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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 234

१७० ] प्रतिमानाटकम्
आगम) = भुजङ्गम । कल्याणानि अङ्गानि यस्याः = अङ्ग + न + टाप् = अङ्गना ।
√ सिध् + क्तिन् = सिद्धि ।
छन्दः—वंशस्थ ।
अलङ्कार—मालोपमा और उत्प्रेक्षा । एक ही उपमेय सीता के अनेक उपमान
होने से उत्प्रेक्षा अलङ्कार है । सिद्धिरिव में सीता उपमेय में सिद्धि उपमान की
सम्भावना करने से उत्प्रेक्षा अलङ्कार है ।
❖❖❖❖
उभौ—परित्रायन्तां परित्रायन्तां भवन्तः ।
प्रथमः—(ऊर्ध्वमवलोक्य) अये, वचनसमकाल एव दशरथस्यानृण्यं
कर्तुं 'मयिस्थिते क्व यास्यसीति' रावणमाहूयान्तरिक्षमुत्पतितो जटायुः ।
द्वितीयः—एष रोषादुद्वृत्तनयनः प्रतिनिवृत्तो रावणः ।
प्रथमः—एष रावणः ।
द्वितीयः—एष जटायुः ।
उभौ—हन्तैतदन्तरिक्षे प्रवृत्तं युद्धम् ।
प्रथमः—काश्यप ! काश्यप ! पश्य क्रव्यादीश्वरस्य सामर्थ्यम्—
पक्षाभ्यां परिभूय वीर्यविषयं द्वन्द्वं परिव्यूहते
तुण्डाभ्यां सुनिघृष्टतीक्ष्णमचलः संवेष्टनं चेष्टते ।
तीक्ष्णैरायसकण्टकैरिव नखैर्भीमान्तरं वक्षसो
वज्राग्रैरिव दार्यमाणविषमाच्छैलाच्छिला पाट्यते ॥३१॥
[अन्वयः—पक्षाभ्यां परिभूय वीर्यविषयं द्वन्द्वं प्रतिव्यूहते । अचलः तुण्डाभ्यां
सुनिघृष्ट तीक्ष्णं संवेष्टनं चेष्टते । आयसकण्टकैः इव वज्राग्रैः इव तीक्ष्णैः नखैः
वक्षसः भीमान्तरं पाटयते, इव वज्राग्रैः दार्यमाणविषमात् शैलात् शिला पाटयते ॥३१॥]
हिन्दी रूपान्तर—
दोनों—आप सब रक्षा करें, रक्षा करें ।
पहला—(ऊपर देखकर) अरे, कहने के साथ ही मित्र दशरथ के उपकारों
के ऋण से मुक्त होने के लिये "मेरे होते हुये तुम कहाँ जाओगे", इस प्रकार रावण
को ललकार कर जटायु आकाश में उड़ गया है ।
दूसरा—क्रोध से आंखों की पुतलियों को घुमाता हुआ यह रावण लौट
आया है ।
पहला—यह रावण है ।
दूसरा—यह जटायु है ।
दोनों—अहो, आकाश में इनका युद्ध प्रारम्भ हो गया है ।
पहला—काश्यप ! काश्यप ! गृध्रों के राजा के सामर्थ्य को देखो—

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