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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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२१६ ] प्रतिमानाटकम्
पत्न्या सीतया बन्धुभिः भरतादिभिः सम्बन्धिभिः च समागतः सम्मिलनं प्राप्तः भूमिं
च शशास, तथा तेनैव प्रकारेण लक्ष्म्या राजश्रिया समायुक्तः नः अस्माकं राजा
राजसिंहः इति पदं भासस्य अन्येषां नाटकानां भरतवाक्येनानुमेयम्, भूमिं प्रशास्तुः
अस्याः पृथिव्याः न्यायानुसारेण शासनं करोतु ॥१५॥
व्याकरण--लक्षयति पश्यति उद्योगिनम् = √लक्ष् + ई (लुट् का आगम) =
लक्ष्मी । राजते शोभते = √राज् + कनिन् = राजन् ।
छन्दः--अनुष्टुप् ।
अलङ्कार--उपमा । राजा उपमेय, राम उपमान, समागम होना साधारण
धर्म, यथा-तथा उपमावाचक हैं । पूर्णोपमा है ।
भरतवाक्य--नाटक के अन्त में अभिनय की समाप्ति होने पर आशीर्वादा-
त्मक श्लोक के रूप में जिस पद्य का गान किया जाता है, उसको भरतवाक्य कहते
हैं । भारतीय नाटकों की परम्परा में नाटक के अन्त में भरतवाक्य अवश्य रखा
जाता है । भरत का अर्थ अभिनेता या नट है । अर्थ के अनुसार नाटक की समाप्ति
पर नाटक के अभिनेता दर्शकों के लिये इस वाक्य द्वारा आशीर्वाद देते हैं । इस
समय सभी अभिनेता रंगमंच पर उपस्थित होकर भरतवाक्य का गान करते हैं ।
अथवा नाट्यशास्त्र के प्रणेता भरतमुनि के प्रति आदर का भाव प्रकट करने के लिये
उसको भरतवाक्य कहा गया है ।
।। इति सप्तमोऽङ्कः ।।
सातवाँ अङ्क पूरा हुआ
इति भासविरचित प्रतिमानाटके डॉ० कृष्णकुमारकृतव्याख्यायाः
सप्तमोऽङ्कः समाप्तः
इति भासविरचितं प्रतिमानाटकं सम्पूर्णम्
इति गढवालविश्वविद्यालयस्य संस्कृतविभागाध्यक्षेन डॉ० कृष्णकुमारेण
प्रणीता प्रतिनाटकव्याख्या सम्पूर्णा ॥