प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८ ] प्रतिमानाटकम्
भृत्याद्यभावात् तानि निजकरैरेव रचितानि भविष्यन्ति । एतद् दृष्ट्वा पितृलोकेऽपि
तातोऽस्माकं वनवासं स्मृत्वा रोदिष्यति । श्राद्धेषु पुत्रैः ब्राह्मणेभ्यः प्रदत्तान्येव
वस्तूनि पितरो लभन्त इति प्रसिद्धिः ।।६।।
व्याकरण — स्वैः हस्तैः रचितानि = स्वहस्तरचितानि । √हस् + तन् = हस्त ।
√रच् + णिच् + क्त = रचित । √स्मृ + णिच् + क्त = स्मारित ।
छन्दः — अनुष्टुप् ।
अलङ्कार — भाविक और स्मरण । पितरों की भविष्य की अवस्था का प्रत्यक्ष
के समान वर्णन करने से भाविक अलङ्कार है । समान वस्तु को देखकर अन्य समान
वस्तु का स्मरण करना स्मरण अलङ्कार है । वनवास के योग्य दर्भ और फल देखकर
वनवास का स्मरण करने से स्मरण अलङ्कार है ।
भरतः श्राद्धम् ऋद्धया — भरत के पास राज्यवैभव है, अतः वह पिता के
योग्य श्राद्ध का निर्वाह बड़े वैभव से करेगा ही ।
अवस्थानुरूपं फलोदकेन — अवस्थायाः अनुरूपम् = अवस्थानुरूपम् । रूपस्य
योग्यम् = अनुरूपम् । वन में रहने के कारण राम को केवल फल और जल ही प्राप्य
हैं, अतः वे इसी से श्राद्ध सम्पन्न कर सकते हैं ।
(ततः प्रविशति परिव्राजकवेषो रावणः)
रावण—एष भोः ।
नियतमनियतात्मा रूपमेतद् गृहीत्वा
खरवधकृतवैरं राघवं वञ्चयित्वा ।
स्वरपदपरिहीणां हव्यधारामिवाहं
जनकनृपसुतां तां हर्तुकामः प्रयामि ॥७॥
[अन्वयः—अनियतात्मा अहम् एतत् रूपं गृहीत्वा नियतं खरवधकृतवैरं राघवं
वञ्चयित्वा स्वरपदपरिहीणां हव्यधाराम् इव तां जनकनृपसुतां हर्तुकामः प्रयामि ॥७॥]
हिन्दी रूपान्तर—
(तदनन्तर परिव्राजक के वेष में रावण प्रवेश करता है)
रावण—हे लोगो ! यह—
अर्थ [श्लोक ७]—इन्द्रियों के अधीन होता हुआ मैं इस परिव्राजक के रूप
को धारण करके, नियमों का पालन करने वाले और खर राक्षस के साथ वैर को
करने वाले अर्थात् उसका वध करने वाले रघुवंशी राम को ठग कर, स्वरों और पदों
से विहीन आहुत की जाती हुई घृतधारा के समान उस जनकराजा की पुत्री सीता का
अपहरण करने की इच्छा से जा रहा हूँ । जिस प्रकार हवन में घृत की आहुति, यदि
वह स्वर तथा पद से अशुद्ध मन्त्रोच्चारण करके डाली जावे, तो उसका राक्षस
अपहरण कर लेते हैं, उसी प्रकार मैं सीता का अपहरण करूँगा ॥७॥