प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽङ्कः [ १६५
भरत— विजये ! मेरे आने की बात आदरणीया रानी जी से निवेदन
कर दो ।
प्रतिहारी—किन रानी जी से निवेदन करूं ?
भरत—जो मुझको राजा बनाना चाहती है ।
प्रतिहारी—(मन में) हां, कौन सी मुसीबत की बात हो सकती है ? (प्रकट
रूप में) स्वामिन् ! ऐसा ही होगा ।
(निकल जाती है)
टिप्पणी—
देवीनां चतुशशालम्—चतुश्शाल (चौसाला) एक विशेष प्रकार की गृहरचना
है । इसमें बीच में आंगन होता है तथा उसके चारों ओर कमरे बने होते हैं। भारतीय
गृहनिर्माण पद्धति में यह विशेष रचना है। समृद्ध घरों में एक से अधिक भी चतुश्शाल
होते थे । बाहर के चतुश्शाल का उपयोग पुरुषों के लिये तथा अन्दर के चतुश्शाल
का उपयोग स्त्रियों के लिये होता था । इसको अन्तःपुर भी कहते थे । सामान्यतः
इसमें पुरुषों के जाने का निषेध था । इसीलिये भरत से सुमन्त्र कहते हैं कि इधर
न जाइये ।
या मां राजानमिच्छति—भरत ने व्यंग्य के साथ यह कथन किया है । उसका
अभिप्राय है कि मेरे लिये राज्य की कामना करके कैकेयी ने महान् अनर्थ किया है ।
उस कैकेयी को ही मैं देखना चाहता हूँ । प्रतिहारी भी इस बात को समझ जाती है
तथा कल्पना करती है कि कोई मुसीबत की बात है ।
(ततः प्रविशति कैकेयी प्रतिहारी च)
कैकेयी—विजए ! मं पेक्खिदुं भरदो आओदो ? [ विजये ! मां प्रेक्षितुं
भरत आगतः ? ]
प्रतिहारी—भट्टिणि ! तह ! भट्टिदारअस्स रामस्स सआसादो तादसुमन्तो
आओदो । तेन सह भट्टिदारओ भरदो भट्टिणि पेक्खिदुं इच्छति किल । [ भट्टिनि !
तथा । भर्तृदारकस्य रामस्य सकाशात् तात सुमन्त्र आगतः । तेन सह भर्तृ-
दारको भट्टिनीं प्रेक्षितुमिच्छति किल । ]
कैकेयी—(स्वगतम्) केण खु उग्घादेन मं उवालम्भिस्सदि भरदो ? [ केन
खलूद्घातेन मामुपालप्स्यते भरतः ? )
प्रतिहारी—भट्टिणि ! किं पविसदु भट्टिदारओ ? [ भट्टिनि ! किं प्रविशतु
भर्तृदारकः ! ]
कैकेयी—गच्छ ! पवेसेहि णं । [ गच्छ । प्रवेशयैनम् । ]