प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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(प्रवेश करके)
काञ्चुकीय—देवी, यह मैं हूं । क्या किया जाए ?
प्रतिहारी—आर्य, देवासुर युद्ध में अद्वितीय पराक्रम वाले महाराज दशरथ
आज्ञा दे रहे हैं कि—शीघ्र राजकुमार राम के राजोचित प्रभुत्व के
परिचायक राज्याभिषेक की सारी सामग्रियां प्रस्तुत की जायें ।
काञ्चुकीय—हे देवी, महाराज ने जो आदेश दिया है, वह सब पूरी तरह
से तैयार है । देखो—
ये छत्र और चंवर हैं । ये आनन्ददायक वाजे हैं । यह मांगलिक आसन
भी तैयार है । यहा कुश और पुष्पों के सहित, सोने के बने हुए घड़ों
मे तीर्थों का जल भी भर. कर रख दिया है ।.क्रीड़ा रथ भी जुता
हुआ खड़ा है । मन्त्रियों के साथ पुरवासी लोग भी आ गए हैं और
इस समूचे मंगलदायक आनन्द के करने वाले ये भगवान् वशिष्ठ भी
वेदी पर विराजमान हैं । (३)
प्रतिहारी—यदि ऐसा है, तो बहुत सुन्दर किया ।
काञ्चुकीय—अहो, बडे हर्ष की बात है ।
इस समय पृथ्वी पर राम नाम वाले चन्द्र का राज्याभिषेक करके
राजा दशरथ ने अपनी प्रजा को सफल मनोरथ वाली कर दिया
है । (४)
प्रतिहारी—आप अब शीघ्रता कीजिए, शीघ्रता कीजिए ।
काञ्चुकीय—हे देवी, यह शीघ्रता कर रहा हूं । (निकल जाता है)
प्रतिहारी—(घूम कर और देख कर) आर्य सम्भवक, सम्भवक, जाओ, और तुम
भी महाराज के आदेशानुसार पूज्य पुरोहित को सम्मान सहित
शीघ्र बुला लाओ । (दूसरी ओर जाकर) अरी शारसिके, शारसिके,
नाटक गृह मे जाकर अभिनय करने वालों से कहो कि—वे आज
सामयिक अभिनय दिखाने को तैयार रहे । तब तक मैं भी "सब
कुछ तैयार है" ऐसी सूचना महाराज को देती हूं ।
(निकल जाती है ।)
(३) मूल
(ततः प्रविशत्यवदातिका वल्कलं गृहीत्वा)
अवदातिका—अहो अत्याहितम् । परिहासेनापीमं वल्कल- मुपन-
यन्त्या ममैतावद् भयमासीत्, किं पुनर्लोभेन परधनं
हरतः । हसितुमिवेच्छामि । न खल्वेकाकिन्य हसितव्यम् ।