प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽङ्कः [ १८६
सुमन्त्रः—यदाज्ञापयति भवती । कुमार ! श्रूयताम्—पुरा मृगयां
गतेन महाराजेन कस्मिंश्चित्सरसि कलशं पूरयमाणो वनराजबृंहितानुकारि-
शब्दसमुत्पन्नगजशङ्कया शब्दवेधिना शरेण विपन्नचक्षुषो महर्षेश्चक्षुर्भूतो
मुनितयो हिंसितः ।
भरतः—हिंसित इति । शान्तं शान्तं पापम् । ततस्ततः ?
सुमन्त्रः—ततस्तमेवंगत दृष्ट्वा—
तेनोक्तं रुदितस्यान्ते मुनिना सत्यभाषिणा ।
यथाहं भो स्त्वमप्येवं पुत्रशोकाद् विपत्स्यसे ॥१५॥
इति ।
[अन्वयः—रुदितस्य अन्ते सत्यभाषिणा तेन मुनिना उक्तम्—भोः ! यथा
अहम् एवं त्वम् अपि पुत्रशोकाद् विपत्स्यसे ॥१५॥]
हिन्दी रूपान्तर
कैकेयी—(अपने मन में) अच्छा । बात कहने का यह समय है। (प्रकट रूप
से) पुत्र ! क्या तुम महाराज के शाप की बात को नहीं जानते ?
भरत—क्या महाराज को शाप दिया गया था ?
कैकेयी—सुमन्त्र ! विस्तार से सारी बात कहो ।
सुमन्त्र—आप जैसा आदेश देती हैं । कुमार ! सुनो—पहले समय में कभी
शिकार के लिये महाराज गये थे । वहाँ किसी जलाशय में एक अन्धे महर्षि का
नेत्ररूप मुनिपुत्र घड़े में जल भर रहा था । उस जल के भरने की गड़गड़ाहट का
शब्द जंगली हाथी की चिंघाड़ के समान था । उस शब्द से हाथी की भ्रान्ति से
महाराज ने शब्दभेदी बाण के द्वारा उस मुनिपुत्र को मार डाला ।
भरत—मार डाला ? पाप शान्त हो, शान्त हो । उसके बाद ?
सुमन्त्र—तदनन्तर उसको इस अवस्था में देखकर—
अर्थ [श्लोक १५]—खूब रो लेने के बाद सत्य बोलने वाले उस मुनि ने
कहा है—हे राजन् ! जैसे कि मैं पुत्र के शोक से मर रहा हूँ, उसी प्रकार तुम्हारी
भी पुत्र के शोक से मृत्यु होगी ॥१५॥
संस्कृत व्याख्या—रुदितस्य अन्ते पर्याप्तरूपेण रोदनं कृत्वा तदनन्तरं सत्य-
भाषिणा सत्यम् अवितथं भाषितुं कथितुं शीलं यस्य तेन, यस्य कथनमेव सत्यं
भवतीत्यर्थः, तेन मुनिना महर्षिणा विपन्नचक्षुषा उक्तं कथितम्—भोः हे राजन् ! यथा
येन प्रकारेणाहं पुत्रशोकात् मरिष्यामि, त्वम् अपि एवम् अनेनैव प्रकारेण पुत्रशोकाद्
पुत्रस्य तनयस्य शोकाद् विरहजन्यदुःखाद् विपत्स्यसे मृत्युं प्राप्स्यसि ॥१५॥