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सर्वकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 278 में से

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पृष्ठ 74

द्वितीयोऽध्याय ३७
पूर्व और पश्चिम दिशाभिमुख वाले देवों का मुख दक्षिण और उत्तर दिशा में नहीं
रखना चाहिये। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, इन्द्र और कार्त्तिकेय, ये देव पूर्व और पश्चिम मुख
वाले हैं। इसलिये इनका मुख पूर्व अथवा पश्चिम दिशा मे रहे, इस प्रकार की स्थापना करनी
चाहिये ॥३७॥
नगराभिमुखाः श्रेष्ठा मध्ये बाह्ये च देवताः ।
गणेशो धनदो लक्ष्मीः पुरद्वारे सुखावहाः ॥३८॥
नगर के मध्य और बाहर स्थापित किये हुए देवों का मुख नगर के सम्मुख रखना
श्रेष्ठ है। गणेश, कुबेर और लक्ष्मीदेवी, उन्हे नगर के दरवाजो पर स्थापित करना
सुखदायक है ॥३८॥
दक्षिणाभिमुखदेव—
विघ्नेशो भैरवश्चण्डी नकुलीशो ग्रहास्तथा ।
मातरो धनदश्चैव शुभा दक्षिणदिङ्मुखाः ॥३६॥
गणेश, भैरव, चण्डी, नकुलीश, नवग्रह, मातृदेवता और कुबेर, इन देवों को दक्षिणा-
भिमुख स्थापित करे तो शुभफल देनेवाले है ॥३६॥
विदिशाभिमुखदेव—
नैर्ऋत्याभिमुखः कार्यो हनुमान् वानरेश्वरः ।
अन्ये विदिङ्मुखा देवा न कर्त्तव्याः कदाचन ॥४०॥
इति देवानां दृष्टिदोषदिग्विभागः ।
वानरेश्वर हनुमानजी का मुख नैर्ऋत्य दिशाभिमुख रक्खे । बाकी दूसरे किसी भी देव
का मुख विदिशा मे कभी भी नहीं रखना चाहिये ॥४०॥
सूर्य आयतन—
सूर्याद् गणेशो विष्णुश्च चण्डी शम्भुः प्रदक्षिणे ।
भानोगृहे ग्रहास्तस्य गणा द्वादश मूर्त्तयः ॥४१॥
इति सूर्यायतनम् ।
सूर्य के पंचायतन देवो मे—मध्य मे सूर्य, उसके प्रदक्षिणा क्रम से गणेश, विष्णु,
चण्डीदेवी और महादेव को स्थापित करे । तथा नवग्रह और बारह गणों की मूर्त्तियां भी
स्थापित करे ॥४१॥