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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

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कौसल्या—महाराज, मैं वही अभागिनी हूं।
राजा—अरी कौसल्या, तुम तो धन्य हो। तुमने ही तो राम को गर्भ में
धारण किया है।
मैं तो नष्ट इन्द्रियों वाला, अत्यन्त असह्य और अग्नि तुल्य इस दुःख
को न तो सह सकता हूं तथा न ही दूर करने में समर्थ हूं। (६)
(सुमित्रा को देख कर) यह दूसरी कौन है ?
कौसल्या—महाराज, पुत्र लक्ष्मण— (यों आधा कहने पर)
राजा—(अचानक उठ कर) वह लक्ष्मण कहां है, कहां है ? नहीं दीख
रहा है। हाय, बड़ा दुःख है।
(दोनों रानियां घबराहट में उठ कर राजा को सहारा देती हैं)
कौसल्या—महाराज, मैं तो यह कह रही थी कि यह पुत्र लक्ष्मण की जननी
सुमित्रा है।
राजा—अरी सुमित्रा,
तेरा ही पुत्र सत्पुत्र है, जो रात दिन छाया की तरह वन में रघुकुल
श्रेष्ठ राम के पीछे-पीछे चलता है। (१०)
(३) मूल
(प्रविश्य)
काञ्चुकीयः जयतु महाराजः। एष खलु तत्रभवान् सुमन्त्रः प्राप्तः।
राजा--(सहसोत्थाय सहर्षम्) अपि रामेण ?
काञ्चुकीयः--न खलु, रथेन।
राजा—कथं कथं रथेन केवलेन। (इति मूर्च्छितः पतति)
देव्यौ—महाराज ! समाश्वसिहि समाश्वसिहि। (गात्राणि परा-
मृशतः)
काञ्चुकीयः—भोः ! कष्टम्। ईदृग्विधाः पुरुषविशेषा ईदृशीमापदं
प्राप्नुवन्तीति (विधिरनतिक्रमणीयः) महाराज ! समाश्वसिहि
समाश्वसिहि।
राजा--(किञ्चित् समाश्वस्य) वालाके ! सुमन्त्र एक एव ननु
प्राप्तः ?
काञ्चुकीयः- महाराज ! अथ किम् ।