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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 247

षष्ठोऽङ्कः [ १८३
करना चाहते थे। परन्तु उनके मुख से तुल्यदुःखेन पद निकल गया। इससे भरत को
लगा कि राम का राज्य तो छिन ही गया है, सीता का हरण भी न हो गया हो।
तभी तुल्यदुःखता होगी।
का गतिः—भरत ने जब स्वर्गीय महाराज दशरथ के चरणों की सौगन्ध
दिला दी तो सुमन्त्र को लाचारी हो गई और उन्हें पूरा समाचार सुनाना पड़ा।
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भरतः—कथं हृतेति ? (मोहमुपगतः)
सुमन्त्रः—समाश्वसिहि, समाश्वसिहि।
भरतः—(पुनः समाश्वस्य) भोः कष्टम्—
पित्रा च बान्धवजनेन च विप्रयुक्तो
दुःखं महत् समनुभूय वनप्रदेशे।
भार्यावियोगमुपलभ्य पुनर्ममार्यो
जीमूतचन्द्र इव खे प्रभया वियुक्तः ॥१२॥
[अन्वयः—पित्रा च बान्धवजेन च विप्रयुक्तः, वनप्रदेशे महद् दुःखं समनु-
भूय, पुनः भार्यावियोगम् उपलभ्य मम आर्यः खे जीमूतचन्द्र इव प्रभया वियुक्तः
॥१२॥]
हिन्दी रूपान्तर—
भरत—क्या अपहरण कर लिया ? (मूर्छित हो जाता है)
सुमन्त्र—आश्वासन रखो, आश्वासन रखो।
भरत—(पुनः होश में आकर) अरे ! बहुत कष्ट है—
अर्थ [श्लोक १२]—पिता और बन्धुओं से बिछुड़े हुये तथा वन प्रदेश में
महान् दुःखों का अनुभव करके, अब पत्नी से वियुक्त होकर मेरे आर्य बड़े भाई राम
आकाश में मेघों से आच्छन्न चन्द्रमा के समान कान्ति से रहित हो गये हैं ॥१२॥
संस्कृत व्याख्या—पिता जनकेन बान्धवजनेन बन्धुभिश्च विप्रयुक्तः वियोगं
प्राप्तः दूरीकृतः इत्यर्थः, वनप्रदेशे अरण्यप्रान्ते महत् अत्यधिकं दुस्सहं दुःखं कष्टं
समनुभूय सम्यक्तया अनुभवं कृत्वा, पुनः तदनन्तरमधुना भार्यावियोगं भार्यायाः
पत्न्याः वियोगं विरहं सीताहरणेन भार्यावियोगः सम्प्राप्तः उपलभ्य अधिगम्य मम
आर्यः श्रेष्ठः भ्राता रामः खे आकाशे जीमूतचन्द्रः जीमूतैः मेघैः आच्छन्नः चन्द्रः शशी
इव प्रभया स्वकान्त्या वियुक्तः विरहितः सञ्जातः। यथा मेघाच्छन्नो चन्द्रः प्रभाहीनो
सञ्जायते, तथैव पत्न्याः वियुक्तः रामः प्रभाहीनः सञ्जातः ॥१२॥
व्याकरण—बध्नाति स्नेहे = बन्ध् + उ = बन्धु। बन्धोः भावः, बन्धूनां समूहो
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