प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽङ्कः [ १४७
विशेष भोजन कराया जाता है । विश्वास किया जाता है। कि यह भोजन पितृलोक
में स्थित पितरों को प्राप्त होता है । श्राद्ध का लक्षण है—
संस्कृतव्यञ्जनाढ्यञ्च पयोदधिघृतान्वितम् ।
श्रद्धया दीयते यस्मात् श्राद्धं तेन निगद्यते ॥
प्रतिवर्ष आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में मृत्यु की तिथि के अनुसार श्राद्ध
किया जाता है । इसको अनुसंवत्सर (वार्षिक) श्राद्ध कहते हैं । संवत्सरं संवत्सरम्
अनु = अनुसंवत्सरम् ।
सीता—अय्यउत्त णिव्वत्तइस्यदि सद्धं भरदो रिद्धीए, अवत्थाणुरूंव ।
फलोदएण वि अय्यउत्तो । एदं तादस्स बहुमदअरं भविस्सदि । [आर्यपुत्र ! निर्वर्त्त-
यिष्यति श्राद्धं भरत ऋद्ध्या, अवस्थानुरूपम् फलोदकेनाप्यार्यपुत्रः । एतत्
तातस्य बहुमततरं भविष्यति । ]
रामः—मैथिलि !
फलानि दृष्ट्वा दर्भेषु स्वहस्तरचितानि नः ।
स्मारितो वनवासं च तातस्तत्रापि रोदिति ॥६॥
[अन्वयः—दर्भेषु नः स्वहस्तरचितानि फलानि दृष्ट्वा, वनवासं च स्मारितः
तातः तत्र अपि रोदिति ॥६॥]
हिन्दी रूपान्तर—
सीता—आर्यपुत्र ! अवस्था के अनुरूप वैभव के साथ भरत श्राद्ध को सम्पन्न
करा देंगे । आर्यपुत्र फल और जल से श्राद्ध सम्पन्न कर लें । तात के लिये यही बहुत
अधिक सम्माननीय होगा ।
राम—सीते !
अर्थ [श्लोक ६]—दर्भों पर हमारे अपने हाथों से रखे हुये फलों को देख
कर और हमारे वनवास को स्मरण करके पिता वहाँ भी रो पडेंगे विश्वास किया
जाता है कि श्राद्ध में जो वस्तु ब्राह्मणों को अर्पित की जाती है, वही पितृलोक में
पितरों को प्राप्त होती है । हम दर्भों पर फल रख कर देंगे, तो वहाँ पिता को हमारे
वनवास का स्मरण हो आयेगा और वे निश्चय ही उसको देखकर रोयेंगे ॥६॥
संस्कृत-व्याख्या—दर्भेषु कुशेषु नः अस्माकं स्वहस्तरचितानि स्वैः निजैः
हस्तैः करैः रचितानि स्थापितानि फलानि दृष्ट्वा अवलोक्य, वनवासम् अस्माकमरण्ये
निवसनं च स्मारितः तातः पिता दशरथः तत्र पितृलोके अपि रोदिति विलापं करि-
ष्यति । अस्माकं सौवर्णादीनि पात्राणि न सन्ति, अतः दर्भाणामेव प्रयोगो भविष्यति
आधारत्वेन । एवं च श्राद्धवस्तूनि फलान्येव भविष्यन्ति महार्घ व्यञ्जनाद्यभावात् ।
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