प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽङ्कः । १६१
भरतः—तात ! कथमिव ?
सुमन्त्रः— सुग्रीवो भ्रंशितो राज्याद् भ्रात्रा ज्येष्ठेन बालिना ।
हृतदारो वसञ्छैले तुल्यदुःखेन मोक्षितः ॥१०॥
[अन्वयः—ज्येष्ठेन भ्रात्रा बालिना राज्यात् भ्रंशितः हृतदारः सुग्रीवः शैले
वसन्, तुल्यदुःखेन मोक्षितः ॥१०॥
हिन्दी रूपान्तर—
भरत—आपने सुना होगा कि वे अब कहां चले गये हैं ?
सुमन्त्र—किष्किन्धा नाम का वानरों का निवास है। सुना है कि वहाँ
गये हैं।
भरत—निश्चय ही वानरों को मनुष्यों की विशेषताओं का ज्ञान नहीं होता ।
वे बड़े दुःखों से पीडित रहते हैं।
सुमन्त्र—कुमार ! पशु-पक्षी भी उपकार को समझते हैं ।
भरत—तात ! किस प्रकार ?
सुमन्त्र—
अर्थ [श्लोक १०]—बड़े भाई वाली ने जिसको राज्य से भ्रष्ट कर दिया था
और जिसकी पत्नी को छीन लिया था, ऐसा सुग्रीव ऋष्यमूक पर्वत पर रहता था ।
समान दुःख से दुःखी राम ने उसको दुःखों से छुटकारा दिलाया । अर्थात् उसके राज्य
को और पत्नी को वापिस करा दिया ॥१०॥
संस्कृत-व्याख्या—ज्येष्ठेन भ्रात्रा अग्रजन्मना बालिना राज्याद् भ्रंशितः अपहृत-
राज्याधिकारः, हृतदारः हृताः स्वहस्तगता कृताः दाराः कलत्रं यस्य तादृशः सुग्रीवः
शैले पर्वते ऋष्यमूकाभिधाने वसन् निवसन्, तुल्यदुःखेन तुल्यं समानं दुःखं कष्टः हृत-
कलत्रभावात् यस्य तेन, रामोऽपि हृतराज्यत्वाद् हृतकलत्रत्वाच्च समानरूपेण विषण्णः,
तेन मोक्षितः कष्टेभ्यः मोक्षं प्रापितः । रामेण बालिवधं कृत्वा सुग्रीवः राज्ये प्रतिष्ठितः
भार्यया च संयोगं प्रापितः ॥१०॥
व्याकरण—√भ्रंश् + णिच् + क्त = भ्रंशितः । √भ्राज् + तृन् = भ्रातृ ।
हृताः दाराः यस्य स । √हृ + णिच् + घञ् = दार ।
छन्दः—अनुष्टुप्
अविज्ञातपुंरुषविशेषाः—न विज्ञातः पुरुषाणां विशेषः येषां ते । जिनको मनुष्य
की विशेषतायें विदित नहीं है । वे नहीं जानते कि मनुष्यों ने सभ्यता का
विकास करके सुख से रहना सीख लिया है और अनेक सुविधाओं को वे उपभोग
करते हैं ।
वनौकसाम्—वनम् ओकः येषां ते । वानरों को वनोकस् कहा गया है ।
तिर्यग्योनयः—पशु-पक्षी की योनि वाले । तिरः अञ्चति = तिरस् + अञ्च्