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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 296 में से

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पृष्ठ 204

पञ्चमोऽङ्कः
(ततः प्रविशति सीता तापसी च)
सीता—अय्ये ! उवहारसुमणाइण्णो सम्माजिदो अस्समो । अस्समपदविभ-
वेण अणुट्ठिठओ देवसमुदाआरो ता जाव अय्यउत्तो ण आअच्छदि, दाव इमाणं वालरु-
क्खाणं उदअप्पादाणेण अणुक्कोसइस्सं । [आर्ये ! उपहारसुमनआकीर्णः सम्मा-
र्जित आश्रमः । आश्रमपदविभवेनानुष्ठितो देवसमुदाचारः । तद्यावदार्यपुत्रो
नागच्छति, तावदिमान् बालवृक्षानुदकप्रदानेनानुक्रोशिष्यामि ।]
तापसी—अविग्धं से होदु । (अविघ्नमस्य भवतु)
(ततः प्रविशति रामः)
रामः—(सशोकम्)
त्यक्त्वा तां गुरुणा मया च रहितां रम्यामयोध्यापुरी—
मुद्यम्यापि समाभिषेकमखिलं मत्सन्निधावागतः ।
रक्षार्थं भरतः पुनर्गुणनिधिस्तत्रैव सम्प्रेषितः
कष्टं भोः ! नृपतेर्धुरं सुमहतीमेकः समुत्कर्षति ॥१॥
[अन्वयः—गुरुणा मया च रहितां तां रम्याम् अयोध्यापूरीं त्यक्त्वा, मम
अखिलम् अभिषेकम् अपि उद्यम्य मत्सन्निधौ आगतः । गुणनिधिः भरतः रक्षार्थं पुनः
तत्र एव सम्प्रेषितः । भोः ! कष्टम् । नृपतेः सुमहतीं धुरम् एकः समुत्कर्षति ॥१॥
हिन्दी रूपान्तर—
(तदनन्तर सीता और तापसी प्रवेश करते हैं)
सीता—आर्ये ! देवीपहार के पुष्पों से आकीर्ण आश्रम को झाड़—बुहार कर
स्वच्छ कर दिया है। आश्रम के वैभव के अनुरूप पुष्प आदि से देवपूजन को सम्पन्न
कर दिया । तो जब तक आर्यपुत्र नहीं आते हैं, तब तक इन छोटे वृक्षों को जल
देकर सींच देती हूँ ।
तापसी—यह कार्य निर्विघ्न पूरा हो ।
(तदनन्तर राम प्रवेश करते हैं)
राम—(दुःख के साथ)
अर्थ {श्लोक १]—पिता से तथा मुझसे रहित उस रमणीय अयोध्या नगरी
को छोड़ कर, मेरे सम्पूर्ण राज्याभिषेक की सामग्री को उठाकर जो मेरे समीप आया
था, गुणों के निधान उस भरत को, राज्य की रक्षा के लिये पुनः वहीं भेज दिया
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