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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 244

१८० ] प्रतिमानाटकम्
सुमन्त्र—कुमार !
अर्थ [श्लोक ६]—विनीत व्यक्तियों को क्रोध कहाँ होता है ? अर्थात् विनीत
व्यक्ति क्रोध नहीं करते । अथवा पुण्यात्माओं को लज्जा कहाँ होती है ? अर्थात्
पुण्यात्माओं को लज्जा करने का कोई कारण नहीं होता । मैंने तो वह तपोवन उन
राम आदि से रहित और सूना देखा था । अर्थात् जब मैं जनस्थान पहुँचा तो राम;
लक्ष्मण और सीता तपोवन में नहीं थे ॥६॥
संस्कृत-व्याख्या—विनीतानां विनयभावेन अवनतानां क्रोधः रोषः कुतः कस्मात्
कारणात् भवितुं शक्नोति । विनीताः जनाः क्रोधं न कुर्वन्ति । वा अथवा कृतचेतसां
पुण्यशालिनां जनानां लज्जात्रपा कुतः सम्भवति । न कोऽहेतुस्तादृशो वर्तते येन पुण्य-
शालिनो जनाः लज्जिताः भवेयुः । अतस्तेषां रामसीतालक्ष्मणानामदर्शने क्रोधः त्रपा वा
न हेतुः । मया सुमन्त्रेण तु तद् आश्रमं तपोवनं रामादीनां निवासः तैः रामादिभिः
विहीनं परित्यक्तम् अत एव शून्यं रिक्तमिव प्रतीयमानं दृष्टम् अवलोकितम् ॥६॥
व्याकरण—वि + नी + क्त = विनीतानाम् । किम् से पञ्चम्यास्तसिल् = किम्

  • तसिल्प् (क आदेश) = कुतः ।
    छन्दः—अनुष्टुप् ।
    लोकाविष्कृतपितृस्नेहः—लोके आविष्कृतः पितरं प्रति स्नेहः । राम पिता के
    प्रति भक्ति और स्नेह के कारण ही वन गये थे, जिससे कि पिता की प्रतिज्ञा असत्य
    न हो ।
    द्विधाभूतमरुन्धतीचरित्रम्—लोक में वसिष्ठ की पत्नी अरुन्धती का यश
    अपने पातिव्रत्य के लिये प्रसिद्ध है । सीता भी उनसे कम पतिव्रता नहीं है । अतः
    कल्पना की गई कि मानों उनका चरित्र दो भागों में बंट कर एक भाग सीता को
    प्राप्त हो गया है ।
    निष्कारण विहितवनवासं सौभ्रात्रम्—लक्ष्मण को कोई वनवास का आदेश
    नहीं था । तथापि भाई के प्रति स्नेह और भक्ति के कारण उन्होंने स्वयं ही वनवास
    स्वीकार किया । सुभ्रातुः भावः = सुभ्रातृ + अण् = सौभ्रात्र । इन तीनों कथनों में
    पहला राम के लिये, दूसरा सीता के लिये और तीसरा लक्ष्मण के लिये हैं ।
    भरतः—अथ क्व गता इति श्रुताः ?
    सुमन्त्रः—अस्ति किल किष्किन्धा नाम वनौकसां निवासः । तत्र गता
    इति श्रुताः ।
    भरतः—हन्त ! अविज्ञातपुरुषविशेषाः खलु वानराः । दुःखिताः प्रति-
    सुमन्त्रः—कुमार ! तिर्यग्योनायोऽप्युपकृतमवगच्छन्ति ।