प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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घनस्वात्मस्वरूपामिव्यक्त्युपायाः । तथा हि यदा यदा बहिर्मुखं रूपं
स्वरूपे विश्राम्यति, तदा तदा बाह्यवस्तूपसंहारः; अन्तः प्रशान्त-
पदावस्थितिः ; तत्तदुदेष्यत्सं वित्संतत्यासूत्रणम्; -इति सृष्टि-स्थितिसंहार-
मेलनरूपा इयं तुरीया संविद्भट्टारिका तत्तत्सृष्ट्यादि भेदान् उद्वमन्ती
संहरन्ती च, सदा पूर्णा च, कृशा च, उभयरूपा च अनुभयात्मा च,
अक्रममेव स्फुरन्ती स्थिता ।
इस व्याख्या के अनुसार पूरे सूत्र का अर्थ इस प्रकार हुआ । सब दर्शनों
(ज्ञानों) की स्थितियां अर्थात् अन्तर्मुख विश्रान्तियाँ उसकी अर्थात् उस
शिव रूपी आत्मा की जिसका स्वरूप चित् और आनन्दघन है भूमिकाएँ
अर्थात् अभिव्यक्ति के उपाय हैं। जब जब (ज्ञान का) बहिर्मुख रूप स्वरूप
में अर्थात् ज्ञाता के वास्तविक स्वभाव में विश्रान्ति प्राप्त करता है, तब-तब
बाह्य वस्तुओं का उपसंहार अर्थात् समाप्ति या निराकरण हो जाता है,
(दूसरे शब्दों में) तब-तब एक आन्तरिक शान्त पद में ठहराव हो जाता है
और भिन्न-भिन्न उदय होने वाले ज्ञान क्रमों का प्रारंभ भी यहीं से होता है-
इस प्रकार यह पूज्य तुरीया संवित् ८४ जो सृष्टि आदि भेदों को बाहर प्रकट
करती हुई, पुनः अपने भीतर उपसंहार करती हुई, सदा कृश होते हुए भी
पूर्ण रहती हुई, दोनों रूप में (कृश और पूर्ण दोनों रूप में) और वस्तुतः
इन दोनों में से किसी भी रूप में न रहती हुई, बिना क्रम के (अर्थात् सदा)
स्फुरण करती हुई स्थित है ।
[ कुल चार विकल्प हो सकते हैं-(१) पूर्ण, (२) कृश, (३) पूर्ण और
कृश दोनों एक साथ (४) न पूर्ण, न कृश । तुरीया इन चारों से परे हैं। भाव
यह है कि यद्यपि तुरीया से ही सब सृष्टि होती है जो कि यह सिद्ध करता है
कि सभी पदार्थ उसमें भरे पड़े हैं: इसलिए वह पूर्ण है और यद्यपि तुरीया
में ही सभी पदार्थों का संहार होता है अर्थात् तुरीया में ही सब पदार्थ समेट
लिए जाते हैं जिससे ऐसा लगता है कि वह कृश है और उसे सभी पदार्थों को
बटोर कर अपने को पूर्ण करना है, तथापि न वह कृश होती है, न पूर्ण ।
वह इन सब विकल्पों से परे हैं। तुरीया कोई भौतिक पदार्थ नहीं है जिसमें से
कुछ निकल जाता है तो वह खाली हो जाता है और वापिस आ जाता है,
तो भर जाता है। तुरीया तो एक संवित् शक्ति है जिसमें सृष्टि, स्थिति,
संहार के कारण न कुछ घटता है, न कुछ बढ़ता है ]