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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

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शब्दार्थ—प्रदेशे=स्थान पर । विश्रमिष्ये=आराम करूंगा । वृक्षान्त
राविष्कृते=पेडो के मध्य दीखने वाले । देवकुले=मन्दिर मे । मुहूर्तम्=थोडी देर
तक । उभय=दोनो । उपोपविश्य = थोडी देर बैठकर । सत्समुदाचारः =
शिष्टाचार । स्थाप्यताम् = रोको । विश्रामय=आराम कराओ । साधु-
मुक्त पुष्पलाजाविष्कृताः=सज्जन व्यक्ति से विकीर्ण किए गए फूल व खीलों से
प्रकट होने वाले । बलय. =प्रसाद या नैवेद्य । अवसक्त=लटकने वाली । पार्वणः
=पूर्णिमा आदि विशेष तिथि पर होने वाला । आह्निकम्=प्रतिदिन किया
जाने वाला । आस्तिक्यम् = ईश्वर भक्त का । दैवतस्य=देवता का । इह-यहाँ
पर । प्रहरणम्=शक्ति आदि आयुध । बहिश्चिह्नं=बाहरी लक्षण । ज्ञास्ये=
मालूम करूंगा । क्रियामाधुर्यम्= शिल्प चातुरी । भावगति = भावों की अभि-
व्यक्ति । दैवतोद्दिष्टानां=देवताओ को प्रतिमा स सकल्पित । मानुषविश्वासातः
=मनुष्यो की प्रतिमा की विश्वास योग्यता । चतुर्देवता=चार देवताओ का ।
स्तोम.=समूह । वार्षल = शूद्र सम्बन्धी । अमन्त्रार्चितदैवतः-देवता के मन्त्र
और पूजा के बिना । देवकुलिक =पुजारी । नैत्यकावसाने=पूजा आदि नित्य
कर्म की समाप्ति पर । प्राशणधमंम्=भोजन को । अनुतिष्ठति=कर लेने पर ।
अल्पान्तराकृति = बहुत कम भेद वाले आकार का । ज्ञास्ये=ज्ञात करूगा ।
नमोऽश्वरतु = नमस्कार होवे । मा तावद् भोः = ऐसा मत कहो । वक्तव्यम् =
दूषण । विशिष्ट.= मुझ से अच्छे व्यक्ति की । प्रतिपाल्यते= प्रतीक्षा की जा
रही है । नियमप्रभविष्णुता = स्वय के तपोनुष्ठान की प्रौढ़ता । दैवतशकया
प्रतिमाओ के भ्रम मे । परिहरामि= मना कर रहा हूँ । असुरपरवधे - राक्षसों
के नगर मे रहने वालो को समाप्त करने मे । अभिसरी=सहायता के लिए ।
शक्रलोके = इन्द्रलोक स्वर्ग मे । सुपरजनपदाः = नगर की प्रजाओं के साथ ।
यान्ति = जाते है । स्वसुकृतैः = अपने पुण्यो के द्वारा । स्वभुजवलजिता =
अपने बाहुबल से जीती गई । कृत्स्नाम् सम्पूर्ण । वसुमतीम् = पृथ्वी को ।
अनवसिताः = नही समाप्त किये जाने वाले । छन्द = अभिप्राय को । मृगयता=
ढूँढते हुए । यदृच्छया = अनायास ही । आसादितं = प्राप्त कर लिया है ।
अभिधीयताम् = कहो । अत्रभवान् = ये ।
अन्वय--दैवतम् इति इव शिरः नमयितुम् कामम् युक्तम् । प्रणामा
तु अमन्त्रार्चितदैवत. वार्षलः स्यात् । (१५)