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सर्वकोश
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 278

३१४ ] प्रतिमानाटकम्
(सर्वे आरोहन्ति)
रामः— अद्यैव यास्यामि पुरीमयोध्यां
सम्बन्धिमित्रैरनुगम्यमानः ।
लक्ष्मणः— अद्यैव पश्यन्तु च नागरास्त्वां
चन्द्रं सनक्षत्रमिवोदयस्थम् ॥१४॥
अन्वयः —सम्बन्धिमित्रैः अनुगम्यमानः अद्य एव अयोध्यां पुरीं यास्यामि ।
सनक्षत्रम् उदयस्थं चन्द्रम् इव त्वाम् अद्य एव च नागराः पश्यन्तु ॥१४॥]
हिन्दी रूपान्तर—
राम—वत्स लक्ष्मण ! मैंने राज्य प्राप्त कर लिया है ।
लक्ष्मण—भाग्य से आपकी वृद्धि हो रही है । आपको बधाई है ।
(प्रवेश करके)
काञ्चुकीय—महाराज की जय हो । ये आदरणीय विभीषण निवेदन करते
हैं—सुग्रीव, नील, मैन्द, जाम्बान्, हनूमान् आदि आपके प्रमुख अनुयायी निवेदन
करते हैं—भाग्य से आपकी वृद्धि हो रही है । आपको बधाई है ।
राम—सहायकों की कृपा से वृद्धि हो रही है, ऐसा कहो ।
काञ्चुकीय—महाराज जैसा आदेश देते हैं ।
कैकेयी—मैं निश्चय से धन्य हो गई हूँ । इस अभ्युदय को मैं अयोध्या में
देखना चाहती हूँ ।
राम—आप वहाँ भी देखेंगी । (देखकर) अरे, प्रकाशों से यह सारा वन
सूर्य के समान प्रतीत हो रहा है । (विचार करके) आः, समझ लिया । रावण का
विमान आकाश में आ पहुँचा है । स्मरणमात्र से यह समय पर पहुँच जाता है । तो
आप सब इस पर आरूढ हो जावे ।
(सब आरूढ होते हैं ।)
राम—
अर्थ [श्लोक १४]—सम्बन्धियों और मित्रों से अनुगमन किया जाता हुआ मैं
आज ही अयोध्या नगरी को जाऊँगा ।
लक्ष्मण—
नक्षत्रों सहित उदयाचल पर स्थित चन्द्रमा के समान उन्नति के शिखर पर
स्थित आपको आज ही नगरनिवासी देखें ॥१४॥
संस्कृत-व्याख्या—सम्बन्धिमित्रैः सम्बन्धिभिः भरतादिभिः मित्रैः विभीषणा-
दिभिः सुहृद्भिश्च अनुगम्यमानः अनुस्रियमाणः अहम् अद्य एव अयोध्यां पुरीं नगरीं
यास्यामि गमिष्यामि । विना विलम्बं मया तत्र गन्तव्यम् ।
सनक्षत्रं नक्षत्रैः सह शोभमानम् उदयस्थम् उदयाचलपर्वतशिखरे तिष्ठन्तं
चन्द्रं शशिनम् इव उन्नतिशिखरारूढं उन्नतिशिखरारूढं त्वाम् अद्य एव नागराः
नगरनिवासिनः पश्यन्तु अवलोकयन्तु ॥१४॥