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सर्वकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 187 में से

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पृष्ठ 70

६० प्रत्यभिज्ञाहृदय
'सर्वेषां चार्वाकादिदर्शनानां 'स्थितयः'-सिद्धान्ताः 'तस्य' एतस्य
आत्मनो नटस्येव स्वेच्छावगृहीताः कृत्रिमा 'भूमिकाः' ।
तथा च
'चैतन्यविशिष्टं शरीरमात्मा ।'
इति चार्वाकाः
नैयायिकादयो ज्ञानादिगुणगणाश्रयं बुद्धितत्त्वप्रायमेव आत्मानं
संसृतौ मन्यन्ते, अपवर्गे तु तदुच्छेदे शून्यप्रायम् ।
अहंप्रतीतिप्रत्येयः सुखदुःखाद्युपाधिभिः तिरस्कृतः आत्मा-इति
मन्वाना मीमांसा अपि बुद्धावेव निविष्टाः ।
ज्ञानसंतान एव तत्त्वम्-इति सौगता बुद्धिवृत्तिषु एव पर्यवसिताः ।
प्राण एव आत्मा-इति केचित् श्रुत्यन्तविदः ।
भाष्य :--सर्वदर्शन स्थितयः सर्वेषां दर्शनानां स्थितयः । अर्थात् सब
दर्शनों-चार्वाक आदि दर्शनों की स्थितियां । स्थितियां का अर्थ है सिद्धान्त
तद्भूमिकाः--तस्य भूमिकाः अर्थात् उस (आत्मा) की नट के समान अपनी
इच्छा से गृहीत कृत्रिम भूमिकाएँ । पूरे सूत्र का तात्पर्य है--
सभी दर्शनों के सिद्धांत आत्मा की नट के समान अपनी इच्छा से गृहीत
कृत्रिम भूमिकाएँ हैं ।
चार्वाक मतानुयायी कहते हैं-चैतन्य से विशिष्ट शरीर ही आत्मा है ।
नैयायिक (न्याय दर्शन के सिद्धान्त को माननेवाले) इत्यादि❊ संसार दशा
में ज्ञान इत्यादि गुणसमूहों के आधार बुद्धि तत्त्व को ही प्रायः आत्मा मानते
हैं । अपवर्ग अर्थात् मोक्ष दशा में जब बुद्धि का उच्छेद हो जाता है (अर्थात्
जब बुद्धि नहीं रह जाती) तब वे आत्मा को प्रायः शून्य ही समझते हैं ।
जो अहं (मैं) की प्रतीति से जाना जाता है और सुखदुःखादि
उपाधियों६४ के ढका हुआ हैं वह आत्मा है-ऐसा माननेवाले मीमांसक लोग
भी बुद्धि में ही चिपटे हुए हैं (अर्थात् बुद्धि को ही आत्मा समझते हैं) ।
सुगत६५ के अनुयायी ज्ञानसन्तति (ज्ञान के सतत प्रवाह) को ही तत्त्व
मानते हैं । इसलिए उनके दर्शन का भी बुद्धि के व्यापार में ही पर्यवसान हैं ।
कुछ वेदान्त के जानकार कहते हैं कि प्राण ही आत्मा है ।
❊ इत्यादि से वैशेषिक समझना चाहिए ।