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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 237

षष्ठोऽङ्कः [ १७३
क्रव्यादीशवरः—क्रव्यम् आमं मांसम् अत्ति = क्रव्य + अद् + विट् = क्रव्यात् =
कच्चा मांस खाने वाला ; कच्चा मांस खाने के कारण गिद्ध को क्रव्यात् कहा गया ।
क्रव्यादानाम् ईश्वरः = क्रव्यादीश्वरः । राक्षसों को भी क्रव्यात् या क्रव्याद कहा
गया है ।
स्वर्ग्यः--स्वर्गाय योग्यः = स्वर्ग + यत् = स्वर्ग्य ।
विष्कम्भक--पाँचवे और छठे अंक के मध्य की घटना की सूचना देने के
लिये इस विष्कम्भक का प्रयोग हुआ है । पाँचवे अङ्क के अन्त में घटना थी कि रावण
ने सीता को पकड़ कर ले जाना चाहा । इसी समय उसको मुकाबला करता हुआ
जटायु दिखाई दिया । अगले अंक में सुमन्त्र द्वारा सीता-हरण [तथा राम के किष्किन्ध
पहुँचने की सूचना भरत को दी गई । बीच की घटना कि जटायु का वध करके
रावण सीता को ले गया, की सूचना इस विष्कम्भक से दी गई है । इस विष्कम्भक
में मध्यम कोटी के पात्रों का प्रयोग हुआ है । अतः यह शुद्ध विष्कम्भक है ।
(ततः प्रविशति काञ्चुकीयः)
काञ्चुकीयः—क इह भोः ! काञ्चनतोरणद्वारमशून्यं कुरुते ?
(प्रविश्य)
प्रतिहारी—अय्य ! अहं विजया । किं करीअदु ? [आर्य ! अहं विजया ।
किं क्रियताम् ?]
काञ्चुकीयः—विजये ! निवेद्यतां निवेद्यतां भरतकुमाराय--'एष खलु
रामदर्शनार्थं जनस्थानं प्रस्थितः प्रतिनिवृत्तस्तत्रभवान् सुमन्त्र इति ।
प्रतिहारी—अय्य ! अवि किदत्थो तादसुमन्तो आओदो ? [आर्य ! अपि
कृतार्थस्तातसुमन्त्र आगतः ?]
कञ्चुकीयः—भवति ! न जाने—
हृदयस्थितशोकाग्निशोषिताननमागतम् ।
दृष्ट्वैवाकुलमासीन्मे सुमन्त्रमधुना मनः ॥५॥
[अन्वयः—हृदयस्थित शोकाग्निशोषिताननम् आगतं सुमन्त्रम् अधुना दृष्ट्वा
एव मे मनः आकुलम् आसीत् ॥५॥]