सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 296 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 202

१३८ ] प्रतिमानाटकम्
अत्राभिषेकोदक...—भरत चाहते हैं कि उनके ऊपर इस बात का कलङ्क
किञ्चिन्मात्र भी न रहे कि वे राज्य के लोभी हैं । अतः राम के प्रतिनिधि के रूप
में उनकी पादुकाओं को लेकर उन्हीं पर राज्याभिषेक के जल को छिड़कवाते हैं ।
राज्यं मुहूर्तमपि नोपेक्षणीयम् — राज्यशासन निरन्तर शासक की दृष्टि
चाहता है कि राजा को सतत जागरूक रहना चाहिये । क्षण भर की लापरवाही भी
बहुत अधिक विनाश का कारण हो सकती है ।
अलमतिस्नेहेन — भरत को जाना तो पड़ेगा ही । अतः राम का सीता से
कहना है कि तुम अब बहुत अधिक स्नेह मत दिखाओ और भरत को जाने दो ।
रामः — वत्स कैकेयीमातः ! राज्यं नाम मुहूर्तमपि नोपेक्षणीयम् ।
तस्मादद्यैव विजयाय प्रतिनिवर्ततां कुमारः ।
सीता -- हं, अज्ज एव्व गमिस्सदि कुमारो भरदो ? [हूँ, अद्यैव गमिष्यति
कुमारो भरतः ? ]
रामः -- अलमतिस्नेहेन । अद्यैव विजयाय प्रतिनिवर्ततां कुमारः ।
हिन्दी रूपान्तर—
राम—वत्स कैकेयीपुत्र ! राज्य की क्षण भर भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये ।
इसलिये आज ही विजय प्राप्त करने के लिये कुमार लौट जावें ।
सीता—हूँ, कुमार भरत आज ही लौट जायेंगे ?
राम—अत्यधिक स्नेह मत दिखाओ । विजय प्राप्त करने के लिये कुमार
आज ही लौट जावें ।
भरतः—आर्य ! अद्यैवाहं गमिष्यामि ।
आशावन्तः पुरे पौराः स्थास्यन्ति त्वद्दिदृक्षया ।
तेषां प्रीतिं करिष्यामि त्वत्प्रसादस्य दर्शनात् ॥२८॥
[अन्वयः—पुरे आशावन्तः पौराः त्वद्दिदृक्षया स्थास्यन्ति । त्वत्प्रसादस्य
दर्शनात् तेषां प्रीतिं करिष्यामि ॥२८॥]
हिन्दी रूपान्तर—
भरत—आर्य ! मैं आज ही चला जाऊँगा ।
अर्थ [श्लोक २८]—नगर में आशाओं से भरे हुये नगरनिवासी आपके
दर्शन की इच्छा कर रहे होंगे । आपकी कृपा रूप इन पादुकाओं का दर्शन कराकर
उनको प्रसन्न करूँगा ॥२८॥
संस्कृत व्याख्या—पुरे नगरे आशा वन्तः उत्कण्ठावन्तः रामः प्रतिनिवर्तिष्यते
तस्य राज्याभिषेको भविष्यति, स च राजसिंहासनमधिरुह्य प्रजारञ्जनं करिष्यतीति