्रतामेव संपादयन्ति; पतिदशायां तु भेदे संहारम्,
अभेदे च सर्गस्थिती प्रकटयन्त्यः, क्रमात्क्रमं विकल्पनिर्ह्रासेनेन श्रीमद्-
भैरवमुद्रानुपवेशमयीं महतीम् अविकल्पभूमिमेव उन्मीलयन्ति ।
सर्वो ममायं विभव इत्येवं परिजानतः ।
विश्वात्मनो विकल्पानां प्रसरेऽपि महेशता ॥
इत्यादिरूपां चिदानन्दावेशमग्नां शुद्धविकल्पशक्तिम् उल्लासयन्ति
ततः उक्तनीत्या स्वशक्तिव्यामोहिततैव संसारित्वम् ।
अधिष्ठित ककार इत्यादि विचित्र शक्तियों से व्यामोहित होकर परिसीमित
देह, प्राण इत्यादि को विवश होकर 'आत्मा' मान लेता है । ब्राह्मी आदि
देवियां पशु दशा में ( बद्धजीवदशा में ) भेद की सृष्टि और स्थिति और
अभेद का संहार अभिव्यक्त करती हुई पशु ( बद्धजीव में) केवल परिमित
विकल्प की पात्रता उत्पन्न करती हैं, पतिदशा में ( मुक्तदशा में ) ये भेद
का संहार और अभेद की सृष्टि-स्थिति प्रकट करती हुई१०९ क्रमशः विकल्प
को हटाती हुई महती अविकल्पभूमि को अभिव्यक्त करती हैं "जिसके द्वारा
जीव भैरव मुद्रा११० में प्रवेश करता हैं और ये उस भूमि में शुद्धविकल्प
शक्ति१११ की अवतारणा करती हैं जो कि चिदानन्द के आवेश में मग्न
रहती है (जिसके द्वारा जीव को इस प्रकार का अनुभव होता है) "जो यह
जानता है कि सब कुछ मेरा ही ( आत्मा का ही ) वैभव है, जो यह अनु-
भव करता है कि समस्त विश्व मेरा आत्मा ही हैं, उसमें विकल्पों११२ के
प्रकट होने पर भी महेशता११३ वर्तमान रहती है (ई० प्र० आ० २,१२) ।
अतः जैसा ऊपर बतलाया गया हैं संसारदशा अपनी शक्तियों द्वारा मोहित
हो जाना ही है ।
और भी भगवती चितिशक्ति ही संसार को वमन ( सृष्टि ) करने के
कारण और संसार रूपी वाम ( विपरीत ) आचार के कारण वामेश्वरी११४
कहलाती है और अपनी खेचरी११५ रूप के द्वारा सब प्रमाताओं के रूप में,
गोचरी रूप के द्वारा सारे अन्तःकरणों के रूप में, दिक्त्चरी रूप के द्वारा सब
प्रत्यभिज्ञाहृदय ७३
किंच चितिशक्तिरेव भगवती विश्ववमनात् संसारवामाचारत्वाच्च
वामेश्वर्याख्या सती, खेचरी-गोचरी-दिक्धरी-भूचरीरूपैः अशेषैः प्रमातृ-
अन्तःकरण-बहिष्करण-भावस्वभावैः परिस्फुरन्ती, पशुभूमिकायां शून्य-
पदविश्रान्ता किंचित्कर्तृत्वद्यात्मक-कलादिशक्त्यात्मना खेचरीचक्रेण
गोपितपारमार्थिकचिद्गगनचरीत्वस्वरूपेण चकास्ति; भेदनिश्चयाभि-
मान-विकल्पनप्रधानान्तःकरणदेवी रूपेण गोचरीचक्रेण गोपिताभेदनिश्च-
याद्यात्मकपारमार्थिकस्वरूपेण प्रकाशते; भेदालोचनादिप्रधानबहिष्करण-
देवतात्मना च दिक्धरीचक्रेण गोपिताभेदप्रथात्मकपारमार्थिकस्वरूपेण
स्फुरति; सर्वतो व्यवच्छिन्नाभासस्वभावप्रमेयात्मना च भूचरीचक्रेण
बाह्य इन्द्रियों के रूप में, भूचरी रूप के द्वारा सारे पदार्थों के रूप में प्रकट
होती हुई, पशुदशा (जीवदशा) में शून्यपद में विश्राम करती हुई (अर्थात्
आत्मस्वरूप को गोपन करती हुई) खेचरी चक्र (शक्तिसमूह) के द्वारा अपने
पारमार्थिक चिद्गगनस्वरूप को छिपाती हुई किंचित्कर्तृत्व (थोड़ा-सा करने
की शक्ति-रूपी) कलादिशक्ति के रूप में अवभासित होती है, गोचरीचक्र
(गोचरी शक्ति समूह) के द्वारा अभेदनिश्चयात्मक जो अपना पारमार्थिक
स्वरूप है उसे छिपाकर अन्तःकरण देवी११६ रूप में प्रकाशित होती है
जिसका (जिस अन्तःकरण का) प्रधान व्यापार है भेदका निश्चय (बुद्धि-
द्वारा) भेदाभिमान-अर्थात् भेद से (अनात्म से) तादात्म्य स्थापित करना
(अभिमान-अहंकार द्वारा) भेद-विकल्पन-अर्थात् पदार्थों को भिन्न-भिन्न
रूप से ग्रहण करना (मन द्वारा), दिक्कचरी चक्र (दिक्धरी शक्ति समूह)
द्वारा अपने अभेद को प्रकाश करने वाले पारमार्थिक स्वरूप को छिपा कर
बहिष्करण (बाह्य इन्द्रिय) देवता रूप में प्रकट होती हैं जिसका प्रधान
व्यापार है भेद को ही देखना इत्यादि, भूचरी चक्र (भूचरी शक्ति समूह)
द्वारा अपने सर्वात्म्य स्वरूप को (अर्थात् सभी पदार्थ मैं ही हूँ इस भाव को)
छिपाकर और पशु (जीव) के हृदय को व्यामोहित कर चारों ओर प्रमेयों
(ज्ञेयों) के रूप में भान होती है जिन प्रमेयों का स्वभाव है परस्पर पृथक्
पृथक् रूप में दिखलाई देना।
किन्तु पतिदशा में शक्ति सब कुछ कर डालने वाली चिद्गगनचरी के
रूप में, अभेद का निश्चय इत्यादि करनेवाली गोचरी के रूप में, अभेद का
प्रत्यक्ष इत्यादि सम्पन्न करनेवाली दिक्धरी के रूप में, प्रमेयों को अपने अंग
७४ प्रत्यभिज्ञाहृदय
गोपितसार्वात्म्यस्वरूपेण पशुहृदयव्यामोहिना भाति । पतिभूमिकायां
तु सर्वकर्तृत्वादिशक्त्यात्मकचिद्गगनचरीत्वेन, अभेदनिश्चयाद्यात्मना
गोचरीत्वेन, अभेदालोचनाद्यात्मना दिक्त्वरीत्वेन, स्वाङ्गकल्पाद्यप्रथा-
सारप्रमेयात्मना च भूचरीत्वेन पतिहृदयविकासिना स्फुरति ! तथा च
उक्तं सहजचमत्कारपरिजनिताकृतकादरेण भट्टदामोदरेण विमुक्तकेषु
'पूर्णविच्छिन्नमात्रान्तर्बहिष्करणभावगाः ।
वामेशाद्याः परिज्ञानाज्ञानात्स्युर्मुक्तिबन्धदाः ॥'
इति एवं च निजशक्तिव्यामोहिततैव संसारित्वम् ।
अपि च चिदात्मनः परमेश्वरस्य स्वा अनपायिनी एकैव स्फुरत्ता-
सारकर्तृत्वात्मा ऐश्वर्यशक्तिः । सा यदा स्वरूपं गोपयित्वा पाशवे पदे
के समान अभिन्न प्रकाश करना जिसका सार है ऐसे सामर्थ्यवाली भूचरी
के रूप में पति (मुक्तदशा के जीव) के हृदय को विकसित करती हुई प्रका-
शित होती है ।
भट्टदामोदर-जिसके प्रति उनके सहज चमत्कार (आध्यात्मिक आनन्द)
से जनित (उत्पन्न) अकृत्रिम (स्वाभाविक) आदर होता है- अपने मुक्त
स्तोत्रों में कहते हैं:-
वामेश्वरी आदि शक्तियां (खेचरी के रूप में) प्रमाता में अवस्थित
होकर, (गोचरी के रूप में) अन्तःकरण में अवस्थित होकर, (दिक्त्वरी के
रूप में) बहिष्करणों (वाह्य इन्द्रियों) में अवस्थित होकर (भूचरी के रूप
में) भावों (पदार्थों) में अवस्थित होकर (जीव को) परिज्ञान (पूर्णज्ञान)
द्वारा पूर्ण बनाते हुए मुक्ति देती हैं और अज्ञान द्वारा उसे अवच्छिन्न
(परिमित) बनाते हुए बन्धन में डालती हैं । इस प्रकार अपनी शक्तियों
द्वारा व्यामोहित हो जाना ही (भ्रान्ति में पड़ जाना ही) संसारदशा है ।
(नीचे आगवोपाय का संकेत है ।)
और भी चित्स्वरूप परमेश्वर की अपनी ऐश्वर्यशक्ति ११७ है जो नाशर-
हित है, अनुपम है, जिसका सार स्फुरता ११८ (प्रकाश) है और जो
कर्तृ तारूप ११९ है । वह (ऐश्वर्यशक्ति) जब अपने (वास्तविक) स्वरूप
को छिपाकर पशु (परिमित प्रमाता बद्धजीव) की अवस्था में प्राण, अपान
प्राणापान-समान-शक्तिदशाभिः जाग्रत्स्वप्न-सुषुप्तभूमिभिः देहप्राण-
पुर्यष्टककलाभिश्च व्यामोहयति, तदा तद्व्यामोहितता संसारित्वम् ;
यदा तु मध्यधामोल्लासाम् उदानशक्तिं, विश्वव्याप्तिसारां च व्यान-
शक्तिं, तुर्यदशारूपां तुर्यातीतदशारूपां च चिदानन्दघनाम् उन्मीलयति,
तदा देहाद्यवस्थायामपि पतिदशात्मा जीवन्मुक्तिर्भवति । एवं त्रिधा
स्वशक्तिव्यामोहितता व्याख्याता । ‘चिद्वत्’ इति (६) सूत्रे चित्प्रकाशो
गृहीतसंकोचः संसारी इत्युक्तम्, इह तु स्वशक्तिव्यामोहितत्वेन अस्य
संसारित्वं भवति,-इति भङ्ग्यन्तरेण उक्तम्। एवं संकुचितशक्तिः प्राणा-
दिमानपि यदा स्वशक्तिव्यामोहितो न भवति, तदा अयम्
‘..................शरीरी परमेश्वरः ।’
इत्याम्नायस्थित्या शिवभट्टारक एव,-इति भङ्ग्या निरूपितं भवति ।
और समान शक्ति१२० की दशाओं से जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति की भूमियों
से, देह, प्राण और पुर्यष्टक१२१ की कलाओं१२२ से व्यामोह उत्पन्न करती
है तो यही व्यामोह संसार की दशा (जन्म-जन्मान्तर में संसरण करते रहना,
(चक्कर काटते रहना ) है । जब वह ( ऐश्वर्यशक्ति ) चिदानन्दघनमय
उदान१२३ शक्ति को जो मध्यधाम१२४ में विलसित होती है और जो तुर्य-
दशावाली१२५ होती है, और चिदानन्दघनमय१२६ व्यानशक्ति को जो सम-
स्त विश्व में व्याप्त हो जाती है और जो तुर्यातीतदशा वाली १२७ होती
है उन्मीलित करती है, तब देह आदि के रहते हुए भी जीव पतिदशा१२८
में पहुँच जाता है और उसकी जीवन में ही मुक्ति हो जाती है ।
इस प्रकार अपनी शक्तियों से ही व्यामोहित हो जाना-इसकी तीन
प्रकार से व्याख्या की गई है ‘चिद्वत्’ १२९ सूत्र में ( सूत्र ६ ) में यह कहा
गया है कि चित्प्रकाश ही संकोच ग्रहण करके संसारी बन जाता है । यहाँ
पर एक दूसरे दृष्टिकोण से यह कहा गया है कि अपनी शक्तियों द्वारा व्या-
मोहित हो जाने से ही जीव की संसारदशा होती है ।
इस प्रकार जिसकी शक्ति संकुचित हो गई है ( अर्थात् अणु, जीव ) वह
जब अपनी शक्तियों से व्यामोहित नहीं होता तब प्राण इत्यादि धारण करते
हुए भी वह आम्नाय की दृष्टि से शरीर धारण किया हुआ परमेश्वर है,
पूज्य शिव ही है—यह प्रकारान्तर से निश्चित रूप से कहा जा सकता है ।
७६ प्रत्यभिज्ञाहृदय
यदागमः
मनुष्यदेहमास्थाय छन्नास्ते परमेश्वराः ।'
इति । उक्तं च प्रत्यभिज्ञाटीकायाम्
'शरीरमेव घटाद्यपि वा ये षट्त्रिंशत्तत्त्वमयं
शिवरूपतया पश्यन्ति तेऽपि सिध्यन्ति ।'
इति ॥ १२ ॥
उक्तसूत्रार्थप्रातिपक्ष्येण तत्त्वदृष्टिं दर्शयितुमाह
तत्परिज्ञाने चित्तमेव अन्तर्मुखीभावेन
चेतनपदाध्यारोहात् चितिः ॥ १३ ॥
पूर्वसूत्रव्याख्याप्रसङ्गेन प्रमेयदृष्ट्या वितत्य व्याख्यातप्रायमेतत्
सूत्रम्; शब्दसंगत्या तु अधुना व्याख्यायते । 'तस्य' आत्मीयस्य पञ्च-
कृत्यकारित्वस्य 'परिज्ञाने' सति अपरिज्ञानलक्षणकारणापगमात् स्व-
शक्तिव्यामोहिततानिवृत्तौ स्वातन्त्र्यलाभात् प्राक् व्याख्यातं यत् 'चित्तं'
जैसा कि आगम ने कहा है:—
“मनुष्य के देह में स्थित होकर वे छिपे हुए परमेश्वर हैं” और ईश्वर-
प्रत्यभिज्ञा की टीका १३० में कहा गया है:—
“जो छत्तीसतत्त्वमय शरीर अथवा घट इत्यादि को शिव रूप से देखते हैं
वे भी सिद्धि को प्राप्त करते हैं ।” उपर्युक्त सूत्र के अर्थ को विपर्यय द्वारा
तत्त्वदृष्टि को बतलाने के लिए कहते हैं ।
सूत्र १३—उसके पूर्ण ज्ञान होने पर चित्त १३१ ही अन्तर्मुखीभाव से
चेतनपद १३२ पर पहुँच जाने से चिति १३३ हो जाता है ।
भाष्य—ज्ञेय की दृष्टि से पूर्वसूत्र की व्याख्या के प्रसंग में इस सूत्र की
भी विस्तृत रूप से प्रायः व्याख्या हो ही गई है । शब्द संगति से इस सूत्र
की अब व्याख्या की जा रही है । सूत्र में जो तत् शब्द आया है उसका
अर्थ है आत्मा के पंचकृत्य करते रहने का । 'परिज्ञाने' का अर्थ है पूर्णज्ञान
होने पर अर्थात् अज्ञानरूपी कारण के हट जाने पर, अपनी ही शक्ति के
द्वारा व्योमोहित हो जाने के स्वभाव के चले जाने पर स्वातंत्र्य लाभ से,
प्रत्यभिज्ञाहृदय ७७
तदेव संकोचिनीं बहिर्मुखतां जहत्, 'अन्तर्मुखीभावेन चेतनपदाध्या-
रोहात्, -ग्राहकभूमिकाक्रमाक्रमेण संकोचकलाया अपि विगलनेन
स्वरूपापत्त्या 'चितिर्' भवति; स्वां चिन्मयीं परां भूमिमाश्रयति
इत्यर्थः ॥ १३ ॥
ननु यदि पारमार्थिकं चिच्छक्तिपदं सकलभेदकवलनस्वभावं, तत्
अस्य मायापदेऽपि तथारूपेण भवितव्यं यथा जलदाच्छादितस्यापि
भानोः भावावभासकत्वम् ।-इत्याशङ्क्य आह
चितिवह्निरवरोहपदे छन्नोऽपि मात्रया
मेयेन्धनं प्लुष्यति ॥ १४ ॥
पहले जिस चित्त की (सूत्र ५ में) व्याख्या हो चुकी है वही संकोचस्वभाव-
वाली बहिर्मुखता को छोड़कर, अन्तर्मुखी भाव से चेतनपद पर चढ़कर अर्थात्
क्रम से ज्ञाता (आत्मा) की भूमि तक उठ कर संकोच कला के विगलित
हो जाने पर अपने (वास्तविक) स्वरूप की प्राप्ति से चिति हो जाता है ।
अर्थात् चित्त अपनी चिन्मयी परा भूमि में प्रवेश कर जाता है (चित्त अब
अपनी परम अवस्था चित् में परिणत हो जाता है)।
यहाँ पर एक शंका होती है (ननु) 'यदि पारमार्थिक चित् शक्ति का
ऐसा स्वभाव है कि वह सब भेदों को कवलित कर लेती है तो मायावस्था
में भी उसे वैसाही रहना चाहिए (अर्थात् उसे अपने स्वभाव को नहीं
छोड़ना चाहिए; मायावस्था में भी अभेद की प्रतीति होनी चाहिए) जैसे
मेघ से आच्छादित रहने पर भी सूर्य पदार्थों को प्रकाशित करता ही है ।
(अर्थात् पदार्थों को प्रकाशित करना सूर्य का स्वभाव है और मेघ से
आच्छादित होने पर भी वह अपने इस स्वभाव को नहीं छोड़ता, पदार्थों को
प्रकाशित करता ही रहता है । इसी प्रकार यदि चित् शक्ति का सब भेदों
को विलीन कर अभेद को व्यक्त करना स्वभाव है, तो माया से आच्छादित
रहने पर भी उसे अभेद की प्रतीति करानी चाहिए । यहाँ चिति की उपमा
सूर्य से दी गई है और माया की मेघ से) इस शंका को उठाकर ग्रन्थकार
कहते हैं:—
सूत्र १४-चिति रूपी अग्नि अवरोह पद में (मायासे) आच्छादित
रहने पर भी प्रमेय (ज्ञेय, पदार्थ) रूपी इन्धन को कुछ अंश में (कुछ सीमा
तक) जला देती है ।
७८ प्रत्यभिज्ञाहृदय
‘चितिरेव’ विश्वग्रसनशीलत्वात् ‘वह्निः’,’ असौ एव ‘अवरोहपदे-
मायाप्रमातृतायां ‘छन्नोऽपि’-स्वातंत्र्यात् आच्छादितस्वभावोऽपि’,
भूरिभूतिच्छन्नाग्निवत् ‘मात्रया’-अंशेन, नीलपीतादिप्रमेयेन्धनं ‘प्लु-
ष्यति’-स्वात्मसात् करोति । मात्रापदस्य इदम् आकूतम्-यत् कवलयन्
अपि सर्वात्म्येन न ग्रसते, अपि तु अंशेन; संस्कारात्मना उत्थापयति ।
ग्रासकत्वं च सर्वप्रमातॄणां स्वानुभवत एव सिद्धम् । यदुक्तं श्रीमदुत्पल-
देवपादैः निजस्तोत्रेषु
‘वर्तन्ते जन्तवोऽशेषा अपि ब्रह्मेन्द्रविष्णवः ।
भाष्य-चिति को यहां वह्नि ( अग्नि ) इसलिए कहा है क्यों कि
( अग्नि के समान ) उसका विश्व को खा जाने का स्वभाव है । यह अवरोह
पद में-( अर्थात् परमशिव पद से नीचे उतरने के समय )-मायाप्रमाता
( वह ज्ञाता जो माया से उपहित है ) की अबस्था में । ‘छन्नोऽपि-अर्थात्
अपने स्वातंत्र्य से ही ( किसी दूसरे से विवश होने पर नहीं ) माया द्वारा
अपने स्वभावके आच्छादित होने पर भी । जैसे आग बहुत राख ( भूरिभूति )
से ढके होने पर भी ( इन्धन को जला देती हैं ) उसी प्रकार ‘चिति (चित्)
शक्ति ) भी माया से ढके होने पर भी मात्रया अर्थात् कुछ अंश में, नील,
पीत इत्यादि प्रमेय रूपी इन्धन को ‘प्लुष्यति’ ‘जला देती हैं’ अर्थात् आत्म-
सात् कर लेती हैं । ( कहने का तात्पर्य यह है कि जब ज्ञेय चिति द्वारा
आत्मसात् कर लिया जाता है अर्थात् जब ज्ञेय ज्ञान बन जाता है, तब
ज्ञेय का ज्ञान से भेद मिट जाता है, तब ज्ञेय ज्ञान का ही अंश हो जाता है )
‘मात्रा’ ( अंश ) शब्द का यहाँ यह भाव है कि चिति ज्ञेय को कवलित
करने पर भी उसे पूर्ण रूप से ग्रसित नहीं कर लेती, किन्तु अंश में ही
ग्रसित करती है ( अंश में ही ग्रसित करती है इसलिए कहा है क्योंकि )
वह उसे ( ज्ञेय ) को संस्कार द्वारा पुनः उत्थापित कर देती है । ( अर्थात्
ज्ञेय पूर्णरूप से ज्ञान में नहीं परिणत हो जाता । वह संस्कार रूप में चित्त
में रहता है और उपयुक्त अवसर पर पुनः ज्ञेय के रूप में प्रकट होता है ) ।
सब प्रमाताओं ( ज्ञाताओं ) में ग्रसन करने की शक्ति है ( अर्थात् ज्ञेय को
ज्ञान बना लेने की शक्ति है ) यह तो प्रत्येक को अपने अनुभव से ही सिद्ध
है । जैसा कि श्रीमदुत्पलदेव१३४ ने अपने स्तोत्रों में कहा है
सभी जीव-ब्रह्मा, विष्णु इन्द्र१३५ विश्व को ग्रसित करते रहते हैं
प्रत्यभिज्ञाहृदय ७६
ग्रसमानास्ततो वन्दे देव विश्वं भवन्मयम् ॥’
इति ॥ १४ ॥
यदा पुनः करणेश्वरीप्रसरसंकोचं संपाद्य सर्गसंहारक्रमपरिशीलन-
युक्तिम् आविशति तदा
बललाभे विश्वमात्मसात्करोति ॥ १५ ॥
चितिरेव देहप्राणाद्याच्छादननिमज्जनेन स्वरूपम् उन्मग्नत्वेन स्फा-
रयन्ती बलम्; यथोक्तं
'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः.........।
(अर्थात् सब ज्ञेय को ज्ञान का ही अंश बनाते रहते हैं) इसलिए हे देव मैं
आप के रूप वाले विश्व की बन्दना करता हूँ । (शिवस्तो० २०, १७)
(भाव यह है कि सभी जीव विषयों का आहार करते रहते हैं। आप
विश्व अर्थात् सब कुछ का आहरण कर लेते हैं। इसलिए विश्व आपका
स्वरूप ही है) ।
जब फिर (साधक) इन्द्रिय देवियों के प्रसार का सम्पादन करके क्रम से
सर्ग (भावों वा पदार्थों की सृष्टि अर्थात् बहिःस्थापन) के अभ्यास के उपाय
का आलम्बन करता है और संकोच का सम्पादन करके (अर्थात् इन्द्रियों को
भीतर प्रतिसंहृत करके) संहार (भावों वा पदार्थों वा ज्ञेयों को ज्ञान में परा-
वृत्ति या प्रतिसंहृति) के अभ्यास के उपाय का आलम्बन करता है, तब
सूत्र १५--चिति (चित् शक्ति) के (स्वभावसिद्ध) बल को प्राप्त करने
पर वह (साधक) विश्व को आत्मसात् कर लेता है (अपने स्वरूप में समीकरण
कर लेता है) ।
भाष्य--चिति अर्थात् चित् शक्ति ही का देह, प्राण इत्यादि कोशों को
दबाकर अपने उभार से अपने स्वरूप का उन्मेष 'बल' कहलाता है। जैसा कि
कहा गया है (स्पन्दकारिका निः २ का० १० में) “तब उस (चिति) के बल
को प्राप्त करके मन्त्र१३६ सर्वज्ञ के बल से सम्पन्न हो जाते हैं ई० ।”