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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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१७२ ] प्रतिमानाटकम्
उभौ—स्वर्ग्योऽयमस्तु ।
प्रथमः—काश्यप ! आगम्यताम् । इमं वृत्तान्तं तत्र भवते राघवाय
निवेदयिष्यावः ।
द्वितीयः—वाढम् । प्रथमः कल्पः । (निष्क्रान्तौ)
(विष्कम्भकः)
[अन्वयः—स्ववीर्यसदृशं परमं प्रयत्नं कृत्वा शत्रुं क्रीडामयूरमिव अचिन्तयित्वा;
निशाचरपतेः दीप्तं तेजः अवधूय नागेन्द्रभग्न वनवृक्षः इव अवसन्नः ॥४॥]
हिन्दी रूपान्तर—
दूसरा—खेद है, अति कुपित हुये रावण ने खड्ग से उस गृध्रराज के दाहिने
पर प्रहार किया है ।
दोनों—हाय, धिक्कार है । आदरणीय जटायु गिर गये हैं ।
पहला—अरे, बड़ा कष्ट है । ये आदरणीय जटायु—
अर्थ [श्लोक ४]—अपने पराक्रम के अनुसार अत्यधिक प्रयत्न करके, शत्रु
रावण की, मानों वह खेलने योग्य मोर हो, इस प्रकार परवाह न करके, राक्षसराज
रावण के प्रचण्ड तेज का तिरस्कार करके गजराज के द्वारा तोड़े गये जंगली वृक्ष के
समान नीचे गिर गया है ॥४॥
दोनों—इसको स्वर्ग प्राप्त हो ।
पहला—काश्यप ! आओ । इस घटना को आदरणीय राम से निवेदन करें ।
दूसरा—हाँ । अच्छा प्रस्ताव है । (दोनों निकल जाते हैं)
(इस प्रकार विष्कम्भक पूरा हुआ)
संस्कृत व्याख्या—अयं जटायुः स्ववीर्यसदृशं स्वस्य आत्मनः वीर्यस्य पराक्रमस्य
सदृशं योग्यं स्वपराक्रमानुरूपं परमं महान्तं प्रयत्नं प्रयासं कृत्वा विधाय, शत्रुं रिपुं
रावणं क्रीडामयूरमिव क्रीडनक शिखण्डिनमिव अचिन्तयित्वा अविगणय्य उपेक्ष्य, निशा-
चरपतेः राक्षसराजस्य रावणस्य दीप्तम् अतिसमिद्धं तेजः प्रतापम् अवधूय स्वपराक्रमेन
तिरस्कृत्य, स्वपराक्रमं प्रदर्श्य इति भावः, नागेन्द्रभग्नवनवृक्षः नागेन्द्रेण गजराजेन
भग्नः त्रोटितः यः वनवृक्षः आरण्यपादपः स इव अवसन्नः अवसादं प्राप्य अधः
पतितः । रावणेन आघातं प्राप्य अचेतनो भूत्वा अधो भूम्यां निपतितः ॥४॥
व्याकरण—स्वस्य वीर्यस्य सदृशम् = स्ववीर्यसदृशम् । √शद् + क्रुन् = शत्रु ।
अव + √धू + क्त्वा (ल्यप्) = अवधूय । नागानाम् इन्द्रः = नागेन्द्रः । नगे पर्वते भवः
= नग + अण् = नाग । इदी परमैश्वर्ये, इन्द + र = इन्द्र । अव + सद् + क्त = अवसन्न ।
छन्दः—वसन्ततिलका ।
अलङ्कार—उत्प्रेक्षा और उपमा । शत्रु उपमेय में क्रीडामयूर उपमान की
सम्भावना करने से उत्प्रेक्षा अलङ्कार है । उपमेय जटायु का उपमान वनवृक्ष के साथ
सादृश्य प्रदर्शित करने से उपमा है । यहाँ इव उपमावाचक और अवसन्न साधारण
धर्म हैं ।