प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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शिव में वर्तमान शक्ति अणु वा जीव में शक्ति का
परिच्छिन्नरूप
१-सर्वकर्तृत्व कला वा किंचित्कर्तृत्व
२-सर्वज्ञत्व विद्या वा अल्पज्ञत्व
३-पूर्णत्व वा नित्यतृप्ति राग वा भिन्न वस्तुओं के प्रति
आसक्ति
४-नित्यत्व काल वा अनित्यत्व
५-व्यापकत्व या स्वातन्त्र्य नियति वा देश और कारण का
बन्धन ।
६०. ईश्वराद्वयदर्शन का अर्थ है वह दर्शन जो यह मानता है कि ईश्वर
को छोड़कर कोई दूसरा तत्व है ही नहीं । यह कश्मीर के शैवदर्शन का ही
नाम है जो यह मानता है कि एकमात्र शिव ही परमार्थ है। शिवके अतिरिक्त
कोई दूसरा तत्व नहीं है । यहां ईश्वर शब्द शिव का ही पर्यायवाची है । शिव
ही क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय के रूप में प्रकट होता है ।
६१. ब्रह्मवादियों से यहाँ उन वेदान्तियों से तात्पर्य है जो ब्रह्म के अति-
रिक्त माया तत्व को सृष्टि, स्थिति और संहार का कारण मानते हैं।
शब्दतः ब्रह्मवादी का अर्थ है ब्रह्म सिद्धान्त को मानने वाला ।
६२. शुद्धेतराध्वः—शुद्ध से भिन्न अध्वा अर्थात् अशुद्ध अध्वा । अध्वा
शब्द का अर्थ है मार्ग । पारलौकिक सृष्टि को 'शुद्ध अध्वा' कहते हैं। और
लौकिक सृष्टि को 'अशुद्ध अध्वा' । सदाशिव ईश्वर और शुद्धविद्या शुद्ध
अध्वा के अन्तर्गत हैं। माया से लेकर पञ्चमहाभूत तक 'अशुद्ध अध्वा' के
अन्तर्गत हैं । इसको 'अशुद्ध अध्वा' इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें भेदबुद्धि
रहती है । शुद्ध अध्वा में अभेदबुद्धि रहती है ।
६३. पाँच प्रकार का कृत्य ( पंचविधकृत्य ) दे० टि० ४ । सूत्र १० में
इस पांच प्रकार के कृत्य का वर्णन ज्ञानमीमांसा की दृष्टि से हुआ है ।
६४ यह विलय इसलिए कहलाता है क्योंकि इसमें चिद्रूप महेश्वर अपने
वास्तविक स्वरूप का गोपन कर लेते हैं ।
६५. ज्ञान में ज्ञेय ज्ञाता से एकाकार हो जाता है । प्रमिति का प्रमेय
की परिच्छिन्नता से मुक्त होते पर प्रमाता से तादात्म्य हो जाता है ।
६६. यहाँ पर पंचकृत्यों का वर्णन योगी के आन्तरिक अनुभव की दृष्टि
से किया गया है । इस दृष्टि से आभासन सृष्टि है, रक्ति स्थिति है, विमर्शन
संहार है, बीजावस्थापन विलय है, और विलापन अनुग्रह है ।