प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट-२
प्रतिमानाटक के छन्द
गेय वस्तु को छन्द, श्लोक या पद्य कहा जाता है। लौकिक संस्कृत के छन्दों
में साधारण रूप से ४ चरण या पाद होते हैं। ये छन्द तीन प्रकार के हैं—समवृत्त,
अर्धसमवृत्त, और विषमवृत्त। चारों चरणों में वर्णों या मात्राओं की संख्या समान
होने पर समवृत्त छन्द होते हैं। संस्कृत (लौकिक) के अधिकांश छन्द समवृत्त हैं।
पहले तथा तीसरे चरण में एवं दूसरे तथा चौथे चरण में वर्णों या मात्राओं की संख्या
समान होने पर अर्धसमवृत्त छन्द होते हैं। पुष्पिताग्रा आदि छन्द इसी प्रकार के हैं।
सभी चरणों में इनकी विषमता होने पर विषमवृत्त छन्द होता है। जैसे कि आर्या
छन्द है।
छन्दों में वर्णों या मात्राओं की गणना की जाती है। जिन छन्दों की रचना
वर्णों के अनुसार की जाती है, वे वर्णिक छन्द कहलाते हैं। जिनकी रचना मात्राओं
के अनुसार होती है, वे मात्रिक होते हैं। इन्द्रवज्रा आदि छन्द वर्णिक और आर्या
आदि छन्द मात्रिक हैं।
छन्दों की रचना में लघु तथा गुरु होने के क्रम की गणना होती है। इनमें
अ, इ, उ, ऋ तथा लृ स्वर लघु हैं और शेष गुरु हैं। परन्तु निम्न अवस्थाओं में
लघु स्वरों को भी गुरु समझा जाता है—
(१) यदि लघु स्वर के पश्चात् अनुस्वार, विसर्ग या संयुक्त वर्ण हो।
(२) यदि यह पाद का अन्तिम स्वर हो।
गणना के लिये लघु स्वर की एक मात्रा तथा गुरु स्वर की दो मात्रायें गिनी
जाती हैं। लघु का संकेत “।” चिह्न है तथा गुरु का संकेत “ऽ” चिह्न है।
वर्णिक छन्दों में वर्णों के गुरु-लघु के बोध के लिये गणों का उपयोग किया
जाता है। गणों की संख्या आठ है तथा उनमें लघु-गुरु वर्ण निम्न क्रम से होते हैं—
यगण । ऽ ऽ रगण ऽ । ऽ नगण । । ।
मगण ऽ ऽ ऽ जगण । ऽ । सगण । । ऽ
तगण ऽ ऽ । भगण ऽ । ।
इनको इस सूत्र से भी लिखा जाता है—
यमाताराजभानसलगा
छन्दों में यति होती है। यति का अभिप्राय है कि छन्द का गान करते हुये
उस स्थान पर विराम होता है। यति लम्बे छन्दों में होती है।
प्रतिमानाटक में निम्न प्रकार से छन्दों का प्रयोग किया गया है—