प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽङ्कः । १३५
[अन्वयः—पादोपभुङ्क्ते एते तव पादुके मूर्ध्ना प्रणताय मे प्रयच्छ। यावत्
भवान् कार्यसिद्धिम् एष्यति, तावद् अनयोः विधेयः भविष्यामि ॥२५॥]
हिन्दी रूपान्तर—
भरत—हाय ! इस प्रकार कहा है कि इसका उत्तर नहीं हो सकता।
अच्छा, शर्त पूरा करने पर तुम्हारे राज्य की रक्षा करूँगा।
राम—वत्स ! तुम्हारी क्या शर्त है ?
भरत—मेरे हाथ में तुमने जो राज्य धरोहर रूप में रखा है। उसको चौदह
वर्षों के अन्त में वापिस करना चाहता हूँ।
राम—ऐसा ही हो।
भरत—आर्य ! आपने सुन लिया है ? आर्ये ! आपने सुन लिया है ?
तात ! आपने सुन लिया है ?
सब लोग—हम सब भी श्रोता हैं।
भरत—आर्य ! कुछ और भी वर आपसे लेना चाहता हूँ।
राम—वत्स ! क्या चाहते हो ? तुमको मैं क्या दूँ ? तुम्हारे लिये मैं
क्या करूँ ?
भरत—
अर्थ [श्लोक २५]—पैरों में पहनी गई इन अपनी खड़ाउओं को, सिर से
प्रणाम करने वाले मुझको दे दीजिये। जब तक आप अपने कार्य को सफल करके
आयेंगे, तब तक मैं इन खड़ाउओं का आज्ञापालक होकर रहूँगा ॥२५॥
संस्कृत-व्याख्या—पादोपभुङ्क्ते पादाभ्यां चरणाभ्याम् उपभुङ्क्ते उपभोगं
कारिते, व्यवहृते इत्यर्थः, एते इमे तव रामस्य पादुके काष्ठनिर्मिते पादत्राणे मूर्ध्ना
शिरसा प्रणताय प्रणामं कुर्वते, शिरोऽवनमय्य प्रणमते मे मह्यं प्रयच्छ देहि। यावत्
यदवधि भवान् कार्यसिद्धिम् एष्यति कार्य सफलतामधिगम्य अत्र आगमिष्यति, तावत्
तावत्कालपर्यन्तम् अनयोः तव पादुकयोः विधेयः आज्ञावशवर्ती भविष्यामि। वस्तुतः
तव पादुके शासनाधिकारं निर्वर्त्स्यथ। अहं तु तयोः वशवर्ती भूत्वा राज्याधिकार-
वहनकार्यं करिष्यामि ॥२५॥
व्याकरण—पादाभ्याम् उपभुङ्क्ते = पादोपभुङ्क्ते। उप + भुंज् + क्त =
उपभुक्त। प्र + √ नम् + क्त = प्रणत। वि + √ धा + यत् = विधेय।
छन्दः—इन्द्रवज्रा छन्द।
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रामः—(स्वगतम्) हन्त भोः !
सुचिरेणापि कालेन यशः किञ्चिन्मयार्जितम्।
सुचिरेणैव कालेन भरतेनाद्य सञ्चितम् ॥२६॥