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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद की जगती एक हाथ, दो-हाथ के प्रासाद की जगती
डेढ़ हाथ, तीन हाथ के प्रासाद की जगती दो हाथ, चार हाथ के प्रासाद की जगती ढाई हाथ
ऊंची बनावे। पीछे पाँच से बारह हाथ तक के प्रासाद की जगती दूसरे भाग की अर्थात् प्रासाद
से आधी, तेरह से चौबीस हाथ के प्रासाद की जगती तीसरे भाग और पचीस से पचास हाथ
तक के प्रासाद की जगती चौथे भाग जितनी ऊंची बनावें ॥१०॥
(यह अपराजितपृच्छा का मत है। देखें सूत्र ११५ श्लोक २३ से २६)
जगती के उदय का थर मान—
तदुच्छ्रयं भजेत् प्राज्ञ-स्त्वष्टाविंशतिभिः पदैः ।
त्रिपदो जाड्यकुम्भश्च द्विपदं कर्णकं तथा ॥११॥
पद्मपत्रसमायुक्ता त्रिपदा शिरःपत्रिका¹ ।
द्विपदं खुरकं कुर्यात् सप्तभागं च कुम्भकम् ॥१२॥
कलशस्त्रिपदः प्रोक्तो भागेनान्तरपत्रकम् ।
कपोतालिस्त्रिभागा च पुष्पकण्ठो युगांशकः ॥१३॥
पुष्पकाज्जाड्यकुम्भस्य निर्गमश्चाष्टभिः पदैः ।
कर्णेषु च दिशांपालाः प्राच्यादिषु प्रदक्षिणाः ॥१४॥
जगती के उदय के अट्ठाईस भाग करे। उनमे से तीन भाग का जाड्यकुम्भ, दो
की कर्णिका (कणी), तीन भाग का पद्मपत्र (दासा) सहित ग्रासपट्टी, दो भाग का खुरा,
सात भाग का कुम्भ, तीन भाग का कलश, एक भाग का अंतरपत्र, तीन भाग की कपोताली
(केवाल) और चार भाग का पुष्पकंठ बनावे। पुष्पकंठ से जाड्यकुम्भ का निर्गम आठ भाग
रक्खे। जगती के कोने में पूर्वादि सृष्टि क्रम से दिक्पालों को स्थापित करना चाहिये ॥११ से १४॥
जगती के आभूषण—
प्राकारैर्मण्डिता कार्या चतुर्भिर्द्वारमण्डपैः ।
मकरैर्जलनिष्कासैः सोपानैस्तोरणादिभिः ॥१५॥
जगती को किलों से शोभायमान करें, अर्थात् जगती के चारो तरफ किला बनावें । तथा
चारों दिशाओं में मण्डप वाले चार द्वार बनावे। पानी निकलने के लिये मगर के मुख वाली
नाली रक्खे। एवं सीढ़ियां और तोरणों से शोभायमान जगती बनायें ॥१५॥
(१) शीर्षपत्रिका ।

द्वितीयोऽध्यायः २६
जगती का उदय और उसके थरों का दिग्दर्शन—
• वामनदेवालय
नरपीठ
गजपीठ
कपोती
ग्रासपट्टी
कपोतिका
अन्तरपत्र
कलशो
कुंभो
खुरो
जगती उदय भाग २८
जगती मण्डप
तोरण
जगती द्वार
जगती का द्वार और द्वार मंडप तथा जगती के ऊपर प्रासाद की महापीठ

३८ : प्रासादमण्डने
मण्डपाग्रे प्रतोल्‍यग्रे सोपानं शुण्डिकाकृतिम् ।
तोरणं कारयेत्¹ तस्य पदपदानुसारतः² ॥१६॥
मण्डप के आगे और प्रतोली (पोले) के आगे सीढियाँ बनावें, इसके दोनों तरफ हाथी
की आकृति रक्खे। प्रत्येक पद के अनुसार तोरण बनावे ॥१६॥
तोरणस्योभयस्तम्भ-विस्तारं गर्भमानतः ।
भित्तिगर्भप्रमाणेन सम्मानेन³ वा भवेत् ॥१७॥ -
तोरण के दोनों स्तंभ के मध्य का विस्तार प्रासाद के गर्भगृह के मान से, अथवा दीवार
के गर्भमान से, अथवा प्रासाद के मान से रखा जाता है ॥१७॥
वेदिका पीठरूपा च शोभाभिर्बहुभिर्युता ।
विचित्रं तोरणं कुर्याद् दोला देवस्य तत्र च ॥१८॥
यह जगतीरूप वेदिका प्रासाद की पीठरूप है, इसलिये इसे अनेक प्रकार के रूपों तथा
तोरणों से शोभायमान बनाना चाहिये। तोरणों के झूलों में देवों की आकृतियां बनावें ॥१८॥
देवके वाहन का स्थान--
प्रासादाद्वाहनस्थाने करणीया चतुष्किका ।
एकद्वित्रिचतुःपञ्च-रससप्तपदान्तरे ॥१९॥
देवों के वाहन रहने के स्थान पर चौकी बनावें। यह चौकी प्रासाद से एक, दो, तीन,
चार, पाच, छह अथवा सात पद जितनी दूर बनावें ॥१९॥
देवके वाहन का उदय--
अर्चायामे⁴ नवांशे तु पञ्चषट्सप्त भागिकः ।
गुह्यनाभिस्तनान्तं वा त्रिविधो वाहनोदयः ॥२०॥
मूर्त्ति के उदय का नव भाग करे। उनमे से पांच, छह अथवा सात भाग के मान का
वाहन का उदय रख। अथवा गुह्य, नाभि या स्तन पर्यन्त वाहन का उदय रक्खे। ये तीन २
प्रकार के वाहन का उदय कहा गया है ॥२०॥
(१) 'त्रिविध कुर्यात्' (२) 'पट्ट पट्टानुसारतः'। (३) 'तयोर्मध्येऽथवा भवेत्'। (४) 'अर्चाया नवमांशे तु,'

द्वितीयोऽध्याय ३१
देवके वाहन का दृष्टिस्थान—
पादं जानु कटिं याव-दर्चाया वाहनस्य दृक् ।
वृषस्य विष्णुभागान्ते सूर्ये व्योमस्तनान्तकम् ॥२१॥
मूत्ति के चरण, जानु अथवा कमर पर्यन्त ऊंचाई में वाहन की दृष्टि रखनी चाहिये ।
वृषभ (नन्दी) की दृष्टि शिवलिंग के विष्णु भाग तक और सूर्य के वाहन (घोडा) की दृष्टि
मूत्ति के स्तनभाग तक रखनी चाहिये ॥२१॥
अपराजितपृच्छा में कहा है कि—
"वृषस्य चोच्छ्रयः कार्यो विष्णुभागान्तदृष्टिकः ॥-
पादं जानु कटिं याव-दर्चाया वाहनस्य दृक् ।
गुह्यनाभिस्तनान्तं वा सूर्ये व्योमस्तनान्तिकम् ॥
विलोमे कुरुते पीडा-मधोदृष्टिः सुखक्षयम् ।
स्थानं हन्यादूर्ध्वदृष्टिः स्वस्थाने मुक्तिदायिकां ॥" सूत्र० २०८
वृषभ की ऊंचाई शिवलिंग के विष्णुभाग तक दृष्टि रहे, इस प्रकार रखे । देवो के
वाहन की दृष्टि उनके चरण, जानु अथवा कटि तक रहे तथा गुह्य नाभि और स्तन तक दृष्टि रहे,
इस प्रकार ऊंचाई रखे । इससे विपरीत रखने से दुख होवेगा । उपरोक्त मान से नीची दृष्टि
रहने पर सुख का क्षय होगा और यदि ऊंची दृष्टि ही रहेगी, तो, स्थान भ्रष्ट होगा । इसलिये
कहे हुए अपने २ स्थान मे दृष्टि रखने से मुक्तिपद मिलता है।
जिन प्रासाद के मंडपों का क्रम—
जिनाग्रे समोसरणं शुकाग्रे गूढमण्डपः ।
गूढस्याग्रे¹ चतुष्किा तदग्रे नृत्यमण्डपः ॥२२॥
जिन प्रासाद के आगे समवसरण बनाना । शुकनास (कंवलीमण्डप) के आगे गूढ मण्डप,
इसके आगे चौकी मंडप और इसके आगे नृत्यमडप बनाने चाहिये ॥२२॥
जिनप्रासाद में देवकुलिकाका क्रम—
द्विसप्तत्या द्विषष्टौर्वा चतुर्विंशतितोऽपि वा ।
जिनालये चतुर्दिक्षु सहितं जिनमन्दिरम् ॥२३॥
ऐसा जिनमन्दिर बनाना चाहिये की जिनप्रासाद के चारो तरफ बहत्तर, बावन अथवा
चौबीस देवकुलिकाये हो ॥२३॥
(१) 'तस्याग्रे षट्त्रिका वा च' ।

३२ प्रासादमण्डने
परमजैन ठक्कुर 'फेरूं' विरचित वत्थुसारपयरण के तीसरे प्रकरण में देवकुलिका का
क्रम बतलाया है। जैसे-
बावन जिनालय-
"चउतीसं वाम दाहिण नव पुट्ठि अट्ठ पुरओ अ देहरयं ।
मूलपासाय एगं; बावन्नजिनालये एवं ॥"
जिनप्रासाद के बायीं और दाहिनी ओर सत्रह २, पीछे के भाग में नौ और आगे आठ,
ऐसे इकावन देवकुलिका और एक मुख्य प्रासाद मिलकर कुल बावन जिनालय कहा जाता है।
बहत्तर देवकुलिका-
"पणवीसं पणवीसं दाहिणवामेसु पिट्ठि इग्गारं ।
दह अग्गे नायव्वं इअ बंहत्तरि जिणिदालं ॥"
जिनप्रासाद के बांयी और दाहिनी ओर पच्चीस २, पीछे की तरफ ग्यारह और आगे
की तरफ दस, ऐसे इकहत्तर देवकुलिका और एक मुख्य प्रासाद मिलकर कुल बहत्तर जिनालय
कहा जाता है।
चौबीस देवकुलिका-
"अग्गे दाहिण वामे अट्ठट्ठजिणिदगेह चउवीसं ।
मूलसिलागाउ कमं पकीरए जगइ-मज्झम्मि ॥"
मुख्य जिनप्रासाद के आगे, दाहिनी और बायी ओर, ऐसे तीन दिशा में आठ २
देवकुलिका बनाने से कुल चौबीस जिनालय कहा जाता है। ये सब देवकुलिकाएं जगती के
प्रान्त (सरहद) भाग मे की जाती है।
मण्डपाद् गर्भसूत्रेण वामदक्षिणयोर्दिशोः ।
अष्टापदं प्रकर्त्तव्यं त्रिशाला वा बलाणकम् ॥२४॥
मुख्य जिनप्रासाद के गूढ मंडप की बायीं और दाहिनी ओर अष्टापद, त्रिशाला अथवा
वलाणक बनावे। (सामने भी बलाणक बनाया जाता है) ॥२४॥
रथ और मठ का स्थान-
अपरे रथशाला च मठं याम्ये प्रतिष्ठितम् ।
उत्तरे रथरन्ध्रं च प्रोक्तं श्रीविश्वकर्मणा ॥२५॥
देवालय के पीछे की तरफ रथशाला, दक्षिण मे मठ (धर्मगुरु का स्थान) और उत्तर मे
रथ का प्रवेश द्वार बनावें। ऐसा विश्वकर्मा ने कहा है ॥२५॥

द्वितीयोऽध्याय ३३
जगती तादृशी कार्या प्रासादो यादृशो भवेत् ।
भिन्नच्छन्दा न कर्त्तव्या प्रासादासनसंस्थिता ॥२६॥
इति प्रासादजगती ।
प्रासाद जिस आकार का हो, उसी आकार की जगती बनानी चाहिये । भिन्न आकार
की नहीं बनानी चाहिये । क्योंकि यह प्रासाद का आसनरूप है ॥२६॥
अन्य प्रासाद—
अग्रतः पृष्ठतश्चैव वामदक्षिणयोर्दिशोः१ ।
प्रासादं कारयेदन्यं नाभिवेधविवर्जितम् ॥२७॥
मुख्य प्रासाद के आगे, पीछे, बायी और दाहिनी ओर दूसरे प्रासाद बनाये जाय, वे सब
नाभिबेध ( प्रासाद के गर्भ ) को छोड़कर के बनावे ॥२७॥
शिवलिंग के आगे अन्य देव—
लिङ्गाग्रे तु न कर्त्तव्या अर्चारूपेण देवताः ।
प्रभानष्टा न भोगाय यथा तारा दिवाकरे ॥२८॥
शिवलिंग के सामने कोई सी देव पूजन के रूप में स्थापित करना नहीं चाहिये । क्योकि
जैसे सूर्य के तेज से ताराओं की प्रभा नष्ट होती है, वैसे दूसरे देवों की प्रभा नष्ट होती है ।
इसलिये वे देव भोगादि सुख संपत्ति नही दे सकते ॥२८॥
देव के सम्मुख स्वदेव—
शिवस्याग्रे शिवं कुर्याद् ब्रह्माणं ब्रह्मणोऽग्रतः ।
विष्णोरग्रे भवेद् विष्णु-र्जिने२ जिनो रवौ रविः ॥२९॥
शिवके सामने शिव, ब्रह्मा के सामने ब्रह्मा, विष्णु के सामने विष्णु, जिनदेव के सामने
जिनदेव और सूर्य के सामने सूर्य, इस प्रकार आपस मे स्वजातीय देव स्थापित किया जाय तो
दोष नही माना जाता ॥२९॥
'चण्डिकाग्रे भवेन्माता यक्षः क्षेत्रादिभैरवः ।
ज्ञेयास्तेषामभिमुखे ये येषां च हितेषिणः ॥' अप० सू० १०८
चंडिका आदि देवी के सामने मातृदेवता, यक्ष, क्षेत्रपाल और भैरव आदि देव स्थापित
किये जायें तो दोष नही है । क्योकि वे आपस मे हितैषी है ।
(१) 'तोऽपि वा' । (२) जिने जैनो ।
प्रा० ५

३४ प्रासादमण्डने
परस्पर दृष्टिवेध—
ब्रह्मा विष्णुरेकनाभि-द्वाभ्यां¹ दोषो न विद्यते ।
शिवस्याग्रेऽन्यदेवस्य दृष्टिवेधे महद्भयम् ॥३०॥
ब्रह्मा और विष्णु ये दोनो देव एक नाभि मे हों अर्थात् उनका देवालय आपस में
सामने हो तो दोष नही है । परंतु शिवके सामने दूसरे देवका दृष्टिवेध होता हो तो बड़ा भय
उत्पन्न होता है ॥३०॥
दृष्टिवेध का परिहार—
प्रसिद्धराजमार्गस्य प्राकारस्यान्तरेऽपि वा ।
स्थापयेदन्यदेवांश्च तत्र दोषो न विद्यते ॥३१॥
शिवालय और अन्य देवों के देवालय, इन दोनों के बीच मे प्रसिद्ध राजमार्ग ( आम
रास्ता ) हो, अथवा दीवार हो तो दोष नही है ॥३१॥
शिवस्नानोदक—
शिवस्नानोदकं गूढ-मार्गे चण्डमुखे क्षिपेत् ।
दृष्टं न लङ्घयेत्तत्र² हन्ति पुण्यं पुराकृतम् ॥३२॥
शिव का स्नानजल गुप्त
मार्ग से चण्डगण के मुख में
गिरे, इस प्रकार स्नान का जल
निकलने की गुप्त नाली रखना
चाहिये । दिखते हुये स्नान जल का
उल्लंघन ( लाघना ) नहीं करना
चाहिये । क्योकि स्नान जल का
उल्लंघन करने से पूर्वकृत पुण्य का
नाश होता है ॥३२॥ *
चंडगण शिवस्नानोदक पी रहा है
(१) जिने । (२) स्नानं ।

  • चंडनाथ गणदेव का स्वरूप अपराजित पृच्छा सूत्र २०८ में लिखा है कि-स्थूल शरीर बाला,
    भयंकर मुख वाला, ऊर्ध्वासन बैठा हुआ और दोनों हाथ से स्नान जल पीता हुआ, ऐसा स्वरूप बना करके
    पीठिका के जल स्थान के नीचे स्थापन किया जाता है, जिससे स्नान का जल उसके मुख में होकर बाहर
    गिरे । इस स्नान जल के उच्छिष्ट होजाने पर उसका यदि कभी उल्लंघन हो जाय तो दोष नही माना जाता,
    ऐसा शिल्पियो का कहना है ।

द्वितीयोऽध्यायः ३५
देवों की प्रदक्षिणा—
एका चण्ड्या रवौ सप्त तिस्रो दद्याद् विनायके ।
चतस्रो वासुदेवस्य¹ शिवस्यार्धा प्रदक्षिणा ॥३३॥
चंडीदेवी को एक, सूर्य को सात, गणेश को तीन, विष्णु को चार और महादेव को
आधी प्रदक्षिणा देनी चाहिये ॥३३॥
अग्रतो जिनदेवस्य स्तोत्रमन्त्रार्चनादिकम् ।
कुर्यान्न दर्शयेत् पृष्ठं सम्मुखं द्वारलङ्घनम् ॥३४॥
जिनदेव के आगे स्तोत्र, मंत्र और पूजन आदि करे । परंतु बाहर निकलते समय अपनी
पीठ नही दिखावे, सम्मुख ही पिछले पैर चलकर द्वार का उल्लंघन करे ॥३४॥
जलमार्ग (पनाला)—
पूर्वापरमुखे द्वारे प्रणालं शुभमुत्तरे ।
इति शास्त्रविचारोऽय-मुत्तरास्या² न देवताः ॥३५॥
पूर्व और पश्चिम दिशा के द्वार वाले प्रासाद की नाली (पनाला) उत्तर दिशा मे
रखना शुभ है । उत्तर दिशा में (दक्षिणाभिमुख) किसी भी देव की स्थापना नही करे ऐसा
शास्त्र का नियम है ॥३५॥
अपराजितपृच्छा में लिखा है कि—
“पूर्वापरं यदा द्वारं प्रणालं चोत्तरे शुभम् ।
प्रशस्तं शिवलिङ्गाना-मिति शास्त्रार्थनिश्चयः ॥” सूत्र० १०८
पूर्व और पश्चिम दिशा के द्वार वाले प्रासाद की नाली उत्तर दिशा मे रखना शुभ है ।
शिवलिंग के लिये तो यह नियम विशेष प्रशंसनीय है । ऐसा शास्त्र का नियम है ।
“अर्चानां मुखपूर्वाणां प्रणाल वामंत. शुभम् ।
उत्तरास्या न विज्ञेया अर्चािरूपेण देवताः ॥” सूत्र० १०८
यदि देवो का मुख पूर्व दिशा के सामने हो तो उसकी नाली बायी ओर रखना शुभ है ।
उत्तर दिशा मे दक्षिणाभिमुख किसी भी देव की मूर्त्ति स्थापित नहीं करे ।
(१) विष्णुदेवस्य । (२) मुत्तरेणा ।

३६ प्रासादमण्डने
“जैनमुक्ताः समस्ताश्च याम्योत्तरक्रमैः स्थिताः ।
वामदक्षिणयोगेन कर्त्तव्यं सर्वकामदम् ॥” अ० सूत्र १०८
जिनदेव के प्रासाद दक्षिण और उत्तर दिशा के द्वार वाले भी बनाये जाते हैं। उनकी
नाली वाम दक्षिण योग से अर्थात् दक्षिण दिशा के सामने द्वार वाले अर्थात् दक्षिणाभिमुख
प्रासाद को नालो बायीं ओर तथा उत्तर दिशा के सामने द्वार वाले ( उत्तराभिमुख ) प्रासाद की
नाली दाहिनी ओर बनावे, अर्थात् उत्तर या दक्षिण दिशा के द्वार वाले प्रासाद की नाली
पूर्व दिशा में रक्खे । यह सब इच्छापूर्ण करने वाली है ।
वास्तुमंजरी से भी कहा है कि—
“पूर्वापरास्यप्रासादे नाल सौम्ये प्रकारयेत् ।
तत्पूर्वे याम्यसौम्यास्ये मण्डपे वामदक्षिणो ॥”
पूर्व और पश्चिमाभिमुख प्रासाद की नाली उत्तर दिशा मे, उत्तर और दक्षिणाभिमुख
प्रासाद की नाली पूर्व दिशा मे रक्खे । मंडप मे स्थापित किये देवों की नाली बायी ओर
दाहिनी ओर रखनी चाहिये ।
मण्डपस्थित देवों की नाली—
मण्डपे ये स्थिता देवा-स्तेषां वामे च दक्षिणे ।
प्रणालं कारयेद् धीमान् जगत्त्यां च चतुर्दिशम् ॥३६॥
मंडप मे जो देव स्थापित हों, उनके स्नान जल निकलने की नाली बायी और दाहिनी
ओर रखना चाहिये, अर्थात् मूलनायक के बायी ओर बेठे हुए देवों की नाली बायीं ओर तथा
दाहिनी ओर बैठे हुए देवो की नाली दाहिनी ओर बनावे । जगती के चारों दिशा मे नाली
बनावे ॥३६॥
“वामे वाम प्रकुर्वीत दक्षिणे दक्षिणां शुभम् ।
मण्डपादिषु प्रतिमा येषु युक्त्या विधीयते ॥” अप० सू० १०८
मडप मे जो देव बैठे हो, उनमे मूलनायक के बायी ओर के देवों की नाली बायी ओर
तथा दाहिनी ओर के देवों की नाली दाहिनी ओर बनाना शुभ है ।
पूर्व और पश्चिमाभिमुखदेव—
पूर्वापरास्यदेवानां कुर्यान्नो दक्षिणोत्तरम् ।
ब्रह्मविष्णुशिवाक्रेन्द्र-गुहाः पूर्वापराङ्मुखाः ॥३७॥

द्वितीयोऽध्याय ३७
पूर्व और पश्चिम दिशाभिमुख वाले देवों का मुख दक्षिण और उत्तर दिशा में नहीं
रखना चाहिये। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, इन्द्र और कार्त्तिकेय, ये देव पूर्व और पश्चिम मुख
वाले हैं। इसलिये इनका मुख पूर्व अथवा पश्चिम दिशा मे रहे, इस प्रकार की स्थापना करनी
चाहिये ॥३७॥
नगराभिमुखाः श्रेष्ठा मध्ये बाह्ये च देवताः ।
गणेशो धनदो लक्ष्मीः पुरद्वारे सुखावहाः ॥३८॥
नगर के मध्य और बाहर स्थापित किये हुए देवों का मुख नगर के सम्मुख रखना
श्रेष्ठ है। गणेश, कुबेर और लक्ष्मीदेवी, उन्हे नगर के दरवाजो पर स्थापित करना
सुखदायक है ॥३८॥
दक्षिणाभिमुखदेव—
विघ्नेशो भैरवश्चण्डी नकुलीशो ग्रहास्तथा ।
मातरो धनदश्चैव शुभा दक्षिणदिङ्मुखाः ॥३६॥
गणेश, भैरव, चण्डी, नकुलीश, नवग्रह, मातृदेवता और कुबेर, इन देवों को दक्षिणा-
भिमुख स्थापित करे तो शुभफल देनेवाले है ॥३६॥
विदिशाभिमुखदेव—
नैर्ऋत्याभिमुखः कार्यो हनुमान् वानरेश्वरः ।
अन्ये विदिङ्मुखा देवा न कर्त्तव्याः कदाचन ॥४०॥
इति देवानां दृष्टिदोषदिग्विभागः ।
वानरेश्वर हनुमानजी का मुख नैर्ऋत्य दिशाभिमुख रक्खे । बाकी दूसरे किसी भी देव
का मुख विदिशा मे कभी भी नहीं रखना चाहिये ॥४०॥
सूर्य आयतन—
सूर्याद् गणेशो विष्णुश्च चण्डी शम्भुः प्रदक्षिणे ।
भानोगृहे ग्रहास्तस्य गणा द्वादश मूर्त्तयः ॥४१॥
इति सूर्यायतनम् ।
सूर्य के पंचायतन देवो मे—मध्य मे सूर्य, उसके प्रदक्षिणा क्रम से गणेश, विष्णु,
चण्डीदेवी और महादेव को स्थापित करे । तथा नवग्रह और बारह गणों की मूर्त्तियां भी
स्थापित करे ॥४१॥

३८ प्रासादमण्डने
गणेश आयतन—
गणेशस्य गृहे तद्वच्चण्डी शम्भुर्हरी रविः ।
मूर्त्तयो द्वादशान्येऽपि गणाः स्थाप्या हिताश्च ये ॥४२॥
इति गणेशायतनम् ।
गणेश के पंचायतन देवों मे—मध्य में गणेश, उसके पीछे प्रदक्षिण क्रम से चंडीदेवी,
महादेव, विष्णु और सूर्य की स्थापना करे । तथा बारह गणों की मूर्त्तियां भी स्थापित करना
हित कारक है ॥४२॥
विष्णु आयतन—
विष्णोः प्रदक्षिणेनैव गणेशार्काम्बिकाशिवाः ।
गोप्यस्तस्यावतारस्य मूर्त्तयो द्वारिकां तथा ॥४३॥
इति विष्ण्वायतनम् ।
विष्णु के पंचायतन देवों मे—मध्य मे विष्णु को स्थापित करके उसके प्रदक्षिण क्रमसे
गणेश, सूर्य, अम्बिका और शिव को स्थापित करे । तथा गोपियों की और अवतारों की मूर्त्तियां
तथा द्वारिका नगरी को स्थापित करे ॥४३॥
चण्डी आयतन—
चण्ड्याः शम्भुर्गणेशोऽर्को विष्णुः स्थाप्यः प्रदक्षिणे ।
मातरो मूर्त्तयो देव्या योगिन्यो भैरवादयः ॥४४॥
इति चण्डिकायतनम् ।
चंडी देवी के पंचायतन देवो में—मध्य मे चंडी देवी की स्थापना करके, उसके प्रदक्षिण
क्रम से महादेव, गणेश, सूर्य और विष्णु को स्थापित करें । तथा मातृदेवी, चौसठ योगिनी
आदि देवियो की और भैरव आदि देवो की भी मूर्त्तियां स्थापित करें ॥४४॥
शिव पञ्चायतन—
शम्भोः सूर्यो गणेशश्च चण्डी विष्णुः प्रदक्षिणे ।
स्थाप्याः सर्वे शिवस्थाने दृष्टिवेधविवर्जिताः ॥४५॥
इति शिवायतनम् ।
शिव के पञ्चायतन देवों में-मध्य मे शिव को स्थापित करके, उसके प्रदक्षिण क्रम से
सूर्य, गणेश, चण्डी और विष्णु को स्थापित करें । परंतु उनका दृष्टिवेध अवश्य छोड़ देवें ॥४५॥

२. अध्याय ४-६: मण्डप, स्तम्भ, गर्भगृह एवं द्वार-प्रमाण

द्वितीयोऽध्याय
त्रिदेव स्थापना क्रम—
रुद्रस्त्रिपुरुषे मध्ये रुद्राद्वामगतो हरिः ।
दक्षिणाङ्गे भवेद् ब्रह्मा विपर्यासे भयावहः ॥४६॥
त्रिपुरुष प्रासाद मे महादेव को मध्य मे स्थापित करें। उसकी बायीं ओर विष्णु और
दाहिनी ओर ब्रह्मा को स्थापित करें। इसमे विपरीत स्थापन करेंगे तो भयकारक होगे ॥४६॥
त्रिदेवों का न्यूनाधिक मान—
रुद्रवक्त्रत्रिभागोनो हरिरर्द्धे पितामहः ।
तत्तुल्या पार्वतीदेवी सुखदा सर्वकामदा ॥४७॥
इति त्रिपुरुषन्यासः ।
इति श्री सूत्रधार मण्डनविरचिते वास्तुशास्त्रे प्रासादमण्डने जगती-
दृष्टिदोपायतनाधिकारे द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥
शिवमुख का एक तृतीयांश भाग कम करके दो तृतीयांश भाग तक विष्णु की
ऊंचाई रक्खे । और विष्णु के मुखाद्धं भाग तक ब्रह्मा की ऊंचाई रक्खें । ब्रह्मा की ऊंचाई
के बराबर पार्वती देवी की ऊंचाई रक्खे । यह नियम सुखदायक और सब इच्छितफल
देनेवाला है ॥४७॥
अपराजित पृच्छा में भी कहा है कि—
“ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्र-स्त्वेकस्मिन् वा पृथग्गृहे ।
भूयो न्यूनन्यूनतश्च रुद्रो हरिः पितामहः ॥
अंशोनश्च हराद्विष्णु-र्विष्णोरर्धं पितामहः ।
वामदक्षिणयोगेन मध्ये रुद्रं च स्थापयेत् ॥
संस्थाप्य च शुभं कर्त्ता नृपाद्याः सुजनाः प्रजा ।
प्रकर्त्तव्यं त्यज विप्राद्याः समे यान्ति समन्वितम् ?॥
ताभ्यां ह्रस्वो यदा रुद्रः क्षयो राज्ञि जने मृतिः ।
राष्ट्रक्षोभो नृपयुद्धं ब्रह्मविष्णू समौ यदा ॥
अनावृष्टिर्जने मारि-र्ब्रह्मह्रस्वे जनार्दने ।
विपर्यये नृपाद्याश्च अस्वस्था भ्रमति प्रजा ॥” सूत्र १३६

४० प्रासादमण्डने
त्रिपुरुष प्रासाद में ब्रह्मा विष्णु और महादेव ये तीनों देव एक ही गर्भगृह में या अलग २
गर्भगृह में स्थापित करना हो तो महादेव से न्यून विष्णु और विष्णु से न्यून ब्रह्मा की ऊंचाई
रखनी चाहिये । महादेव से एक भाग न्यून विष्णु और विष्णु से आधा भाग न्यून ब्रह्मा की
ऊंचाई रखनी चाहिये । मध्य मे महादेव, उसकी बायी ओर विष्णु और दाहिनी ओर ब्रह्मा
को स्थापित करने से राजा और प्रजा का कल्याण होता है । विष्णु और ब्रह्मा की ऊंचाई से
महादेव की ऊंचाई कम हो तो राजाओं का विनाश और मनुष्यों का मरण होता है। ब्रह्मा
और विष्णु की ऊंचाई बराबर हो तो देश में उत्पात और राजाओं का युद्ध होता है।
ब्रह्मा की ऊंचाई से विष्णु की ऊंचाई कम हो तो अनावृष्टि और मनुष्यों में महामारी आदि
रोग की उत्पत्ति होती है। इसलिये कहे हुए मानके अनुसार ही इन्हे बनाना चाहिये, विपरीत
करने से राजा और प्रजा अस्वस्थ रहते है ।
इति श्री पं० भगवानदास जैन विरचित प्रासाद मण्डन के
दूसरे अध्याय की सुबोधिनी नाम्नी भाषा टीका समाप्त ॥२॥

अथ प्रासादमण्डने तृतीयोऽध्यायः
प्रासादधारिणी खरशिला—
अतिस्थूला¹ सुविस्तीर्णा प्रासादधारिणी शिला ।
अतीवसुदृढा कार्या इष्टिकाचूर्णवारिभिः² ॥१॥
प्रासाद को धारण करनेवाली जो आधार शिला है, यह जगती के दासा के ऊपर और
प्रथम भिट्ट के नीचे जो बनायी जाती है, उसको खरशिला कहते है। वह अतिस्थूल और अच्छी
तरह विस्तारवाली बनावे, तथा ईंट, चूना और पानी से बहुत मजबूत बनावे ॥१॥
खरशिला का मान—
"प्रासादच्छन्दमस्योर्ध्वं दृढखरशिलोत्तमा ।
एकहस्ते पादहस्तः पञ्चान्तेऽङ्गुलवृद्धितः ॥
अर्धार्द्धाङ्गुलं तदूर्ध्वे तु नवान्तं सुदृढोत्तमा ।
पादवृद्धि पुनर्द्दद्याद् हस्ते हस्ते तथा पुनः ॥
हस्तानां त्रिंशतिर्याव-दर्द्धपादा तदूर्ध्वतः ।
विशत्यङ्गूलपिण्डा च शतार्द्धे तु खरा शिला ।।” अप० सू० १२३
प्रासादतल के ऊपर बहुत मजबूत और उत्तम खरशिला बनावे । वह एक हाथ के
विस्तार वाले प्रासाद मे छः अगुल के उदयवाली बनावे । पीछे दो से पाच हाथ तक के प्रासाद
मे प्रत्येक हाथ एक २ अंगुल, छह से नव हाथ तक आधा २ अंगुल, दस से तीस हाथ तक पाव २
अंगुल और इकतीस से पचास हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद में प्रत्येक हाथ एक २ जब
बढ़ा करके बनावे । इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद के लिये लगभग बीस अंगुल के ऊंचाई
की खरशिला होनी चाहिये । क्षी०रार्णव अध्याय १०२ में कहा है कि—
“प्रथमभिट्टस्याधस्तात् पिण्डो वर्गा (कूर्म ?) शिलोत्तमा ।
तस्य पिण्डस्य चार्धेन खरशिलापिण्डमेव च ॥”
प्रथम भिट्ट के नीचे कूर्मशिला की मोटाई से अर्धमान की खरशिला की मोटाई रक्खे ।
(१) अतिस्थूलातिविस्तीर्णा । (२) 'इष्टका' ।
प्रा० ६

४२ प्रासादमण्डने
भिट्टमान—
शिलोपरि भवेद् भिट्ट-मेकहस्ते युगाङ्गुलम् ।
अर्धाङ्गुला भवेद् वृद्धि-र्यावद्धस्तशताद्धर्कम् ॥२॥
खरशिला के ऊपर भिट्ट नाम का थर बनावे । एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद को
चार अंगुल के उदय का बनावे । पीछे दोसे पचास हाथ तक के प्रासाद के लिये प्रत्येक हाथ
आधा २ अंगुल बढा करके बनावे ॥२॥
प्रकारन्तर से भिट्टमान—
अङ्गुलेनांशहीनेन अर्द्धे नार्द्धे न च क्रमात् ।
पञ्चदिग्विंशतिर्याव-च्छताद्धं च विवर्द्धयेत् ॥३॥
एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद को चार अंगुल का भिट्ट बनावे । पीछे दो से पांच हाथ
तक के प्रासाद को प्रत्येक हाथ एक २ अंगुल, छह से दस हाथ तक के प्रासाद को प्रत्येक हाथ
पौन २ अंगुल, ग्यारह से बीस हाथ तक के प्रासाद को प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल और इक्कीस से
पचास हाथ तक के प्रासाद को प्रत्येक हाथ पाव २ अंगुल बढा करके भिट्ट का उदय रक्खे ॥३॥
यही मत क्षीरार्णव, अपराजित पृच्छा वास्तुविद्या और वास्तुराज आदि शिल्पग्रन्थों में
दिया गया है ।
भिट्टका निर्गम—
एकद्वित्रीणि भिट्टानि हीनहीनानि कारयेत् ।
स्वस्वोदयप्रमाणस्य चतुर्थांशेन निर्गमः ॥४॥
इति भिट्टमानम् ।
उपरोक्त कथन के अनुसार भिट्टका जो उदयमान आया हो, उसमें एक, दो अथवा तीन
भिट्ट बना सकते है । परन्तु ये एक दूसरे से हीनमान का बनाना चाहिये । राजसिंहकृत वास्तु-
राज में कहा है कि—“युगांशह्रस्वं द्वितीयं तदर्धोच्चं तृतीयकम् ।” अर्थात् प्रथम भिट्ट से दूसरा
भिट्ट पौन भाग का, और तीसरा भिट्ट आधा उदय में रक्खें । तथा अपने २ उदय का चौथा
भाग बराबर निर्गम रक्खे ॥४॥
क्षीरार्णवमें कहा है कि—
“प्रथमं निर्गमं कार्यं चतुर्थांशे महामुने ! ।
द्वितीय तृतीयांशेन तृतीयं च तदर्घतः ॥”
प्रथम भीट का निर्गम अपने चौथे भाग, दूसरे भिट्टका निर्गम अपने तीसरे भाग और
तीसरे भिट्टका निर्गम अपने उदय से आधा रक्खे ।

तृतीयोऽध्यायः ४३
पीठ का उदय मान—
पीठमर्धं त्रिपादांशै-रेकद्वित्रिकरे गृहे ।
चतुर्हस्ते त्रिसार्धांशं पादांश पञ्चहस्तके ॥५॥
दशविंशतिषट्त्रिंश-च्छतार्थं हस्तकावधिः ।
वृद्धिर्वेदत्रियुग्मेन्दु-संख्या स्यादङ्गुलैः क्रमात् ॥६॥
पञ्चाशं हीनमाधिक्य-मेकैकं तु त्रिधा पुनः ।
भीट के ऊपर पीठ बनाया जाता है, उसका उदयमान-एक हाथ के विस्तार वाले
प्रासाद की पीठका उदय बारह अंगुल, दो हाथ के प्रासाद की पीठका उदय सोलह अंगुल,
तीन हाथ के प्रासाद की पीठ अठारह अंगुल, चार हाथ के प्रासाद की पीठ अपने साढ़े तीन
भाग (साढे सत्ताईश अंगुल) की, पांच हाथ के प्रासाद की पीठ अपने चौथे भाग (तीस अंगुल)
की उदय मे बनावे। छह से दस हाथ तक के प्रासाद की पीठ प्रत्येक हाथ चार २ अंगुल,
ग्यारह से बीस हाथ तक के प्रासाद की पीठ प्रत्येक हाथ तीन २ अंगुल, इक्कीस से छत्तीस
हाथ तक के प्रासाद की पीठ प्रत्येक हाथ दो २ अंगुल और सेतीस से पचास हाथ तक के
प्रासाद की पीठ प्रत्येक हाथ एक २ अंगुल बढ़ा करके बनावें। इस प्रकार पचास हाथ के
विस्तार वाले प्रासाद की पीठ का उदय पांच हाथ और छह अंगुल होता है।
उदय का पांचवां भाग उदय में कम करे तो कनिष्ठ मान की ओर बढा देवे जो ज्येष्ठ
मान की पीठ होती है। ज्येष्ठ मान की पीठ का पांचवां भाग ज्येष्ठ पीठ मे बटावे तो ज्येष्ठ ज्येष्ठ,
कम करे तो ज्येष्ठ कनिष्ठ, मध्यम मान के पीठ का पांचवां भाग मध्यम में बढावे तो ज्येष्ठ मध्यम
और कम करे तो कनिष्ठ मध्यम, कनिष्ठ मान की पीठ का पांचवां भाग कनिष्ठ पीठ में बढावे
तो ज्येष्ठ कनिष्ठ और कम करे तो कनिष्ठ कनिष्ठ मान की पीठ होती है। ऐसे नव प्रकार से
पीठ का उदयमान समझना चाहिये ॥६॥
वास्तुमंजरी में कहा है कि—
“प्रासादस्य समुत्सेध एकविंशतिभाजिते ।
पञ्चादिनवभागान्ते पञ्चधा पीठसमुच्छ्रयः ॥”
प्रासाद की (मंडोवरकी) ऊंचाई का इक्कीस भाग करे। इनमे से पांच, छह, सात, आठ
अथवा नव भाग के मान का पीठ का उदय रखें। ये पांच प्रकार के पीठ के उदय है।
यह मत अपराजित पृच्छा सूत्र १२३ श्लोक ७ में भी लीखा है। तथा श्लोक २५ से २६
तक जो पीठ का मान लिखा है, उसमे चार हाथ के प्रासाद की पीठ अर्द्ध, तृतीयांश और
चतुर्थांश मान की लिखा है।

४४ प्रासादमण्डने
क्षीरार्णव मत से पीठमान—
"एकहस्ते तु प्रासादे पीठं वै द्वादशाङ्गुलम् ।
हस्तादिपञ्चपर्यन्तं हस्ते हस्ते पञ्चाङ्गुला ॥
पञ्चोर्ध्वं दशपर्यन्तं वृद्धिर्वेदाङ्गुला भवेत् ।
दशोर्ध्वं विंशयावत्तु हस्ते हस्ते त्रयाङ्गुला ॥
विंशोर्ध्वं षट्त्रिंशान्तं वृद्धिस्तु चाङ्गुलद्वया ।
षट्त्रिंशोर्ध्वं शताध्र्दान्तं हस्तहस्तैकमङ्गुल ।
पञ्चमांशे ततो हीनं कनिष्ठं शुभलक्षणम् ।
पञ्चमांशेऽधिकं चैव ज्येष्ठं त्वष्ट्रा च भाषितम् ॥" अध्याय ३
इसका अर्थ श्लोक पांच और छह के बराबर है। सिर्फ दोसे पांच हाथ तक के प्रासाद
की पीठ प्रत्येक हाथ पांच २ अंगुल बढा करके बनाना लिखा है, यही विशेष है। इस मत से
पचास हाथ के विस्तार वाले प्रासाद की पीठ का उदय पांच हाथ और आठ अंगुल का होता है !
अपराजितपृच्छा के मतसे पीठ का उदयमान—
"एकहस्ते तु प्रासादे पीठं वै द्वादशाङ्गुलम् ।
द्व्यष्टाङ्गुलं द्विहस्ते च त्रिहस्तेऽष्टादशाङ्गुलम् ॥
अर्द्धं पादं त्रिभागं वा त्रिविधं परिकल्पयेत् ।
त्र्यंशेनार्धेन पादेन चतुर्हस्ते सुरालये ॥
पादं पीठोच्छ्रयं कार्यं प्रासादे पञ्चहस्तके ।
पञ्चोर्ध्वं दशपर्यन्तं रसाशं हस्तवृद्धये ॥
ततो हस्ते चाष्टमांशो वृद्धिः स्याद् द्वाविंशावधि ।
षट्त्रिंशदन्तं वृद्धिस्तु हस्ते वै द्वादशांशिका ॥
चतुर्विंशत्यंशिका तदूर्ध्वं यावच्छतार्धकम् ।
मध्ये न्यूनेऽधिके पञ्चमाशे ज्येष्ठं कनिष्ठकम् ॥
त्रिज्येष्ठमिति च ख्यातं त्रिमध्यं त्रिकनिष्ठकम् ।
तस्याभिधानं वक्ष्येऽह-मुदितं नवधोच्छ्रयात् ॥" सूत्र० १२३
एक हाथ के प्रासाद को बारह अंगुल, दो हाथ के प्रासाद को सोलह अंगुल, तीन हाथ
के प्रासाद को अठारह अंगुल पीठ का उदय रक्खे। अर्थात् एक हाथ के अर्द्ध भाग, दो हाथ के
तीसरे भाग और चार हाथ के चौथे भाग पीठ का उदय रक्खे। चार हाथ के प्रासाद को
अर्द्ध भाग (४८ अंगुल), तीसरे भाग (३२ अंगुल) अथवा चौथे भाग (२४ अंगुल) पीठ का
उदय रखना चाहिये। पांच हाथ के प्रासाद को चौथे भाग (३० अंगुल), छह से दस हाथ के
प्रासाद को प्रत्येक हाथ चार २ अंगुल, ग्यारह से बाईस हाथ के प्रासाद को तीन २ अंगुल,
तेईस से छत्तीस हाथ के प्रासाद को दो दो अंगुल और सेंतीस से पचास हाथ के प्रासाद को

तृतीयोऽध्याय ४५
प्रत्येक हाथ एक २ अंगुल बढ़ा करके पीठ का उदय रखना चाहिये। यह पीठ की ऊंचाई का
मध्यम मान माना गया है। इसमें इसका पांचवां भाग बढ़ावे तो ज्येष्ठमान और घटावे तो
कनिष्ठ मान होता है। ज्येष्ठ मान का पांचवां भाग ज्येष्ठ मे बढ़ावे तो ज्येष्ठ ज्येष्ठ, घटावे तो
ज्येष्ठ कनिष्ठ, मध्यम का पाचवा भाग मध्यम मे बढ़ावे तो ज्येष्ठ मध्यम घटावे तो कनिष्ठ मध्यम,
कनिष्ठ मान का पाचवा भाग कनिष्ठ मे बढावे तो ज्येष्ठ कनिष्ठ और घटावे तो कनिष्ठ कनिष्ठ,
इस प्रकार पीठ के उदय का नव भेद होते है। इन नव भेदो के नाम बतलाते है—
"शुभद सर्वतोभद्रं पद्मकं च वसुन्धरम् ।
सिंहपीठं तथा व्योम गरुडं हंसमेव च ॥
वृषभं यद्भवेत् पीठं मेरोराधारकारणम् ।
पीठमानमिति ख्यातं प्रासादे आदिसोमया ॥” सूत्र० १२३
शुभद, सर्वतोभद्र, पद्मक, वसुन्धर, सिंहपीठ, व्योम, गरुड, हंस और वृषभ ये नव नाम
पीठोदय के है। इनमे वृषभपीठ मेरुप्रासाद का आधार रूप है ।
दि० वसुनंदीकृत प्रतिष्ठासार मे पीठ का मान—
“प्रासादविस्तराद्धेन स्वोच्छ्रितं पीठमुत्तमम् ।
मध्यमं पादहीनं स्याद् उत्तमाद्धेन कन्यसम् ॥”
प्रासाद के विस्तार के अर्द्ध मान का पीठ का
उदय रक्खे । इसे उत्तम मान की पीठ माना है। इस
उत्तम मान की पीठ के उदय का चार भाग करके
उनमे से तीन भाग के मान का पीठ का उदय रक्खे
तो मध्यम मान की और दो भाग के मान का पीठ का
उदय रक्खे तो कनिष्ठ मान की पीठ माना है।
पीठोदय का थरमान—
त्रिपञ्चाशत् समुत्सेधे द्वाविंशत्यंशनिर्गमे ॥७॥
नवांशो जाडद्यकुम्भश्च सप्तांशा १कर्णिका २भवेत् ।
सान्तरालं कपोतालिः सप्तांशा ग्रासपट्टिका ॥८॥
सूर्यदिग्वसुभागैश्च गजवाजिनराः क्रमात् ।
वाजिस्थानेऽथवा कार्यं स्वस्वदेवस्य वाहनम् ॥६॥
पीठ का जो उदयमान आया हो, उसमें ५३
भाग करे। उनमे से बाईस भाग के मान का पीठ प्रासाद की महापीठ
(१) सप्तांश । (२) कणिकं ।

४६ प्रासादमण्डने

का निर्गम रक्खे। उदय के तरेपन भाग में से नव भाग का जाड्यकुम्भ, सात भाग की
अन्तरपत्र के साथ कर्णिका, सात भाग की कपोतालि के साथ ग्रासपट्टी, इसके ऊपर बारह
भाग का गजथर, दश भाग का अश्वथर, और आठ भाग का नरथर बनावे। अश्वथर के स्थान
पर देव के वाहन का भी थर बना सकते है ॥७ से ६॥
थरों का निर्गममान—
पञ्चांशा कर्णिकाग्रे तु निर्गमो जाड्यकुम्भकः ।
त्रिसाद्धा कर्णिका सार्धा चतुर्भिर्ग्रासपट्टिका ॥१०॥
कुञ्जराश्वनरा वेदा रामयुग्मांशनिर्गमाः ।
अन्तशालमधस्तेषा-मूर्ध्वाधः कर्णयुग्मकम् ॥११॥
कर्णिकासे आगे पांच भाग निकलता जाड्यकुम्भ, ग्रासपट्टी से आगे साढे तीन भाग
निकलती कर्णिका, गजथर से आगे साढे चार भाग निकलती ग्रासपट्टी, अश्वथरसे आगे चार
भाग निकलता गजथर, नर थरसे आगे तीन भाग निकलता अश्वथर और खुरासे आगे दो भाग
निकलता नर थर रखे। इस प्रकार बाईस भाग पीठ का निर्गम जाने। इन गजादि थरों के
नीचे अंतराल रक्खे और अंतराल के ऊपर और नीचे दो दो कर्णिका बनावें ॥१०-११॥
कामदपीठ और कणपीठ (साधारणपीठ)—
गजपीठं विना स्वल्प-द्रव्ये पुण्यं महत्तरम् ।
जाड्यकुम्भश्च कर्णाली ग्रासपट्टी तदा भवेत् ॥१२॥
कामदं कणपीठं च जाड्यकुम्भश्च कर्णिका ।
लतिने निर्गमं हीनं सान्धारे निर्गमाधिकम् ॥१३॥
गज आदि थरो वाली पीठ को गजपीठ कहते है। ऐसी रूपवाली पीठ बनाने में द्रव्य
का अधिक खर्च होता है, इसलिये अपनी शक्ति के अनुसार अल्प द्रव्य से साधारण पीठ बनाने
से भी बड़ा पुण्य होता है। गज अश्व आदि रूपोंवाली पीठ को छोड़कर जाड्यकुम्भ, कर्णिका
और केवाल के साथ ग्रासपट्टी वाली साधारण पीठ बनावे, उसको कामदपीठ कहते है। तथा
जाड्यकुम्भ और कर्णिका ये दो थरवाली पीठ बनावे, उसको कणपीठ कहते है। लतिनजाति के
प्रासाद के पीठ का निर्गम कम होता है और सांधार जातिके प्रासाद के पीठ का निर्गम अधिक
होता है ॥१२-१३॥
सर्वेषां पीठमाधारः पीठहीनं निराश्रयम् ।
पीठहीनं त्रिनाशाय प्रासादभुवनादिकम् ॥१४॥
इति पीठम् ।

तृतीयोऽध्याय ४७
कामद पीठ करणपीठ
प्रासाद और भवन ( गृह ) आदि सब मे पीठका आधार हैं, यदि पीठ न होवे तो ये
निराधार माने जाते है। इसलिये विना पीठ वाले ये प्रासाद और गृह आदि थोडे समय मे ही
नष्ट हो जाते है ॥१४॥
प्रासाद का उदयमान ( मंडोवर )—
हस्तादिपञ्चपर्यन्तं विस्तारेणोदयः समः ।
स क्रमान्नवसप्तेषु-रामचन्द्राङ्गुलाधिकः ॥१५॥
पञ्चादिदशपर्यन्तं त्रिंशाद्यावच्छताद्र्धकम् ।
हस्ते हस्ते क्रमाद् वृद्धिर्मनुसूर्य्यनवाङ्गुला ॥१६॥
एक से पांच हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद का उदय विस्तार के बराबर मान का
बनावें, परन्तु उनमे क्रमश: नव, सात, पाच, तीन और एक अंगुल बढ़ा करके बनावे । अर्थात्
प्रासाद का विस्तार एक हाथ का हो तो उसका उदय एक हाथ और नव अंगुल ( कुल
३३ अंगुल ), दो हाथ का हो तो दो हाथ और सात अगुल ( कुल ५५ अंगुल ), तीन हाथ का
हो तो तीन हाथ और पांच अंगुल ( कुल ७७ अंगुल ), चार हाथ का हो तो चार हाथ और
तीन अगुल ( कुल ९९ अंगुल ) और पाच हाथ का हो तो पाच हाथ और एक अंगुल ( कुल
१२१ अंगुल ) का उदय रक्खे । छह से दस हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद का उदय प्रत्येक
हाथ चौदह २ अंगुल, ग्यारह से तीस हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद का उदय प्रत्येक हाथ