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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 250

१८६ ] प्रतिमानाटकम्
प्रतिहारी—भट्टिणि ! तह । (परिक्रम्योपसृत्य) जेदु भट्टिदारओ । पविसदु
किल । [भट्टिनि ! तथा । जयतु भर्तृदारकः । प्रविशतु किल ।]
भरत—किं निवेदितम् !
प्रतिहारी—आम् ।
भरत—तेन हि प्रविशावः । (प्रविशतः)
कैकेयी—जाद ! विजआ मन्तेदि रामस्य सआसादो सुमन्तो आद त्ति ।
[जात ! विजया मन्त्रयते—रामस्य सकाशात् सुमन्त्र आगत इति ।]
भरत—अतः परं प्रियं निवेदयाम्यत्रभवत्यै ।
कैकेयी—जाद ! अपि कोसलल्ला सुमित्ता अ सद्दायिदव्वा ? [जात !
अपि कौसल्या सुमित्रा च शब्दापयितव्ये ? ]
भरत—न खलु ताभ्यां श्रोतव्यम् ।
कैकेयी—(आत्मगतम्) हं, किं णु खु भवे ? (प्रकाशम्) भणाहि जादे !
[हं किन्नु खलु भवेत् ? भण जात ! ]
हिन्दी रूपान्तर—
(तदनन्तर कैकेयी और प्रतिहारी प्रवेश करते हैं)
कैकेयी—मुझको देखने के लिये क्या भरत आया है ?
प्रतिहारी—स्वामिनि ! ऐसा ही है। राजकुमार राम के पास से तात सुमन्त्र
आये हैं । उनके साथ राजकुमार भरत स्वामिनी को देखना चाहते हैं ।
कैकेयी—(अपने मन में) न जाने क्या बात उठाकर भरत मुझे को उलाहना
देगा ?
प्रतिहारी—स्वामिनि ! राजकुमार क्या प्रवेश करें ?
कैकेयी—जाओ और इसको प्रवेश कराओ ।
प्रतिहारी—स्वामिनि ! बहुत अच्छा । (घूमकर समीप आकर) राजकुमार
की जय हो । आप प्रवेश करें ।
भरत—विजये ! क्या निवेदन कर दिया ?
प्रतिहारी—हाँ ।
भरत—तो प्रवेश करते हैं । (भरत और सुमन्त्र दोनों प्रवेश करते हैं)
कैकेयी—पुत्र ! विजया कहती है कि राम के पास से सुमन्त्र आये हैं ?
भरत—इससे भी अधिक प्रिय बात आदरणीया आपसे निवेदन कर रहा हूँ ।
कैकेयी—पुत्र ! क्या कौसल्या और सुमित्रा को भी बुला लिया जावे ?
भरत—उनको यह बात नहीं सुननी है ।
कैकेयी—(अपने मन में) यह क्या बात हो सकती है ? (प्रकट रूप से)
पुत्र ! कहो ।