प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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७६. तान्त्रिक-तन्त्र के अनुयायी तान्त्रिक कहलाते हैं । तन्त्र शब्द की
व्युत्पत्ति दो प्रकार से बतलाई गई है ।
(१) तन् धातु से जिसका अर्थ है तानना, विस्तार करना । इस दृष्टि से
तन्त्र का अर्थ हैं वह शास्त्र जिसमें सृष्टि और जीवन के तत्त्व विस्तारपूर्वक
समझाये गये हैं ।
(२) तन्त्र धातु से जिसका अर्थ है शासन करनां, स्वायत्त करना ।
इस दृष्टि से तन्त्र का अर्थ है वह शास्त्र जो यह बतलांता है कि विभिन्न
शक्तियों को किस प्रकार स्वायत्त करना चाहिए ।
८०. कुल शब्द का अर्थ इस सन्दर्भ में शक्ति है । कुलादि आम्नायों का
यहाँ तात्पर्य है शाक्त शास्त्र ।
८१. त्रिक् का अर्थ है तीन का समूह शिव, शक्ति और नर । प्रत्य-
भिज्ञा दर्शन का यह दूसरा नाम है । इसके अनुसार परम अर्थ परमशिव है
जो तीन के समूह शिव, शक्ति और नर में अभिव्यक्त होता है । त्रिकादि में
जो आदि शब्द है उससे त्रिपुरा अथवा महार्थ समझा जा सकता हैं ।
८२. परशक्तिपात-शक्तिपात अर्थात् अनुग्रह दो प्रकार का है (१)
पर और (२) अपर । परशक्तिपात से अवच्छिन्न (परिसीमित) जीव
पूर्ण शिव की चेतना में रूपान्तरित हो जाता है । यह शक्तिपात केवल
परमेश्वर द्वारा हो सकता है । अपरशक्तिपात् से यद्यपि अवच्छिन्न जीव
शिव से अपने तादात्म्य का अनुभव कर लेता है तथापि वह अभी यह अनु-
भव नहीं करता कि सारा विश्व उसी की अभिव्यक्ति है और वह इस प्रकार
शिव की चेतना को नहीं प्राप्त कर पाता । अपर शक्तिपात गुरु अथवा देव
द्वारा हो सकता है ।
८३. 'विद्या' का अर्थ यहाँ पर वह अशुद्ध विद्या है जो कि माया के पाँच
कंचुकों में से एक हैं। इससे वह परिमितता आ जाती है जिसके कारण
जीव को परमार्थ का सम्यक् ज्ञान नहीं हो पाता ।
८४. तुरीय का अर्थ है चौथा । संस्कृत में 'चतुर्' शब्द का अर्थ है चार ।
चतुर् शब्द का 'च' लोप हो जाने से और ईयट् प्रत्यय के लग जाने से
(चतुर् + ईयट्) तुरीय शब्द बनता है जिसका अर्थ होता है चौथा । संवित्
शब्द स्त्री लिंग है । इसलिए उसका विशेषण भी स्त्रीलिंग होना चाहिए ।
इस प्रकार मूल में 'तुरीया संवित्' शब्द आया है । प्रत्येक व्यक्ति की चेतना
की तीन अवस्थाएं होती हैं जाग्रत् स्वप्न, सुषुप्ति (गहरी नींद जिसमें न
जागरण है, न स्वप्न) । जब जाग्रत् अवस्था होती है, तब न स्वप्न रहता