प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
पृष्ठ 243, कुल 296 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽङ्कः [ १७६
द्विधाभूतमरुन्धती चारित्रम् ? अपि दृष्टं त्वया निष्कारणविहितवनवासं
सौभ्रात्रम् ?
(सुमन्त्रः सचिन्तस्तिष्ठति)
प्रतिहारी—भट्टिदारओ खु अयं पुच्छदि । [भर्तृदारकः खल्वयं
पृच्छति ।]
सुमन्त्रः—भवति ! किं माम् ।
भरतः—(स्वगतम्) अति महान् खल्वायातः । सन्तापाद् भ्रष्टहृदयः ।
(प्रकाशम्) अपि मार्गात् प्रति निवृत्तस्तत्रभवान् ?
सुमन्त्रः—कुमार ! स्वन्नियोगाद् रामदर्शनार्थं जनस्थानं प्रस्थितः
कथमहमन्तरा प्रतिनिवर्तिष्ये ।
भरतः—किन्नु खलु क्रोधेन वा लज्जया वात्मानं न दर्शयन्ति ?
सुमन्त्रः—कुमार !
कुतः क्रोधो विनीतानां लज्जा वा कृतचेतसाम् ।
मया दृष्टं तु तच्छून्यं तैर्विहीनं तपोवनम् ॥६॥
[अन्वयः—विनीतानां क्रोधः कुतः, वा कृतचेतसां लज्जा । मया तु तत्
तपोवनं तैः विहीनं शून्यं दृष्टम् ॥६॥]
हिन्दी रूपान्तर
प्रतिहारी—(सुमन्त्र को लक्ष्य करके) आर्य आवें, आवें । ये स्वामी हैं । आर्य
समीप आवें ।
सुमन्त्र—(समीप आकर) कुमार की जय हो ।
भरत—तात ! क्या आपने लोक में आविष्कृत होने वाले पिता के प्रति
स्नेह को देखा ? क्या आपने अरुन्धती के दो भागों में विभक्त होने वाले चरित्र को
देखा ? क्या आपने बिना कारण के वनवास को देने वाले भ्रातृस्नेह को देखा ?
(सुमन्त्र चिन्ता में भरा खड़ा रहता है)
प्रतिहारी—राजकुमार आपसे ही पूछ रहे हैं ।
सुमन्त्र—आदरणीये ! क्या मुझसे ?
भरत—(मन में) इनका कष्ट निश्चय से बहुत अधिक है । दुःख के कारण
इनका हृदय खो सा गया है (प्रकट रूप में) क्या आदरणीय आप मार्ग से ही लौट
आये ?
सुमन्त्र—कुमार ! आपके आदेश से मैंने राम का दर्शन करने के लिये जन-
स्थान की ओर प्रस्थान किया था । मैं बीच में से ही कैसे लौट आता ?
भरत—तो क्या क्रोध के कारण अथवा लज्जा के कारण वे अपने दर्शन नहीं
दे रहे हैं ?