प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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राजा—नहीं, नही, कानो को आनन्द देने वाले तथा दुःखी हृदय को शान्त
करने वाले उनके नाम लेकर ही सन्देश सुनाओ ।
सुमन्त्र—जैसी महाराज की आज्ञा । चिरजीवी राम ।
राजा—क्या राम । यह राम । इसका नाम सुनने से तो लगता है कि मैने
उसे हृदय से लगा लिया है । इसके बाद ।
सुमन्त्र—दीर्घायु लक्ष्मण ।
राजा—यह लक्ष्मण । इसके आगे ।
सुमन्त्र—आयुष्मती जनकराजकुमारी सीता ।
राजा—यह सीता । राम, लक्ष्मण, सीता यह क्रम ठीक नही है ।
सुमन्त्र—तो फिर कौन सा क्रम उचित है ।
राजा—राम, सीता और लक्ष्मण, यो कहो ।
यहाँ नामोच्चारण में भी सीता राम और लक्ष्मण के बीच मे रहे ।
वन मे बहुत से भय हुआ करते हैं, अतः इस प्रकार वह सुरक्षित
रहेगी । (१५)
सुमन्त्र—जैसी महाराज की आज्ञा । दीर्घायु राम ।
राजा—यह राम ।
सुमन्त्र—आयुष्मती सीता ।
राजा—यह वैदेही ।
सुमन्त्र—चिरजीवी लक्ष्मण ।
राजा—यह लक्ष्मण । राम, सीते, लक्ष्मण । हे पुत्रो, तुम मेरा आलिङ्गन
करो ।
मैं एक बार राम से मिलूँगा अथवा फिर एक बार राम को देखूँगा ।
इस सम्भावना से मैं उसी प्रकार जी रहा हूँ, जैसे मरणासन्न अमृत से ।
सुमन्त्र—शृङ्गवेरपुर में रथ से उतर कर, अयोध्या की ओर मुख किए हुए खड़े
होकर, सभी ने महाराज को सिर झुका कर प्रणाम करके कुछ कहना
प्रारम्भ किया ।
बहुत समय तक न जाने कौन सी बात को सोचते रहे । कुछ कहने के
लिए उनके ओष्ठ फड़के । किन्तु अश्रुओं से गले के अवरुद्ध हो जाने के
कारण वे बिना कुछ कहे हुए ही वन में चले गए । (१७)