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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

टिप्पणियाँ ११६
६१. शून्यस्वभाववाला—अर्थात् प्रलयकेवली अथवा शून्यप्रमाता । दे०
टि० ३८ ।
६२. पुर्यष्टकः अर्थात् अष्ट (आठ) की पुरी वाला । तंत्र में सूक्ष्मशरीर
या लिंग शरीर को पुर्यष्टक कहते हैं । यह पुर्यष्टक पाँच तन्मात्राओं, मन,
बुद्धि और अहंकार की समष्टि है । यही संस्कारों अथवा वासनाओं का
आशय है ।
६३. दे० टि० १८ ।
६४. उपाधि (उप + आ + √ धा)—जो पास में रक्खी हो, जो किसी
वस्तु को—बिना उसके अंग बने हुए—परिसीमित कर दे ।
६५. सुगत ( जो अच्छी तरह गया है ) भगवान् बुद्ध के लिए प्रयुक्त
होता है । इसलिए बुद्ध के अनुयायी को सौगत कहते हैं ।
६६. मध्यमक दर्शन के अनुयायी माध्यमिक कहलाते हैं । मध्यमक
दर्शन बौद्धों का वह दर्शन है जो यह विश्वास करता है कि तत्त्व को हम
किसी बौद्धिक प्रत्यय से नहीं व्यक्त कर सकते । वह सत् असत् इत्यादि
बुद्धि की किसी भी कोटि में नहीं बाँधा जा सकता । वह सब कोटियों के
मध्य में है । उसके लिए किसी शब्द का प्रयोग करना उसे परिसीमित करना
है । तत्त्व को हम केवल शून्य ही कह सकते हैं ।
६७. पांचरात्रः—पांचरात्र वैष्णवों का मुख्य दर्शन है । पांचरात्र के
माननेवाले भी संस्कृत में पांचरात्र ही कहलाते हैं । पांचरात्र शब्द कैसे
बना यह स्पष्ट नहीं है । सम्भवतः कुछ कर्म ( धार्मिक कृत्य ) पाँच रात
तक चलते रहे, उसी के आधार पर यह शब्द बना है ।
६८. प्रकृति से यहाँ सांख्य की प्रकृति का तात्पर्य नहीं है । यहाँ पर
पराप्रकृति का अर्थ है परमोत्कृष्ट कारण । पांचरात्र दर्शन यह मानता है
कि वासुदेव ही सारी सृष्टि के उपादान और निमित्त दोनों कारण हैं ।
६६. पांचरात्र जीव को वासुदेव का परिणाम मानता है । शंकराचार्य ने
भी ब्रह्मसूत्र के ‘उत्पत्ति असम्भवाधिकरणम्’ पर अपने भाष्य में कहा है ।
‘तेषां वासुदेवः पराप्रकृतिरितरे संकर्षणादयः कार्यम्’
अर्थात् पांचरात्रो के मत में सर्वोत्कृष्ट कारण वासुदेव हैं । संकर्षण
इत्यादि अन्य जीव कार्य हैं ।
७०—क्षेमराज ने यहाँ थोड़ी सी भूल की है । पांचरात्र लोग ‘अव्यक्त’
को परम तत्त्व नहीं मानते । वासुदेव को ही परम तत्त्व मानते हैं और
वासुदेव को ‘अव्यक्त’ से बढ़ कर मानते हैं । शंकराचार्य ने भी ब्रह्मसूत्र की
‘उत्पत्ति-असम्भवाधिकरणम्’ के भाष्य में इसकी पुष्टि की है-‘तत्र यत्

१२० प्रत्यभिज्ञाहृदय
तावदुच्यते योऽसौ नारायणः परोऽव्यक्तात् प्रसिद्धः परमात्मा सर्वात्मा स
आत्मनात्मानमनेकधा व्यूहावस्थित इति, तन्न निराक्रियते”।
७१. सांख्याः का अर्थ यहाँ “सांख्य के अनुयायी” है ।
७२ दे० टि० ३७ ।
७३. यहाँ पर वैयाकरण से तात्पर्य है “व्याकरणदर्शन के अनुयायी”।
व्याकरणदर्शन का संक्षिप्त वर्णन माधव द्वारा लिखित सर्वदर्शन-संग्रह के
पाणिनिदर्शनम् नामक अध्याय में दिया हुआ है। यहाँ भर्तृहरि के वाक्य-
पदीय का संकेत है जिसमें पश्यन्ती को (शब्द-ब्रह्म माना है।
७४-७५. व्याकरण दर्शन शब्द-ब्रह्म को परमार्थ मानता है। वैयाकरण
शब्द को चैतन्य मानते हैं। उनके अनुसार शब्द वह है जिसमें चिन्तन और
वचन एकी-भूत रहते हैं। ब्रह्म वह शाश्वत शब्द या स्पन्दन है जिससे
सब कुछ प्रादुर्भूत होता है, त्रिकदर्शन के अनुसार से भी पदार्थ, विचार
और शब्द अव्यक्त रूप में परमशिव में वर्तमान है। यह परावाक् की भूमि
है। इस भूमि में पद और अर्थ एकीभूत रहते हैं। दूसरी भूमि पश्यन्ती
की है। इस भूमि में विश्व चैतन्य की दृष्टि में एक अविशेष रूप में स्थित
रहता है जो कि मानव की अनुभूति से परे है।
क्षेमराज का कहना है कि वैयाकरण पश्यन्ती भूमि ही को शब्दब्रह्म
की सर्वोच्च दशा मानते हैं। त्रिक के अनुसार यह भूमि तो केवल सदाशिव
तक परिसीमित है। वैयाकरण परावाक् को नहीं जानते जो कि परमशिव
का ज्ञापक है। पश्यन्ती भूमि के अनन्तर मध्यमा भूमि है जो पश्यन्ती भूमि
के अविशेष और वैखरी भूमि के विशेष के मध्य की अवस्था है। वैखरी
व्यावहारिक विचार और वचन की भूमि है जिसमें मुख्यतः विशेषों का
अनुभव होता है। मध्यमा पश्यन्ती और वैखरी के बीच की एक कड़ी है।
वह अन्तःकरण में विचार और वचन की एक सूक्ष्म अवस्था है। वैखरी में
पद (शब्द) विचार और अर्थ (वस्तु) से भिन्न प्रतीक होता है।
७६. “आगम” उस विद्या को कहते हैं जो सदा गुरु-शिष्य की परम्परा
से चली आ रही हो। यहाँ आगम से तात्पर्य है शैवदर्शन की परम्परा ।
७७. आर्हत का यहाँ तात्पर्य है जैनियों से । उनका कहना है कि विश्व
परमाणुओं से बना हुआ है जो कि शाश्वत हैं। इनके भिन्न-भिन्न गुण होते हैं।
इसलिए इनमें परिवर्तन होता रहता है। यहाँ जो आगम का वचन उद्धृत
किया गया है उसका तात्पर्य यह है कि जैन इन गुणों को ही परमार्थ रूप
समझते हैं और इनके आगे नहीं जा पाते ।
७८. पांचरात्रिक : दे० टि० ६७ ।

टिप्पणियाँ १२१
७६. तान्त्रिक-तन्त्र के अनुयायी तान्त्रिक कहलाते हैं । तन्त्र शब्द की
व्युत्पत्ति दो प्रकार से बतलाई गई है ।
(१) तन् धातु से जिसका अर्थ है तानना, विस्तार करना । इस दृष्टि से
तन्त्र का अर्थ हैं वह शास्त्र जिसमें सृष्टि और जीवन के तत्त्व विस्तारपूर्वक
समझाये गये हैं ।
(२) तन्त्र धातु से जिसका अर्थ है शासन करनां, स्वायत्त करना ।
इस दृष्टि से तन्त्र का अर्थ है वह शास्त्र जो यह बतलांता है कि विभिन्न
शक्तियों को किस प्रकार स्वायत्त करना चाहिए ।
८०. कुल शब्द का अर्थ इस सन्दर्भ में शक्ति है । कुलादि आम्नायों का
यहाँ तात्पर्य है शाक्त शास्त्र ।
८१. त्रिक् का अर्थ है तीन का समूह शिव, शक्ति और नर । प्रत्य-
भिज्ञा दर्शन का यह दूसरा नाम है । इसके अनुसार परम अर्थ परमशिव है
जो तीन के समूह शिव, शक्ति और नर में अभिव्यक्त होता है । त्रिकादि में
जो आदि शब्द है उससे त्रिपुरा अथवा महार्थ समझा जा सकता हैं ।
८२. परशक्तिपात-शक्तिपात अर्थात् अनुग्रह दो प्रकार का है (१)
पर और (२) अपर । परशक्तिपात से अवच्छिन्न (परिसीमित) जीव
पूर्ण शिव की चेतना में रूपान्तरित हो जाता है । यह शक्तिपात केवल
परमेश्वर द्वारा हो सकता है । अपरशक्तिपात् से यद्यपि अवच्छिन्न जीव
शिव से अपने तादात्म्य का अनुभव कर लेता है तथापि वह अभी यह अनु-
भव नहीं करता कि सारा विश्व उसी की अभिव्यक्ति है और वह इस प्रकार
शिव की चेतना को नहीं प्राप्त कर पाता । अपर शक्तिपात गुरु अथवा देव
द्वारा हो सकता है ।
८३. 'विद्या' का अर्थ यहाँ पर वह अशुद्ध विद्या है जो कि माया के पाँच
कंचुकों में से एक हैं। इससे वह परिमितता आ जाती है जिसके कारण
जीव को परमार्थ का सम्यक् ज्ञान नहीं हो पाता ।
८४. तुरीय का अर्थ है चौथा । संस्कृत में 'चतुर्' शब्द का अर्थ है चार ।
चतुर् शब्द का 'च' लोप हो जाने से और ईयट् प्रत्यय के लग जाने से
(चतुर् + ईयट्) तुरीय शब्द बनता है जिसका अर्थ होता है चौथा । संवित्
शब्द स्त्री लिंग है । इसलिए उसका विशेषण भी स्त्रीलिंग होना चाहिए ।
इस प्रकार मूल में 'तुरीया संवित्' शब्द आया है । प्रत्येक व्यक्ति की चेतना
की तीन अवस्थाएं होती हैं जाग्रत् स्वप्न, सुषुप्ति (गहरी नींद जिसमें न
जागरण है, न स्वप्न) । जब जाग्रत् अवस्था होती है, तब न स्वप्न रहता

१२२ प्रत्यभिज्ञाहृदय
है, न सुषुप्ति । जब स्वप्नावस्था रहती है, तब न जाग्रत् रहता है, न
सुषुप्ति । जब सुषुप्ति अवस्था होती है, तब न जाग्रत रहता है, न स्वप्न ।
व्यक्ति को इन तीनों अवस्थाओं का पृथक् पृथक् भान होता है। किन्तु
व्यक्ति के भीतर एक चौथी अवस्था भी है जो सभी अवस्थाओं का साक्षी
है । यह तुरीयावस्था है। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति-इन तीनों की अपेक्षा
से उसे तुरीया (चौथी) अवस्था कहते हैं। तुरीया चेतना में कोई क्रम वा
भंग नहीं होता । वह चेतना सदा तीनों अवस्थाओं का साक्षीरूप से वर्तमान
रहती है। वह जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं को सदा धारण किये
रहती हैं। देह, प्राण, मन इत्यादि से परिच्छिन्न जीव को उस तुरीया का
अनुभव नहीं होता यद्यपि वह उसमें सदा वर्तमान रहती है। अविद्या हट
जाने पर, आत्मिक ज्ञान के उदय होने पर तुरीया का अनुभव होता है।
वही हमारी चेतना का वास्तविक स्वरूप है जिसकी अनुभूति जिन सीमाओं
में हमारी चेतना बँधी हुई है उनको अतिक्रान्त करने पर होती है।
व्यष्टि की दृष्टि से तुरीया चेतना जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों
अवस्थाओं को धारण किये रहती है, किन्तु वह यह तीनों अवस्थाओं से भिन्न
है। समष्टि की दृष्टि से तुरीया सृष्टि, स्थिति, संहार को धारण किये रहती
है (सृष्टिस्थिति संहार-मेलन रूपा इयं तुरीया ) । जैसे एक सूत्र भिन्न भिन्न
पुष्पों को माला में धारण किये हुए रहता है, इसी प्रकार तुरीया तीनों
अवस्थाओं को एक में धारण किये रहती है। उसमें भंग नहीं होता । वह पूर्ण
चेतना है, एकत्व की चेतना है । वह संहार की दृष्टि से पूर्ण कही गई है,
क्योंकि उस दशा में वह सभी पदार्थों को अपने में समेट लेती है, उद्वमन
अर्थात् सृष्टि की दृष्टि से वह कृशा (दुबली) कही गयी है, क्योंकि उस दशा
में जो पदार्थ उसमें समेटे हुए थे वे उसमें से निकले जा रहे हैं। अतः वह
उभयरूपा (पूर्णा और कृशा दोनों) है। परमार्थ दृष्टि से वह अनुभयात्मा (न
पूर्ण, न कृशा) हैं, क्योंकि वह भरने और खो देने की अवस्थाओं से अतीत है ।
८५. अणु और मल के लिए दे० टि० ६० ।
८६. यहाँ कला का अर्थ है 'कर्तृत्व वा साधकता का संकोच वा परि-
च्छिन्नत्व' । दे० टि० १८ ।
८७. मायीय मल—दे० टि० ६० ।
८८. कार्ममल दे० टि० ६० ।
८६. कला...नियति दे० टि० (१८) : १८
शक्ति के संकोच वा परिच्छिन्नत्व को निम्नलिखित सारणी में व्यक्त
किया जा सकता है।

टिप्पणियाँ १२३
शिव में वर्तमान शक्ति अणु वा जीव में शक्ति का
परिच्छिन्नरूप
१-सर्वकर्तृत्व कला वा किंचित्कर्तृत्व
२-सर्वज्ञत्व विद्या वा अल्पज्ञत्व
३-पूर्णत्व वा नित्यतृप्ति राग वा भिन्न वस्तुओं के प्रति
आसक्ति
४-नित्यत्व काल वा अनित्यत्व
५-व्यापकत्व या स्वातन्त्र्य नियति वा देश और कारण का
बन्धन ।
६०. ईश्वराद्वयदर्शन का अर्थ है वह दर्शन जो यह मानता है कि ईश्वर
को छोड़कर कोई दूसरा तत्व है ही नहीं । यह कश्मीर के शैवदर्शन का ही
नाम है जो यह मानता है कि एकमात्र शिव ही परमार्थ है। शिवके अतिरिक्त
कोई दूसरा तत्व नहीं है । यहां ईश्वर शब्द शिव का ही पर्यायवाची है । शिव
ही क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय के रूप में प्रकट होता है ।
६१. ब्रह्मवादियों से यहाँ उन वेदान्तियों से तात्पर्य है जो ब्रह्म के अति-
रिक्त माया तत्व को सृष्टि, स्थिति और संहार का कारण मानते हैं।
शब्दतः ब्रह्मवादी का अर्थ है ब्रह्म सिद्धान्त को मानने वाला ।
६२. शुद्धेतराध्वः—शुद्ध से भिन्न अध्वा अर्थात् अशुद्ध अध्वा । अध्वा
शब्द का अर्थ है मार्ग । पारलौकिक सृष्टि को 'शुद्ध अध्वा' कहते हैं। और
लौकिक सृष्टि को 'अशुद्ध अध्वा' । सदाशिव ईश्वर और शुद्धविद्या शुद्ध
अध्वा के अन्तर्गत हैं। माया से लेकर पञ्चमहाभूत तक 'अशुद्ध अध्वा' के
अन्तर्गत हैं । इसको 'अशुद्ध अध्वा' इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें भेदबुद्धि
रहती है । शुद्ध अध्वा में अभेदबुद्धि रहती है ।
६३. पाँच प्रकार का कृत्य ( पंचविधकृत्य ) दे० टि० ४ । सूत्र १० में
इस पांच प्रकार के कृत्य का वर्णन ज्ञानमीमांसा की दृष्टि से हुआ है ।
६४ यह विलय इसलिए कहलाता है क्योंकि इसमें चिद्रूप महेश्वर अपने
वास्तविक स्वरूप का गोपन कर लेते हैं ।
६५. ज्ञान में ज्ञेय ज्ञाता से एकाकार हो जाता है । प्रमिति का प्रमेय
की परिच्छिन्नता से मुक्त होते पर प्रमाता से तादात्म्य हो जाता है ।
६६. यहाँ पर पंचकृत्यों का वर्णन योगी के आन्तरिक अनुभव की दृष्टि
से किया गया है । इस दृष्टि से आभासन सृष्टि है, रक्ति स्थिति है, विमर्शन
संहार है, बीजावस्थापन विलय है, और विलापन अनुग्रह है ।

१२४ प्रत्यभिज्ञाहृदय
६७. महार्थ—इस शास्त्र का महार्थ रहस्यात्मक प्रकार है।
६८. 'अहा ! कैसा अद्भुत है'। इस प्रकार का अनुभव विमर्शन या
चमत्कार कहलाता है। कलात्मक अनुभूति में जो एकाएक विचित्र आनन्द
होता है उसमें 'चमत्कार' का अनुभव होता है।
६६. पदार्थ के ज्ञान या प्रमेय को 'संहार' इसलिए कहा है, क्योंकि
ज्ञान के समय पदार्थ बाह्यजगत् से संहृत होकर अर्थात् सिमट कर अपनी
आन्तरिक चेतना की वस्तु बन जाता है। पदार्थ का पदार्थत्व या विषयत्व
समाप्त होकर वह आन्तरिक चेतना का ज्ञान बन कर रह जाता है।
१००. हठपाक—दो प्रकार से प्रमेय (अपने से भिन्न ज्ञेय विषय) प्रमातृ-
स्वरूप से एकाकार बन जाता है। वे प्रकार है (१) शान्तिप्रशम (२) हठ-
पाकप्रशम । 'प्रशम' का अर्थ है प्रमेय को प्रमातृभाव में लाकर एकाकार कर
लेना। शान्तिप्रशम वह प्रकार है जिसमें शान्ति से धीरे धीरे क्रमशः प्रमेय
को प्रमातृभाव में लाकर एकाकार किया जाता है। हठपाकप्रशम वह प्रकार
है जिसके द्वारा उपदेश के बल से एकदम, एक बार ही, प्रमेय का चिदग्नि
में पाक हो जाता है अर्थात् प्रमेय प्रमाता से एकाकार हो जाता है। सृष्टि
आदि उपाधियाँ बिलकुल चिदग्नि में विगलित हो जाती हैं।
१०१. अलग्रास—अलं का अर्थ है पूर्णरूप से, जिसमें संसार का कोई
संस्कार भी न रह जाय। ग्रास का अर्थ है ग्रसन अर्थात् निगल जाना।
अर्थात् प्रमेयों को स्वात्मसात् कर लेना, प्रमाता के साथ एकाकार कर लेना।
१०२. 'मन्त्र'—दो अक्षरों से बना है—'मन'+'त्र'। 'मन्' का अर्थ
है मनन करना और 'त्र' का अर्थ है त्राण। मनन करने से जो त्राण करे वह
मंत्र है। मन्त्र उन अक्षर, शब्द वा शब्दों को कहते हैं जिनके उच्चारण और
मनन से शक्ति जागृत होती हैं। इस सन्दर्भ में संसार से मोक्ष दिलाने की
शक्ति अभिप्रेत हैं।
१०३. दे० टि० ७४-७५। यह ध्यान में रखना चाहिए कि प्रत्यवमर्शात्मा
चिति ही परावाक् है। वह परमात्मा का मुख्य स्वातन्त्र्य और ऐश्वर्य है।
अमायीय अक्षरों से जनित आन्तरिक शब्द करती रहनेवाली चिति को नित्य
उदित (सदा उच्चरित की गई हुई) परावाक् कहते हैं। पूर्ण होने के कारण
इसको 'परा' और प्रत्यवमर्श द्वारा विश्व का अभिलाष करने के कारण
इसको 'वाक्' कहा जाता है। 'पूर्णत्वात् परा', वक्ति विश्वमभिलपति
प्रत्यवमर्शेन इति च 'वाक्' ई० प्र० वि० पृ० ५३।
१०४. इसमें देवनागरी लिपि के सभी अक्षर समाविष्ट हैं। शैव दर्शन
के अनुसार ये अक्षर भिन्न भिन्न शक्तियों के प्रतीक हैं।

टिप्पणियाँ १२५
१०५, दे० टि० ७४-७५ ।
१०६, दे० टि० ४८ । 'विकल्प क्रिया' विक्षेपशक्ति का संकेत करती हैं
जिसके द्वारा भिन्न भिन्न पदार्थों का अवभास होता है । तदाच्छादितामेव-
से आवरण शक्ति का संकेत है जो आत्मस्वरूप पर आवरण (परदा) डाल
कर अविकल्प भूमि को छिपा देती है । इसी एक वाक्य में लेखक ने शक्ति
के विक्षेप और आवरण दोनों रूपों का संकेत कर दिया है ।
१०७. 'अविकल्प निर्विशेष चेतना की भूमि है । यह भूमि 'यह' 'वह'
इत्यादि विशेषों से परे विज्ञप्ति मात्र है । यह तुर्यातीत अवस्था है ।
१०८—'ककार इत्यादि अक्षरों की ब्राह्मी इत्यादि अधिष्ठात्री देवताएँ
हैं । ये भिन्न भिन्न शक्तियाँ हैं जो ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी,
वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डी और महालक्ष्मी नामों से अभिहित की जाती हैं ।
प्रत्येक वर्ग की अधिष्ठात्री देवी इस प्रकार है :--
अधिष्ठात्री देवी वर्ग
१. ब्राह्मी कवर्ग
२. माहेश्वरी चवर्ग
३. कौमारी टवर्ग
४. वैष्णवी तवर्ग
५. वाराही पवर्ग
६. इन्द्राणी यवर्ग
७. चामुण्डा शवर्ग
८. महालक्ष्मी अवर्ग
१०६. भाव यह है कि जब तक जीव पशुदशा में रहता है तब तक
शक्तियों का चक्र ( समुदाय ) भेद की सृष्टि और स्थिति (अर्थात् भेद की
उत्पत्ति और उसकी स्थिति) अवभासित करती है और अभेद का संहार
(मिटा देना, हटा देना) प्रकट करती है । इस दशा में जीव की प्रत्येक
वस्तु एक दूसरे से भिन्न प्रतीत होती है और यह भिन्नता का भाव बना
ही रहता है और अभेद की चेतना विलुप्त रहती है । पति दशा में जब
जीव बन्ध से मुक्त हो जाता है, तब पशुदशा के विपरीत अवस्था होती
है, तब वे ही शक्तियाँ अभेद की सृष्टि और स्थिति करती हैं और भेद
का संहार करती है । पतिदशा दो प्रकार की होती है—(१) अनादिसिद्ध-
दशा जो शाश्वत है जैसे शिव में (२) योगिदशा—वह जो योगियों को
अनुभूत होती है । यहाँ पर दूसरे प्रकार की ही पतिदशा का वर्जन है ।
यहाँ यह ध्यान देने की बात है कि पशुदशा में-भेद की सृष्टि और स्थिति

१२६ प्रत्यभिज्ञाहृदय
और अभेद का संहार करने में शक्तियों का चक्र काम करता है किन्तु पतिदशा
में अभेद की सृष्टि और स्थिति करने में और भेद का संहार करने में—इनका
चक्र विगलित हो जाता है और स्वयं शक्तियाँ काम करने लग जाती हैं ।
११०. भैरव मुद्रा—इसका लक्षण शास्त्रों में इस प्रकार दिया हुआ है—
अन्तर्लक्ष्यो बहिर्दृष्टिनिमेषोन्मेष-वर्जितः ।
इयं सा भैरवी मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता ॥
दृष्टि निमेष (पलकों का बन्द करना) और उन्मेष (पलकों का
खोलना) दोनों से वर्जित होकर बाहर की ओर लगी हो और चेतना बाहर
की ओर न जाकर भीतर में स्थित आत्मा को अपना लक्ष्य बनाये रहे अर्थात्
इन्द्रिय तो बाहर की ओर खुला हो, किन्तु चित्त भीतर की ओर पलटा हुआ
हो—यह अवस्था भैरवी मुद्रा की है जो कि सब तंत्रों में गुप्त रखी जाती है ।
१११. शुद्धविकल्प शक्ति—यह वह विकल्प (विशेष प्रकार की कल्पना)
है जिसमें साधक 'शिवोऽहं'—'मैं शिव हूँ' के भाव का अनुभव करता है ।
यह भी विकल्प है, किन्तु शुद्ध इसलिए कहा गया है क्योंकि इसमें साधक
अन्य विकल्पों को छोड़ कर परमात्मा से अपने तादात्म्य के भाव को बनाये
रखता है । यह परमात्मा से ऐक्य की चेतना है । इस शुद्ध विकल्प के
अभ्यास से साधक निर्विकल्प अवस्था में पहुँच जाता है । शुद्ध विकल्प द्वारा
साधक को यह अनुभव होने लगता है कि सारा विश्व मेरा ही (अर्थात्
आत्मा का ही) वैभव है ।
११२. विकल्प—दे० टि० ४६
११३. 'महेशता' अथवा माहेश्वर्य वह अवस्था है जिसमें जीवात्मा महेश
अथवा परमात्मा के साथ तादात्म्य का अनुभव करता है ।
११४. यहाँ पर ग्रन्थकर्ता ने यह बतलाया है कि इस शक्ति का वामेश्वरी
क्यों नाम पड़ा । 'वाम' शब्द 'वम्' धातु से सम्बद्ध है जिसका अर्थ होता है
वमन करना, बाहर फेंकना । यह शक्ति वामेश्वरी इसलिए कहलाती है
क्योंकि यह विश्व को परम शिव से वाहर फेंकती है । 'वाम' शब्द का अर्थ
बायाँ और विपरीत भी है । यह शक्ति वामेश्वरी इसलिए भी कहलाती है,
क्योंकि शिव में अभेद, पूर्णता की चेतना है किन्तु संसारदशा में उसके विपरीत
भेद और अपूर्णता की चेतना है और प्रत्येक जीव-शरीर, प्राण इत्यादि को
ही 'मैं' समझने लगता है । वामेश्वरी के 'वाम' में यह श्लेष वर्तमान है
जो अनुवाद में नहीं व्यक्त किया जा सकता ।
११५. खेचरी, गोचरी, दिक्चरी और भूचरी, वामेश्वरी शक्ति के
ही भिन्न भिन्न प्रकार हैं । खेचरी का सम्बन्ध प्रमाता से है, गोचरी का

टिप्पणियां १२७
सम्बन्ध अन्तःकरण से है, दिक्‌चरी का सम्बन्ध बहिष्करण (बाह्य इंद्रियों)
से है, भूचरी का सम्बन्ध भावों (पदार्थों) से है। ये शक्तिचक्र अपरि-
च्छिन्न सत्ता को परिच्छिन्न (परिसिमित) बनाते हैं। खेचरी चक्र के द्वारा चेतन
(आत्मा) अपरिमित प्रमाता से परिमित प्रमाता बन जाता है। गोचरी चक्र से वह
अन्तःकरण से परिच्छिन्न हो जाता है। दिक्‌चरी चक्र के द्वारा वहबहिष्करणों
से परिच्छिन्न हो जाता है। भूचरी चक्र के द्वारा वह भावों (पदार्थों) में ही
अटका रह जाता हैं।
खेचरी--खे (आकाशे) चरतीति खेचरी। 'ख' शब्द का अर्थ आकाश
है। 'खे' सप्तमी विभक्ति है। इसका अर्थ है 'आकाश में'। यहाँ पर
'ख' या आकाश चित् का प्रतीक है। इस शक्ति का नाम खेचरी इसलिए
पड़ा है क्योंकि इसका क्षेत्र चिद्‌गगन है। चिद्‌गगन के पारमार्थिक स्वभाव
की छिपाकर यह प्रमाता को परिमित बना देती है। वह अब पशु बन
जाता है।
गोचरी उसे कहते हैं जिसका क्षेत्र अन्तःकरण होता है। संस्कृत का 'गो'
शब्द गमन वा चलन का द्योतक है। किरण, गो, इन्द्रिय यह सब 'गो' कह-
लाता है क्योंकि इन सब में गमन का भाव निहित है। अन्तःकरण इन्द्रियों
का आश्रय है, वही इन्द्रियों को परिचालित करता है। इसलिए वह गोचरी
शक्तिचक्र का क्षेत्र है।
दिक्‌चरी वह शक्ति है जो दिक् (दिशाओं) में चलती रहती है।
बहिष्करण वा बाह्य इन्द्रियों का सम्बन्ध दिक् का देश से हैं। इसलिए
दिक्‌चरी शक्तिचक्र का क्षेत्र बाह्य इन्द्रियाँ हैं।
भूचरी में जो 'भू' शब्द है उसका अर्थ है 'होना'। जो कुछ हो गया
है वह 'भू' के अन्तर्गत है। अतः यह भाव अर्थात् पदार्थ वा प्रमेयों (विषयों)
का द्योतक हैं। सभी पदार्थ वा प्रमेय भूचरी के क्षेत्र हैं।
परिमितप्रमाता - उसका अन्तःकरण उसका बहिष्करण और उसके प्रमेय
सभी भिन्न शक्तिचक्रों की अभिव्यक्ति हैं।
११६. अन्तःकरण के तीन प्ररूप हैं—बुद्धि, अहंकार और मन। बुद्धि
का काम निश्चय करना है, अहंकार का काम अभिमान है जिसके द्वारा
जीव शरीर इत्यादि अनात्म पदार्थों से तादात्म्य स्थापित करता है और
भोक्ता बनता है और मन का कार्य है पदार्थों का 'यह घट है,' 'यह पट
है' इत्यादि प्रकार से, भेद-विकल्प करना।
११७. ऐश्वर्य शक्ति परमेश्वर अर्थात् परमशिव के प्रभुत्व अथवा आधि-
पत्य की शक्ति है। यह उसके स्वातंत्र्य शक्ति का ही दूसरा नाम है।

१२८ प्रत्यभिज्ञाहृदय
स्वातन्त्र्य शक्ति का यह भाव है कि परमशिव सब कुछ करने, न करने
अथवा अन्य प्रकार से करने में पूर्णतः स्वतंत्र है। उसके अतिरिक्त कोई
दूसरी ऐसी शक्ति नहीं जिसके दबाव से वह ऐसा करता हो ।
११८-११६. स्फुरत्ता प्रकाश का ही दूसरा नाम है और कर्तृता विमर्श
का दूसरा नाम है। प्रकाश और विमर्श को समझने के लिए देखिए टि० २१ ।
१२०. प्राण, अपान, समान शक्ति-पंचप्राण प्रसिद्ध हैं। वे हैं प्राण,
अपान, समान, उदान, व्यान । ये अधिकतर पाँच वायु के अर्थ में प्रयुक्त होते
हैं। इन्हीं पांच प्राणों से जीवों का जीवन चलता रहता है। प्राण शरीर से
भिन्न होते हैं। वे शरीर के सारे कार्य चलाते रहते हैं। प्राणों की अभिव्यक्ति
वायु के द्वारा होती है। प्राण सामान्य अर्थ में जीवन के कार्य चलाने वाली
सभी शक्तियों के लिए प्रयुक्त होता है। विशेष अर्थ में प्राण वह वायु है जो
नथने से बाहर निकलता है जिसे प्रश्वास कहते हैं। अपान वह वायु है जो
नीचे गुदा की ओर जाता है और जो मल-मूत्र को बाहर फेंकता है। समान
वह वायु है जो शरीर के भीतर कार्य करता हुआ अन्न इत्यादि के पचाने
के अनन्तर उनका शरीर में समीकरण करता है। उदान वह वायु है जो
ऊपर की ओर जाता है।
यहाँ पर प्राण, अपान, समान इत्यादि शक्ति कहे गये हैं। इन्हीं नाम के
वायु इन्हीं शक्तियों के कार्य हैं जैसे प्राण वायु प्राणशक्ति का कार्य है इत्यादि ।
प्राण, अपान, समान शक्तियों से जीव बद्ध होता है, वह पशु बनता
है और उदान और व्यान शक्तियों से वह मुक्त हो जाता है, पति बनता है।
१२१. पुर्यष्टक-यह सूक्ष्मशरीर का पर्याय है जो कि संस्कारो का
कोश है, जो स्थूल शरीर की भांति मृत्यु के समय नष्ट नहीं हो जाता ।
पुर्यष्टक = पुरी + अष्टक । पुरी का अर्थ है पुर (नगर) । अष्टक का अर्थ है अष्ट
(आठ) का समुदाय । पुर्यष्टक का अर्थ हुआ 'आठ के समुदाय वाला पुर' ।
यह अष्टक या आठ का समुदाय निम्नलिखित है:-
५-तन्मात्राएँ + बुद्धि + मन + अहंकार ।
१२२ इस सन्दर्भ में कला का अर्थ है, भाग, अंग जो जीव को परिमित
और बद्ध बनाते हैं।
१२३-जब प्राण और अपान तुल्यबल हो जाते हैं, तब उदान शक्ति
का आविर्भाव होता है। तब उदानशक्ति क्रियाशील हो जाती है और
मध्यधाम वा सुषुम्ना के भीतर में ऊपर की ओर जाती है और तुर्य अर्थात्
चेतना की चौथी अवस्था को प्रकट करती है।

६ टिप्पणियाँ १२६
१२४. 'मध्यधाम' मध्यवाली नाड़ी है जिसे सुषुम्ना कहते हैं । सुषुम्ना
की दोनों ओर नाड़ियाँ हैं जो भौतिक नाड़ियाँ नहीं हैं, किन्तु प्राण की
नाड़ियाँ हैं । जिसमें से कुछ प्रवाह होता है वह नाड़ी कहलाता है । सुषुम्ना
की दोनों ओर जो नाड़ियाँ हैं वे ईडा और पिंगला कहलाती हैं । ईडा नाड़ी
में प्राण का प्रवाह होता है और पिंगला में अपान का । ईडा सुषुम्ना की
बाईं ओर है और पिंगला दाहिनी ओर । ईडा को सूर्यनाडी और पिंगला
को चन्द्रनाडी भी कहते हैं । सुषुम्ना वह नाड़ी है जो मेरुदण्ड के भीतर से
होकर ऊपर मस्तिष्क की ओर जाती है । मनुष्य में सामान्यतः प्राण और
अपान शक्तियाँ ही क्रियाशील रहती हैं। जब योग के अभ्यास से प्राण और
अपान की धाराएं तुल्यबल हो जाती हैं, तब मध्यधाम अर्थात् सुषुम्ना का
मार्ग खुल जाता है और उदान की धारा उसके भीतर से सहस्रार की ओर
बहने लगती हैं और तब चेतना की तुर्यअवस्था घटित होती हैं ।
१२५. तुर्य--तुर्य शब्द का अर्थ है चौथा । चतुर् शब्द का अर्थ होता
है चार । तुर्य शब्द 'चतुर् + यत्' से बना है 'चतुर्' के 'च' का लोप हो
जाता है, केवल 'तुर्' रह जाता है और यत् प्रत्यय के त् का लोप हो
जाता है, केवल 'य' रह जाता है । 'तुर् + य' से 'तुर्य' हो जाता है जिसका
अर्थ होता है चौथा ।
सामान्यतः मनुष्य की चेतना तीन अवस्थाओं में कार्य करती रहती है-
जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति ( गाढ़ निद्रा ) । जब मध्य धाम अथवा सुषुम्ना में
उदान शक्ति क्रियाशील होती है, तो तुर्य अर्थात् चौथी अवस्था की चेतना
की उपलब्धि होती है । इस अवस्था में अभेद बुद्धि होती है, भेदबुद्धि चली
जाती है । यह अवस्था आनन्दपूर्ण होती है ।
प्रथम अर्थात् जाग्रत् अवस्था में, देह, प्राण मन और इन्द्रियां क्रियाशील
रहती हैं । द्वितीय अर्थात् स्वप्न की अवस्था में केवल प्राण और मन क्रियाशील
रहते हैं। तृतीय अर्थात् सुषुप्ति अवस्था में मन भी निष्क्रिय हो जाता
है और आत्मा अर्थात् शुद्ध चैतन्य को केवल शून्य का बोध रह जाता है ।
तुर्य अर्थात् चौथी अवस्था में जीव उपर्युक्त अवस्थाओं से छुटकारा पा जाता
है और चिदानन्दघन अवस्था में रहता है ।
हमारी जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाएँ परस्पर पृथक् होती हैं अर्थात्
जाग्रत् अवस्था में स्वप्न और सुषुप्ति की अवस्था नहीं रहती । स्वप्नावस्था
में जाग्रत् और सुषुप्ति की चेतना नहीं रहती, सुषुप्ति अवस्था में जाग्रत् और
स्वप्न की चेतना नहीं रहती । जब हम एक अवस्था में रहते हैं, तो हमें
अन्य दो अवस्थाओं का बोध नहीं रहता । प्रत्येक अवस्था का बोध पृथक्

१३० प्रत्यभिज्ञाहृदय
पृथक् होता है। इन तीनों अवस्थाओं में हमारी चेतना खण्डशः कार्य करती
है। किन्तु जब हमें तुर्यावस्था की उपलब्धि होती है, तो हमें बराबर तीनों
अवस्थाओं का बोध रहता है। तुर्य अखण्ड सम्पूर्ण चेतना है, उसे सदा तीनों
अवस्थाओं का बोध रहता है। तुर्य अविच्छिन्न चेतना है।
जब तुर्य चेतना दृढ़रूप से प्रतिष्ठित हो जाती है, तो मन की खण्डवृत्ति
अर्थात् मन का खण्डशः विभागशः जानने का स्वभाव क्षीण हो जाता है।
तुर्य चेतना एक ऐसी अवस्था है जिसके द्वारा हमें जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों
अवस्थाओं का सदा बोध रहता है। माया के कारण हममें भेदबुद्धि रहती
है। तुर्य अर्थात् चौथा एक सापेक्ष शब्द है। यह जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति
इन तीन अवस्थाओं की अपेक्षा से तुर्य वा तुरीय (चौथा) कहा जाता
है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—ये तीनों अवस्थाएँ विलुप्त नहीं हो जातीं।
केवल यह होता है कि तुर्य-अवस्था को उपर्युक्त तीनों अवस्थाओं का सदा
बोध रहता है। वह उपर्युक्त तीन अवस्थाओं से छिन्न नहीं रहती। तुर्य
अवस्था उदानशक्ति के द्वारा सम्पन्न होती है।
१२६. व्यानशक्ति—समष्टि की दृष्टि से यह विश्व भर में व्याप्त
है; व्यष्टि की दृष्टि से कुण्डलिनी के जाग्रत् होने पर यह सारे शरीर
में व्याप्त हो जाती है और इसके द्वारा तुर्यातीत अवस्था सम्पन्न होती है।
१२७—तुर्यातीत दशा:—इसका अर्थ है 'तुर्य अर्थात् चौथे से अतीत'।
यह तुर्य से परे की अवस्था है। तुर्य (चौथा) जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—
इन तीन अवस्थाओं की अपेक्षा से तुर्य कहलाता है। तुर्यातीत दशा में
उपर्युक्त तीन अवस्थाओं का विलोप हो जाता है। इसलिए जब तीन अव-
स्थाओं का विलोप हो जाता है, तब तुर्य जो उन तीनों की अपेक्षा से तुर्य
कहलाता था फिर तुर्य नहीं कहा जा सकता। तब वह अवस्था तुर्यातीत
कहलाती है अर्थात् वह अवस्था जिसमें तुर्य अतीत हो गया है, चला गया
है, समाप्त हो गया है। तुर्यातीत दशा में चेतना निस्तरङ्ग महोदधि के
समान हो जाती है और आनन्द से परिपूर्ण होती है। यह शिव-चेतना है।
यह वह अवस्था है जिसमें समस्त विश्व का अपने आत्मा जैसे भान होता
है। तुर्य दशा में मन केवल क्षीण हो जाता है, तुर्यातीय दशा में वह
शक्ति में विलीन हो जाता है। जब तुर्य अवस्था पूर्णरूप से विकसित होकर
अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाती है, तब वह तुर्यातीत में परिणत हो जाती
है। इस अवस्था में व्यक्ति को सब कुछ शिव या आत्मा जैसा प्रतीत होता है।
१२८. पतिदशा—यह वह दशा है जिसमें जीव का पति अर्थात् शिव से
तादात्म्य हो जाता है।

टिप्पणियाँ १३१
१२६. ६ वें विद्वत् सूत्र में संसारित्व का वर्णन परमशिव के दृष्टिकोण
से किया गया है। उसमें यह बतलाया गया है कि किस प्रकार परमशिव अपने
स्वातन्त्र्य से अपनी इच्छा ज्ञान-क्रिया शक्तियों का संकोच करके संसारित्व
सम्पादित करता है। इस १२वें सूत्र में संसारित्व का वर्णन जीव के दृष्टिकोण
से किया गया है। इसमें यह बतलाया गया है कि किस प्रकार जीव पशुदशा
में अपने ही शक्तिचक्रों से व्यामोहित होकर संसारित्व को प्राप्त होता है और
किस प्रकार पतिदशा में उदानशक्ति से तुर्यावस्था और व्यानशक्ति से तुर्यातीत
अवस्था में पहुँच जाता है। जीव पशुदशा में शक्तिचक्रों से व्यामोहित होकर
संसारी बनता है, पतिदशा में शक्ति के विकास से जीवन्मुक्ति लाभ करता है।
१३०. यहाँ यह नहीं बतलाया गया हे कि ग्रन्थकार प्रत्यभिज्ञा की किस
टीका का संकेत कर रहा है। सम्भवतः उत्पलाचार्य ने ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका
पर जो विवृति लिखी थी और जो अभी तक उपलब्ध नहीं हुई है उसी का
संकेत ग्रन्थकार ने किया है।
१३१. चित्त--जीव की संकुचित संवित् ।
१३२. चेतन-इस शब्द का इस प्रसंग में अर्थ है आत्मा की तात्विक संवित् ।
१३३. चिति-संवित् का असंकुचित वास्तविक स्वरूप। इसे चित् भी
कहते हैं। चित् की शक्ति को प्रायः 'चिति' कहते हैं।
१३४. उत्पलदेव या उत्पलाचार्य का काल ६००-६५० ईसवी शती
है। यह उद्धरण शिवस्तोत्रावली से किया गया है।
१३५. परम्परागत त्रिमूर्ति है-ब्रह्मा, विष्णु, शिव। इस शास्त्र में शिव
चरम सत् के लिए प्रयुक्त हुआ है। इसलिए इसमें शिव के स्थान में इन्द्र
शब्द का प्रयोग हुआ है।
१३६. यह उद्धरण वसुगुप्त की स्पन्दकारिका का है। पूरी कारिका इस
प्रकार है :-
तदाक्रम्यबलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः ।
प्रवर्त्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनाम् ॥ (स्प० २ का १०)
अर्थात् मन्त्र (चिति) के उस बल को प्राप्त कर सर्वज्ञ (शिव) के
बल से सम्पन्न हो जाते हैं और तब अपने अधिकृत कार्य में प्रवृत्त होते हैं
जैसे देही (व्यक्ति) की इन्द्रियाँ (देही की शक्ति से अपने अधिकृत कार्य
में प्रवृत्त होती हैं, केवल अपने से ही नहीं)।
१३७. समावेश समाधि की वह अवस्था है, जिसमें एकत्व का बोध
होता है, जिसमें समस्त विश्व का आत्मवत् बोध होता है, जिसमें जीव
की चेतना शिव की चेतना से तादात्म्य लाभ करती है।

१३२ प्रत्यभिज्ञाहृदय
१३८. व्युत्थानदशा-व्युत्थान का शाब्दिक अर्थ है 'उठना'। व्युत्थानदशा का
अर्थ है समाधिदशा से चित्त का साधारण दैनिक जीवन की दशामें आ जाना ।
१३६. देहप्राणनीलसुखादिषु-'देहप्राण' प्रमाता का सूचक है। इसमें
सापेक्ष बुद्धि से देह बाह्य है और प्राण आन्तर, 'नीलसुखादि' प्रमेय का
सूचक है। इसमें 'नील' बाह्यप्रमेय ओर 'सुख' आन्तर प्रमेय का सूचक है।
१४०. मध्य-मध्यनाड़ी; 'मध्य' शाम्भव दृष्टि से सर्वव्यापी चित् है
जो कि सबके भीतर की मध्यभूत सत्ता है। वह शिव की विशुद्ध अहंता
(अहं-चेतना) है। 'शक्ति' की दृष्टि से वह ज्ञान-क्रिया है। 'अणु' (जीव)
की दृष्टि से वह मध्य नाड़ी है।
मध्यनाड़ी अथवा मध्यमानाड़ी सुषुम्ना नाड़ी है जो ईडा और पिंगला के
बीच की नाड़ी है।
'नाडी' शब्द नड धातु से व्युत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ गिरना या बहना
है। जिसमें से कुछ गिरे या बहे वह नाडी है। नाडी वह नली है जिसमें
से प्राण का प्रवाह होता रहता है। सुषुम्ना नाडी का मध्य वा मध्यमानाडी
नाम इसलिए है क्योंकि वह शरीर के मध्य में है। 'सुषुम्ना' शब्द की
व्युत्पत्ति सन्दिग्ध है। शब्दकल्पद्रुम के अनुसार इसकी व्युत्पत्ति है 'सुषु
इत्यव्यक्तशब्दं मनति' (सुषु+√म्ना) अर्थात् जो 'सुषु' यह अव्यक्त
ध्वनि करती रहती है, वह सुषुम्ना है। कुछ लोगों ने नाडी को 'नर्व'
(वायुनाडी) और चक्रों को 'गैंग्लिया' (नाडी ग्रन्थि) समझ रखा
है। यह भ्रम है। योग की नाडी और चक्र स्थूल शरीर के अङ्ग नहीं हैं।
वे सूक्ष्म शरीर में प्राणमयकोश के अंग हैं। केवल उनका संस्पर्श और
प्रभाव स्थूल शरीर के 'नर्व' (नाडी) और 'गैंग्लिया' (नाडीग्रन्थियों)
के द्वारा व्यक्त होता है। चक्र प्राणशक्ति के अधिष्ठान हैं।
१४१. प्राणशक्ति का इस सन्दर्भ में तात्पर्य सर्वव्यापी आद्या प्राणशक्ति
से है, न कि व्यक्ति के भीतर जो प्राणवायु है। चिति का आत्मस्वरूप को
गोपन करने के लिये और धीरे धीरे पञ्चमहाभूत में परिणत हो जाने में यह
पहला क्रम है। इस प्राणशक्ति को महाप्राण भी कहते हैं।
१४२ ब्रह्मरन्ध्र-तंत्रशास्त्र के अनुसार प्राणमय कोश में कई चक्र
अवस्थित हैं जो कि प्राण के भिन्न भिन्न केन्द्र हैं। ये चक्र इसलिए कहलाते
हैं क्योंकि इनकी आकृति चक्र (चाक) जैसी प्रतीत होती है। इनके भीतर
प्राण पुञ्जीभूत रहता है और प्राणमयकोश के माध्यम से उस प्राण का
वितरण सारे स्थूल शरीर को होता है।

टिप्पणियां १३३
जब ऊपर के चक्र जाग्रत् हो जाते हैं तब साधक को कुछ सूक्ष्म और गुह्य
अनुभव होते हैं । उनके नाम स्थूल शरीर के सबसे निकट के अवयवों के साथ
नीचे दिये हैं ।
संस्था | सबसे निकट का स्थूलशरीर का अवयव | चक्र
१. जननेन्द्रिय के नीचे मेरु दण्ड का प्रदेश मूलाधार
२. जननेन्द्रिय के ऊपर ,, ,, स्वाधिष्ठान
३. नाभि का ,, ,, मणिपूर
४. हृदय का ,, ,, अनाहत
५. कण्ठ के नीचे का ,, ,, विशुद्ध
६. भ्रूमध्य का ,, ,, आज्ञा
७. सिर का ऊपरी भाग ,, ,, सहस्रार अथवा
ब्रह्मरन्ध्र ।
१४३. अधोवक्त्र–इसका शब्दार्थ है नीचे का अवयव । इसको मेढ्रकन्द
भी कहते हैं । यह गुदा के मूल में है ।
१४४. पलाशपत्र–ढाक के पत्ते को पलाशपत्र कहते हैं । पलाशपत्र की
मध्य शाखा का तात्पर्य है 'मध्यतन्तु' । सुषुम्ना की पलाशपत्र के मध्यतन्तु
से उपमा दी गई है । जो नाड़ियाँ सुषुम्ना से शरीर में चारों ओर जाती
हैं, उनकी उपमा पलाशपत्र के मध्यतन्तु में जुड़ी हुई अन्य तन्तुओं से दी गई
हैं जो कि उस पत्र के चारों ओर फैली हुई हैं ।
१४५. मध्यम नाड़ी—सुषुम्ना है जो कि मेरुदण्ड के भीतर से होती हुई
मस्तिष्क तक जाती है । यह मूलाधार से सहस्रार तक प्रसृत है । सुषुम्ना
आग के समान चमकती हुई तामसिक नाडी है । इसके भीतर दीप्तिमती
वज्रा या वज्रिणी नाडी है जो राजसिक है । इस वज्रिणी नाडी के भीतर
पीतवर्ण की चित्रा या चित्रिणी नाडी है जो सात्त्विक है । इसी चित्रिणी
नाडी के भीतरी भाग को ब्रह्मनाडी कहते हैं । तंत्रों ने सुषुम्ना को 'वह्नि-
स्वरूपा' ( आग के समान ) वज्रिणी को सूर्यस्वरूपा ( सूर्य के समान )
चित्रिणी को चन्द्रस्वरूपा ( चन्द्र के समान ) बतलाया है । चित्रिणी नाडी
जहाँ समाप्त होती है वहाँ जो छिद्र है वह ब्रह्मद्वार कहलाता है । इसी द्वार
के भीतर से कुण्डलिनी शक्ति ऊपर को जाती है ।
ईडा और पिंगला नाडियाँ सुषुम्ना के बाहर हैं जो कि समानान्तर रूप
में उसके ऊपर से जाती है । बाईं ओर ईडा है और दाहिनी ओर पिंगला ।

१३४ प्रत्यभिज्ञाहृदय
ये नाडियाँ धनुषाकारवत् टेढ़ी हैं। ये नासारन्ध्र पर्यन्त तक गई हैं। मेरु-
दण्ड के मध्य में सुषुम्ना है। उसके बाहर बाईं ओर ईडा है और दाहिनी
ओर पिंगला इन तीनों का आज्ञा चक्र के पास संयोग होता है जो कि
त्रिवेणी कहलाता है।
१४६. यह विकास शाम्भवोपाय और शाक्तोपाय की दृष्टि से होता है।
१४७. ब्रह्मनाडी—यह मध्यनाडी या सुषुम्ना का ही दूसरा नाम है।
१४८. यदामध्यभूता ब्रह्मनाडी विकसति—यह विकास आणवोपाय की
दृष्टि से होता हैं।
१४६. प्राणायाम का अर्थ है प्राण का आयाम। आयाम का भाव है
नियमन अर्थात् नियमित करने की क्रिया।
प्राण-अपान, श्वास-प्रश्वास को एक विशेष नियम से लेने और छोड़ने
की क्रिया को प्राणायाम कहते हैं।
१५०. मुद्रा—इसका साधारण अर्थ है 'छाप, मोहर'। योग में इसका अर्थ
होता है विशेष अंग-विन्यास, (विशेष रूप से हाथ और अँगुलियों की
निश्चित स्थिति)। अधिक व्यापक रूप में इसका अर्थ होता है कुछ अवयवों
और इंद्रियों का विशेष-नियंत्रण जिससे ध्यान और समाधि में सहायता
मिलती है, जैसे भैरवी मुद्रा। देखिए घेरण्डसंहिता-तृतीयोपदेश।
१५१. बन्ध—इसका शाब्दिक अर्थ है 'बाँधना'। इस सन्दर्भ में इसका
अर्थ है योग की वह क्रिया जिसमें किसी विशेष अवयव या अंग को आकुंचित
करके रोके रखते हैं।
१५२. हृदय—इसका अर्थ यहाँ पर वह हृदय या मासपिण्ड नहीं है
जिसके द्वारा सारे शरीर में रक्त प्रसारित होता है। यहाँ पर हृदय का भाव
है 'अन्तस्तम चेतना'। इसको हृदय इसलिए कहा है क्योंकि यह समस्त
सत्ता का केन्द्र है। यह वह प्रकाश है जिसमें सारा विश्व निहित है।
व्यक्ति में यह आध्यात्मिक केन्द्र है।
१५३. विकल्प—दे० टि० ४६।
१५४. तुर्य—दे० टि० १२५।
१५५. तुर्यातीत—दे० टि० १२७।
१५६. यहाँ पर क्षेमराज ने भूल की है। कठोपनिषद्—अथर्ववेद की
नहीं है, यजुर्वेद की है। अश्नन् के स्थान पर प्रायः इच्छन् पाठ मिलता है।
१५७ स्वसंवित्ति अथवा आत्मचेतना की दो स्थिति होती है -(१)
शान्तोदित (२) नित्योदित। (१) शान्तोदित वह स्थिति है जिसमें आत्म-
चेतना का आविर्भाव होता है, किन्तु फिर तिरोभाव हो जाता है। (२)

टिप्पणियां १३५
नित्योदित में आत्मचेतना का सदा आविर्भाव बना रहता है, कभी तिरो-
भाव नहीं होता । आत्मा तो नित्योदित है ही, उसमें हमारी चेतना की
स्थिति बराबर नहीं रहती । शक्तिसंकोच के सिद्ध होने पर हमारी चेतना
की नित्योदित में स्थिति हो जाती है ।
१५८. ऊर्ध्वकुण्डलिनी—जब प्राण और अपान सुषुम्ना में प्रवेश करते हैं
और कुण्डलिनी ऊपर को उठती है तो उसे ऊर्ध्वकुण्डलिनी कहते हैं । कुण्ड-
लिनी एक विशेष शक्ति है जो मूलाधार में ३½ वलयों (लपेटों) में प्रसुप्तरूप
से वर्तमान है । जब वह मंत्र अथवा ध्यान के द्वारा जाग्रत् होती है, १ ३/४
वलयों से सुषुम्नानाड़ी के भीतर से ऊपर की ओर उठती है, लम्बिका को
पारकर ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँचती है, तो वह ऊर्ध्वकुण्डलिनी कहलाती है
और उसकी इस व्याप्ति को विकास या विष कहते हैं । जिह्वामूल के पास
चार प्राण नाड़ियों के चतुष्पथ ( चौराहा ) को लम्बिका कहते हैं । दो
नाड़ियां वे हैं जिनके द्वारा सभी जीवों में प्राण का प्रवाह होता है । तीसरी
नाडी वह है जिसके द्वारा योगी मूलाधार से ऊर्ध्वकुण्डलिनी के द्वारा ब्रह्मरन्ध्र
तक जाता है जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है। चौथी नाडी उन सिद्ध
योगियों के लिए हैं जिनका प्राण-वायु बिना मूलाधार से होकर सीधे ब्रह्मरन्ध्र
को चला जाता है ।
१५६. षष्ठवक्त्र—यहाँ वक्त्र का अर्थ अवयव है आँख, कान, नाक,
मुख और पायु को पंचवक्त्र कहते हैं । मेढ्रकन्द को जो गुदा के मूल में है
षष्ठवक्त्र ( छठाँ अवयव ) कहते है ।
१६०. अधः कुण्डलिनी—लम्बिका से मूलाधार में वर्तमान कुण्डलिनी के
१ ३/४ वलय तक का क्षेत्र अधः कुण्डलिनी का है । प्राण का प्रवाह अधः
कुण्डलिनी के द्वारा लम्बिका से मूलाधार की ओर होता है । इस दशा को
संकोच या वह्नि कहते हैं । प्राण और अपान का मिलकर सुषुम्नाधाम के
द्वारा मूलाधार तक आ जाने का नाम अधः कुण्डलिनी है ।
१६१. वह्नि-विष—वह्नि का अधःकुण्डलिनी से संबंध हैं और विष का
ऊर्ध्वकुण्डलिनी से । अधः कुण्डलिनी में प्रवेश ( आवेश ) संकोच अथवा
वह्नि कहलाता है। ऊर्ध्वकुण्डलिनी में उठना विकास अथवा विष कहलता है ।
वह्नि का प्राण वायु से सम्बन्ध है और विष का अपान वायु से । जब प्राण
सुषुम्ना में प्रवेश करता है और अधःकुण्डलिनी अथवा मूलाधार तक जाता है
तब इस दशा को वह्नि कहते हैं। अधःकुण्डलिनी के मूल और आधे मध्य तक
में प्रवेश वह्नि अथवा संकोच कहलाता है । वह्नि शब्द वह धातु से निष्पन्न
हुआ है जिसका अर्थ है ‘ले चलना, ले जाना’ । अग्नि को वह्नि इसलिए
कहते हैं क्योंकि वह जो कुछ उसमें हवन किया जाता है उसे देवों त कले

४. चतुर्थ भाग (सूत्र १७-२०): शिव-समापत्ति, चिदानन्द-लाभ एवं ग्रन्थ-उपसंहार

१३६ प्रत्यभिज्ञाहृदय
जाती है। इस दशा में प्राण का मूलाधार तक वहन होता है (अर्थात् जाता
है)। इसलिए उसे वह्नि कहते हैं।
अधःकुण्डलिनी के मध्य के शेष अर्धभाग और उसके पूर्ण अग्रभाग से
लेकर ऊर्ध्वकुण्डलिनी तक में आवेश अथवा प्रवेश विष कहलाता है।
इस प्रसंग में विष शब्द का अर्थ जहर नहीं है। विष शब्द विष् धातु
से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है 'व्याप्त होना, फैल जाना'। अतः विष का
अर्थ है प्रसर या विकास। जहर को विष इसलिए कहते हैं क्योंकि वह सारे
शरीर में व्याप्त हो जाता है। 'वह्नि और विष के मध्य में चित्त को फेंकना
चाहिए'-यह कहने का तात्पर्य यही है कि जब प्राण और अपान सुषुम्ना में
प्रवेश करते हैं तब चित्त को वह्नि और विष के बीच में अर्थात् अधः कुण्ड-
लिनी और ऊर्ध्वकुण्डलिनी के बीच में निरुद्ध कर देना चाहिए। निरुद्ध कर
देने का तात्पर्य यह है कि वहीं उसे रोक देना चाहिए।
१६२. स्मरानन्द—इस प्रकार जब चित्त अधः और ऊर्ध्वकुण्डलिनी के
बीच में निरुद्ध किया जाता है तब मैथुन के आनन्द की अनुभूति होती है।
यह परावृत्त कामानन्द है। मैथुन का संगम बाह्य है, यह संगम आन्तरिक है।
१६३. इस स्थान पर इस सम्प्रदाय की यौगिक क्रिया का वर्णन है। मध्य
के विकास से ही सिद्धि होती है। अणु अर्थात् जीव के लिए इसका अर्थ है
सुषुम्ना में जो कि ईडा और पिंगला नाड़ियों के मध्य में है—प्राणशक्ति का
विकास। मध्य की सिद्धि का एक उपाय है शक्ति का संकोच और विकास।
संकोच और विकास के शाब्दिक अर्थ से इस यौगिक क्रिया का भाव नहीं व्यक्त
हो सकता। यहां पर संकोच का निम्नलिखित तात्पर्य है : जब इन्द्रियों के
द्वारा चित्त विषयों की ओर उन्मुख होता है, जब इन्द्रियां रूप, शब्द, गन्ध
इत्यादि के ग्रहण में लगी होती हैं, तब चित्त को उनकी ओर से खींच कर
भीतर की ओर उस आत्मतत्त्व की ओर लगा देना चाहिए जो कि सभी कार्यों
का उद्भव और अधिष्ठान है।
विकास का अर्थ है इन्द्रियों के बाहर खुले रहने पर भी भीतर की ओर
लक्ष्य रखना अर्थात् भैरवी मुद्रा का अभ्यास।
संकोच का भाव है बाह्य विषयों से प्रत्याहार। विकास का भाव इन्द्रियों
के विषयों के प्रति उन्मुख रहने पर भी आन्तरिक चेतना पर ध्यान।
संकोच और विकास का और अधिक संवर्धन किया जाता है ऊर्ध्वकुण्डलिनी
के स्तर पर प्रसर-विश्रान्ति द्वारा। इस सन्दर्भ में प्रसर को विकास का और
विश्रान्ति को संकोच का पर्याय समझना चाहिए। योगी सुषुम्ना में प्राणशक्ति
का विकास करता है और भ्रूमध्य में उसका निरोध कर ऊर्ध्वकुण्डलिनी के

टिप्पणियाँ १३७
स्तर पर पहुँचता है। यहाँ वह प्रसर-विश्रान्ति का अभ्यास करता है। संकोच-
विकास का संवर्धन अधःकुण्डलिनी में भी करना पड़ता है। अधःकुण्डलिनी
के मूल और मध्य के अर्धभाग में अनुप्रवेश संकोच अथवा वह्नि कहलाता है
और अधःकुण्डलिनी के शेष अर्धभाग और अग्रभाग में वहाँ तक अनुप्रवेश
जहां कि ऊर्ध्वकुण्डलिनी का पर्यवसान होता है विकास अथवा विष अथवा
उन्मीलन समाधि कहलाता है।
१६४. अनच्क—अच् = अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ओ, ऐ, औ = अर्थात् सभी
स्वर। अनच्क का तात्पर्य है ककार, हकार इत्यादि का बिना स्वर के
उच्चारण करना (क् ह्)। अनच्क उच्चारण का मुख्य भाव है किसी मंत्र पर
ध्यान करते हुए उसके उद्गम तक पहुँच जाना जहाँ वह उच्चारणरहित है।
१६५. प्राण हृदय से प्रारम्भ होता है और द्वादशान्त पर समाप्त होता
है अर्थात् हृदय से बारह अंगुल के अन्त पर समाप्त होता है। हृदय से यहाँ
तात्पर्य है 'उरः प्राचीर (डायफ्राम) का मध्य बिन्दु'। निभालन का तात्पर्य
है चित्त का हृदय से प्राण के प्रारम्भ होने और द्वादशान्त पर समाप्त होने
पर और अपान के द्वादशान्त पर प्रारम्भ होने और हृदय पर समाप्त होने
पर लगाना। प्राण के उठने और ठहरने पर और इसी प्रकार अपान के उठने
और ठहरने पर चित्त को लगाये रखना निभालन कहलाता है। यह बौद्धयोग
के प्राणापान-स्मृति (पानापानसति) के समान है। यह 'शक्ति-द्वादशान्त या
कौण्डली' कहलाता है। एक दूसरा द्वादशान्त ब्रह्मरन्ध्र के ऊपर है जिसे
'शिव-द्वादशान्त या प्रक्रियान्त' कहते हैं।
१६६. सुभगे (सुन्दरि) यह देवी को सम्बोधन करके कहा गया हैं।
इस दर्शन में बहुत सी रहस्य की बातें शिव और देवी के संवाद के रूप में
कही गयी है।
१६७. उन्मेष का शब्दार्थ है खिलना, विकास। यह शैवागमयोग का
एक पारिभाषिक शब्द है। इस ग्रन्थ में उन्मेषसम्बन्धी श्लोक की केवल
एक पंक्ति दी हुई है। पूरा श्लोक इस प्रकार है :—
एकचिन्ताप्रसक्तस्य यतः स्यादपरोदयः ।
उन्मेषः स तु विज्ञेयः स्वयं तमुपलक्षयेत् ॥
इसका अर्थ निम्नलिखित है। जब कोई एक विचार में लगा हुआ है
और दूसरे विचार का उदय होता है तब दोनों विचारों के सन्धिविन्दु के
संवेदन को उन्मेष समझना चाहिए। इसको कोई स्वयं देख ले अर्थात्
अनुभव कर ले।

१३८ प्रत्यभिज्ञाहृदय
चित्त का स्वभाव है एक विचार से दूसरे विचार की ओर क्रम से
चलते रहना, किन्तु यदि कोई एक विचार के समाप्त होते ही और दूसरे
विचार के उदय होने के ठीक पूर्व चित्तवृत्ति को विश्रान्त कर ले, तो वह
उन्मेष भाव को प्राप्त कर सकता है। इसका भाव है दो विचारों या
विकल्पों के बीच में जो संविद का स्पन्द है उसमें विश्रान्त होना अर्थात्
दोनों विचारों का जो आधार या अधिष्ठान है उसमें ठहर जाना । उन्मेष
की यह व्याख्या शाक्तोपाय दृष्टि से है।
शाम्भवोपाय की दृष्टि से अपने अभीष्ट ध्येय पर ध्याने करते करते
पारमार्थिक भाव का उदय होना 'उन्मेष' कहलाता है।
१६८. इन श्लोकों में, रसानुभूति पर ध्यान करने के द्वारा परमानन्द
के स्वरूप की अनुभूति के लिए तीन उपाय बतलाते गये हैं।
(१) आस्वादधारणा : खान-पान के आस्वाद के मूल पर ध्यान करना ।
(२) शब्दधारणा-संगीत से प्राप्त आनन्द के मूल पर ध्यान करना ।
(३) मनस्तुष्टिधारणा—जिस किसी वस्तु से मन को प्रसन्नता होती है
उसके मूल पर ध्यान करना ।
१६६. समावेश को समझने के लिए अभिनवगुप्त के तंत्रालोक के प्रथम
आह्निक के २०५ पृष्ठ को देखें । वह इस प्रकार है :—
आवेशश्चास्वतन्त्रस्य,
स्वतद्रूपनिमज्जनात् ।
परतद्रूपता शम्भो-
राद्याच्छक्त्यविभागिनः ( १.१७३ )
“आवेश ( समावेश ) का अर्थ है स्वातंत्र्यरहित परमित प्रमाता का
अपने संकुचित रूप को डुबोकर अर्थात् नगण्य बनाकर स्वतंत्र चैतन्य अर्थात्
परमशिव के साथ तादात्म्य कर लेना जो कि आद्या शक्ति से अभिन्न है।
समावेश का भाव है अपने संकुचित रूप को विगलित कर परम शिव के रूप
को ग्रहण कर लेना जो कि आत्मा का वास्तविक स्वरूप है ।
१७०. निमीलन समाधि—यह आँख मूंद कर ध्यान करने पर आन्तरिक
समाधि की वह दशा है जिसमें व्यक्तिगत चेतना (चित्त ) सर्वव्यापी चेतना
(चित्) में विलीन कर दी जाती है। इसमें वेद्य या ज्ञेय नहीं रह जाता ।
उसका चित् के साथ ऐक्य हो जाता है। यह वास्तविक अन्तर्मुखता है और
पूर्णाहन्ता की अनुभूति का मार्ग है ।
१७१. व्युत्थान—इसका शब्दार्थ है उठना । योग में इसका अर्थ है ध्यान
के अनन्तर सामान्य चेतना की स्थिति में आना ।