प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३४ ] प्रतिमानाटकम्
चेत् यदि त्वं स्वराज्यं स्वकीयं शासनाधिपत्यं न परिरक्षसि परित्रायसे, मे शापितः
अहं तुभ्यं शपथेन बध्नामि अहं त्वां शपथेनेदं कथयामि ॥ २४॥
व्याकरण—भवतः नियमस्य अवसानम् = भवन्नियमावसानम् । अव + √
सो + ल्युट् (अन) अवसान ।
स्वैः सुकृतैः = स्वसुकृतैः । सु + √ कृ + क्त = सुकृत । √ शप् + णिच् + क्त =
शापित ।
छन्दः—वसन्ततिलका ।
अनुत्तरमभिहितम्—न विद्यते उत्तरः यस्य तत् = न + उत्तरं = अनुत्तर ।
अभि + धा + क्त = अभिहित । राम ने जो कहा था, भरत के पास उसका कोई
उत्तर नहीं था, क्योंकि पिता को मिथ्यावादी बनाना उसके लिये अनुचित था ।
कः समयः—समय के अनेक अर्थ हैं—शपथ, काल, समझौता, शर्त आदि ।
यहाँ समय पद का अर्थ शर्त है—"समया—शपथाचारकालसिद्धान्तसंविदः” ।
प्रतिग्रहीतुम्—सामान्यतः 'प्रतिगृहीतुम्' पद का अर्थ है—स्वीकार करने के
लिये, लेने के लिये । परन्तु यह अर्थ यहाँ संगत नहीं है, क्योंकि भरत चाहते हैं कि
वनवास की अवधि पूरी होने पर वे पुनः राम को राज्य वापिस कर दें । अतः यहाँ
अन्तर्भावित ण्यथं मानने पर अर्थ की संगति हो सकेगी । इसका अर्थ होगा कि
'प्रतिग्राहयितुम्' आप को राज्य स्वीकार कराना चाहता हूँ ।
भरतः—हन्त, अनुत्तरमभिहितम् । भवतु समयतस्ते राज्यं परिपाल-
यामि ।
रामः—वत्स ! कः समयः ?
भरतः—मम हस्ते निक्षिप्तं तव राज्यं चतुर्दशवर्षान्ते प्रतिगृहीतु-
मिच्छामि ।
रामः—एवमस्तु ।
भरतः—आर्य ! श्रुतम् ? आर्ये ! श्रुतम् ? तातः ! श्रुतम् ?
सर्वेः—वयर्माप श्रोतारः ।
भरतः—आर्य ! अन्यमपि वरं हर्तुमिच्छामि ।
रामः—वत्स ! किमिच्छसि ? किमहं ददामि ? किमहमनुष्ठास्यामि ?
भरतः— पादोपभुक्ते तव पादुके मे
एते प्रयच्छ प्रणताय मूर्ध्ना ।
यावद् भवानेष्यति कार्यसिद्धिं
तावद् भविष्याम्यनयोर्विधेयः ॥२५॥
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