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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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ये देवमूर्तियां हैं, ऐसा समझकर तो इन्हें प्रणाम करना उचित है।
किन्तु विशेष परिचय न होने से बिना मन्त्र पढ़े ही प्रणाम करना
होगा और यह परिपाटी शूद्रो की सी होगी । (५)
(प्रवेश करके)
देवकुलिक—अरे, नित्य नियत पूजा पाठ कर लेने के बाद मेरे भोजन आदि
के अवसर पर इन मूर्तियो से मिलती जुलती आकृति वाला यह
कौन व्यक्ति इस प्रतिमा गृह मे आया है । अच्छा, भीतर जाकर
पता लगाता हूँ । (प्रवेश करता है)
भरत—नमस्कार है ।
देवकुलिक—नही, नही, प्रणाम मत करो ।
भरत — क्यों ? ऐसा मत कहो ।
क्या हममे कोई दोष है, या हमसे किसी अच्छे आदमी की प्रतीक्षा
कर रहे हो । यह प्रणाम करने के लिएमना क्यो रहे हो । क्या यह
तुम्हारा अधिकार मद तो नही है ? (६)
देवकुलिक—मैं आपको इन कारणो से नही रोक रहा हूँ । किन्तु कही तुम
ब्राह्मण होकर देवताओ के भ्रम से इन मूर्तियो को प्रणाम न कर लो
इसलिए मना कर रहा हूँ । ये मूर्तियाँ क्षत्रियो की हैं ?
भरत—ऐमा । क्या ये क्षत्रिय महानुभाव है । अच्छा, तो फिर इन श्रीमानो
के क्या नाम हैं।
देवकुलिक—ये इक्ष्वाकु वंशीय है ।
भरत—(प्रसन्नतापूर्वक) क्या इक्ष्वाकुवंशी । क्या ये अयोध्या के राजा है ?
ये वे ही लोग है, जो राक्षसों का विनाश करने में देवताओ की
सहायता के लिए जाते रहे है । ये वे लोग है, जो अपने पुण्यों के
प्रताप से अपने नगर व प्रजा जनों के साथ स्वर्ग जाते रहे हैं । ये वे
है, जो अपने बाहुबल से सम्पूर्ण भूमण्डल को जीतकर अपने अधिकार
में करते रहे हैं । और ये वे है, जो इच्छानुसार ढूंढने वाली मृत्यु के
द्वारा भी बहुत समय तक समाप्त नही किए जाते हैं, अर्थात् जिनकी
मृत्यु अपनी इच्छा पर निर्भर करती है । (७)