प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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किया। इस कार्य मे उसके दो अन्य पुत्र पामा और बलराज भी उसके सहायक थे। राणा कुम्भा के अन्य
प्रसिद्ध राजकीय स्थपति सूत्रधार मण्डन हुए। वे संस्कृत भाषा के भी अच्छे विद्वान् थे। उन्होंने निम्न लिखित
शिल्प ग्रन्थो की सस्कृत मे रचना की—
प्रासाद मण्डन, वास्तु मण्डन, रूप मण्डन, राज-वल्लभ मण्डन, देवता मूर्ति प्रकरण, रूपावतार,
वास्तुसार, वास्तु-शास्त्र। राजवल्लभ ग्रन्थ मे उन्होंने अपने संरक्षक सम्राट् राणा कुम्भा का इस प्रकार
गौरव के साथ उल्लेख किया है—
"श्रीमेदपाटे नृपकुम्भकर्ण—स्तदंघ्रिराजीवपरागसेवी ।
समण्डनाख्यो भुवि सूत्रधारस्तेनोद्ध तो भूपतिवल्लभोऽयम् ।”
(१४—४३)
रूपमण्डन ग्रन्थ मे सूत्रधार मण्डन ने अपने विषय मे लिखा है—
“श्रीमद्दे शे मेदपाटाभिधाने क्षेत्राख्योऽभूत् सूत्रधारो वरिष्ठ ।
पुत्रो ज्येष्ठो मण्डनस्तस्य तेन प्रोक्तं शास्त्रं मण्डन रूपपूर्वम् ।”
(६—४०)
इससे ज्ञान होता है कि मण्डन के पिता का नाम सूत्रधार क्षेत्र था। इन्हे ही अन्य लेखों मे क्षेत्राक
भी कहा गया है। क्षेत्राक का एक दूसरा पुत्र सूत्रधार नाथ भी था जिसने 'वास्तु मंजरी' नामक ग्रन्थ की
रचना की। सूत्रधार मण्डन का ज्येष्ठ पुत्र सूत्रधार गोविन्द और छोटा पुत्र सूत्रधार ईश्वर था। सूत्रधार
गोविन्द ने तीन ग्रन्थो की रचना की—उद्धार धोरणि, कलानिधि और द्वारदीपिका। कलानिधि ग्रन्थ मे
उसने अपने विषय मे और अपने संरक्षक राणा श्री राजमल्ल (रायमल्ल) के विषय मे लिखा है—
“सूत्रधारः सदाचारः कलाधारः कलानिधिः ।
दण्डाधार. सुरागार. श्रिये गोविन्दयादिशत् ॥
राज्ञा श्री राजमल्ले (न) प्रीतस्यामि (ति) मनोहरे ।
प्रणम्यमाने प्रासादे गोविन्द. संव्यधादिदम् ।”
(विक्र, सं. १५५४)
राणा कुंभा की पुत्री रमा बाई का एक लेख (विक्रम सं. १५५४) जावर से प्राप्त हुआ है जिसमे
क्षेत्राक के पौत्र और सूत्रधार मण्डन के पुत्र ईश्वर ने 'कमठाणा बनाने का उल्लेख है—
"श्रीमेदपाटे वरे देणे कुम्भकर्णनृपगृहे क्षेत्राकसूत्रधारस्य पुत्रो मण्डन आत्मवान् सूत्रधारमण्डन
सुत ईशरए कमठाणु विरचितं ।”
ईश्वर ने जावर मे विष्णु के मन्दिर का निर्माण किया था। इसी ईश्वर का पुत्र सूत्रधार छीतर था
जिनका उल्लेख विक्रम सं. १५५६ (१४६६ ई.) के चित्तौड़ से प्राप्त एक लेख मे आयो है। यह राणा राय-
१—गृह और देवालय आदि इमारती काम को अभी भी राजस्थानीय शिल्पी 'कमठाणा' बोलते है।
१. अध्याय १-३: भूमि-परीक्षा, शिलान्यास, जगती एवं पीठ-लक्षण
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मल्ल के समय मे उनका राजकीय स्थपति था । इससे विदित होता है कि राणा कुंभा के बाद भी सूत्रधार
मण्डन के वशज राजकीय शिल्पियो के रूप मे कार्य करते रहे । उन्होने ही उदयपुर के प्रसिद्ध जगदीश मदिर
और उदयपुर से चालीस मील दूर काकरौली मे बने हुए राज समुद्र सागर का निर्माण किया ।
राणा कुंभा के राज्य काल मे राणकपुर मे सूत्रधार देपाक ने विक्रम स. १४६६ (१४३६ ई. ) मे
सुप्रसिद्ध जैन मन्दिर का निर्माण किया । कुंभा की पुत्री रमा बाई ने कुंभलगढ मे दामोदर मंदिर के निर्माण
के लिए सूत्रधार रामा को नियुक्त किया । सूत्रधार मण्डन को राणा कुंभा का पूरा विश्वास प्राप्त था । उन्होने
कुंभलगढ के प्रसिद्ध दुर्ग की वास्तु-कल्पना और निर्माण का कार्य सूत्रधार मण्डन को सं १५१५ (१४५८ई )
मे सौंपा । यह प्रसिद्ध दुर्ग आज भी अधिकाश मे सुरक्षित है और मण्डन की प्रतिभा का साक्षी है । उदयपुर से
१४ मील दूर एकलिंग जी नामक भगवान् शिव का सुप्रसिद्ध मन्दिर है । उसी के समीप एक अन्य विष्णु मन्दिर
भी है । श्री रत्नचन्द अग्रवाल का अनुमान है कि उसका निर्माण भी सूत्रधार मण्डन ने ही किया
था । उस मदिर की भित्तियो के बाहर की ओर तीन रथिकाए हैं । उनमे नृसिंह वराह-विष्णुमुखी तीन मूर्तिया
स्थापित हैं । उनकी रचना रूप मण्डन ग्रथ मे वर्णित लक्षणो के अनुसार ही की गई है । एक अष्टभुजी मूर्ति
भगवान् वैकुण्ठ की है । दूसरी द्वादशभुजी मूर्ति भगवान् अनन्त की है और तीसरी सोलह हाथों वाली मूर्ति
त्रैलोक्य मोहन की है इनके लक्षण सूत्रधार मण्डन ने अपने रूपमण्डन ग्रथ के तीसरे अध्याय मे (श्लोक
५२-६२ दिये है ।१
इनके अतिरिक्त सूत्रधार मण्डन ने और भी कितनी ही ब्राह्मण धर्म सबधी देव मूर्तिया बनाई थी ।
उपलब्ध मूर्तियो की चौकियो पर लेख उत्कीर्ण हैं । जिनमे मूर्ति का नाम राणा कुंभा का नाम और स
१५१५-१५१६ की निर्माण तिथि का उल्लेख है । ये मूर्तिया लगभग कुंभलगढ दुर्ग के साथ ही बनाई गई
थी । तब तक दुर्ग मे किसी मंदिर का निर्माण नही हुआ था, अतएव वे एक वट वृक्ष के नीचे
स्थापित कर दी गई थी । इस प्रकार की छ. मातृका मूर्तिया उदयपुर के सग्रहालय मे विद्यमान है
जिन पर इस प्रकार लेख हैं—
"स्वस्ति श्री स० १५१५ वर्षे तथा शाके १३८० प्रवर्त्तमाने फाल्गुन शुदि १२ बुधे पुष्य नक्षत्रे
श्री कुंभल मेरु महादुर्गे महाराजाधिराज श्री कुंभकर्ण पृथ्वी पुरन्दरेण श्री ब्रह्माणी मूर्ति अस्मिन् वटे
स्थापिता । शुभ भवत ॥ श्री ॥"
इसी प्रकार के लेख माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही और ऐन्द्री मूर्तियो की चरण चौकियो
पर भी है । इसी प्रकार चतुविंशति वर्ग की विष्णु मूर्तियो का भी रूप मण्डन मे (अध्याय ३, श्लोक १०-२२)
विशद वर्णन आया है। उनमे से १२ मूर्तिया कुंभलगढ से प्राप्त हो चुकी है जो इस समय उदयपुर के सग्रहालय
मे सुरक्षित है । ये मूर्तिया भगवान विष्णु के सकर्षण, माधव, मधुसूदन, अधोक्षज, प्रद्युम्न, केशव, पुरुषोत्तम,
अनिरुद्ध, वासुदेव, दामोदर जनार्दन और गोविन्द रूप की हैं । इनकी चौकियो पर इस प्रकार लेख हैं—
“सं० १५१६ वर्षे शाके १३८२ वर्त्तमाने आश्विन शुद्ध ३ श्री कुंभमेरी महाराज श्री कुंभकर्णि
वटे संकर्षण मूर्ति संस्थापिता शुभ भवतु ॥२”
१-दे० रत्नचन्द्र अग्रवाल, राजस्थान की प्राचीन मूर्तिकला मे महाविष्णु सबंधी कुछ पत्रिकाएं,
शोधपत्रिका, उदयपुर, भाग ६, अक १ (पौष, वि० सं० २०१४) पृ० ६, १४, १७ ।
२- रत्नचन्द्र अग्रवाल रूप मण्डन तथा कुंभलगढ से प्राप्त महत्वपूर्ण प्रस्तर प्रतिमाए, शोध
पत्रिका. भाग ८ अक ३ (चैत्र, वि० स० २०१४), पृ० १-१२
( १८६ ) अथर्ववेदभाष्ये
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इन सब मूर्तियों की रचना रूप मण्डन ग्रन्थ में वर्णित लक्षणों के अनुसार यथार्थतः हुई है। स्पष्ट है
कि सूत्रधार मण्डन शास्त्र और प्रयोग दोनों के निपुण अभ्यासी थे। शिल्प शास्त्र में वे जिन लक्षणों का
उल्लेख करते थे उन्हीं के अनुसार स्वयं या अपने शिष्यों द्वारा देव मूर्तियों की रचना भी कराते जाते थे।
किसी समय अपने देश में सूत्रधार मण्डन जैसे सहस्रों की संख्या में लब्ध कीर्ति स्थपति और
वास्तु विद्याचार्य हुए। एलोरा के कैलाश मन्दिर, खजुराहो के कंदरिया महादेव, भुवनेश्वर के लिङ्गराज,
तंजोर के बृहदीश्वर, कोणार्क के सूर्यदेउल आदि एक से एक भव्य देव प्रासादों के निर्माण का श्रेय जिन
शिल्पाचार्यों की कल्पना में स्फूरित हुआ और जिन्होंने अपने कार्य कौशल से उन्हें मूर्त रूप दिया वे सचमुच
धन्य थे और उन्होंने ही भारतीय संस्कृति के मार्ग-दर्शन का शाश्वत कार्य किया।
उन्हीं की परम्परा में सूत्रधार मण्डन भी थे। देव-प्रासाद एवं नृप मन्दिर आदि के निर्माण कर्त्ता
सूत्रधारों का कितना अधिक सम्मानित स्थान था यह मण्डन के निम्न लिखित श्लोक से ज्ञात होता है—
"इत्यनन्तरतः कुर्यात् सूत्रधारस्य पूजनम् ।
भूवित्तवस्त्रालङ्कारै-र्गोमहिष्यश्ववाहनैः ॥
अन्येषां शिल्पिनां पूजा कर्त्तव्या कर्मकारिणाम् ।
स्वाधिकारानुसारेण वस्त्रताम्बूलभोजनैः ।।
काष्ठपाषाणनिर्माण-कारिणो यत्र मन्दिरे ।
भुञ्जतेऽसौ तत्र सौख्यं शङ्करस्त्रिदशैः सह ।।
पुण्यं प्रासादजं स्वामी प्रार्थयेत्सूत्रधारतः ।
सूत्रधारो वदेन् स्वामिन्नक्षयं भवतान्नघ ।।"
प्रासादमण्डनः ८. ८२-८५
अर्थात् निर्माण की समाप्ति के अनन्तर सूत्रधार का पूजन करना चाहिये और अपनी शक्ति के अनु-
सार भूमि, सुवर्ण, वस्त्र, अलङ्कार के द्वारा प्रधान सूत्रधार एवं उनके सहयोगी अन्य शिल्पियों का सम्मान
करना आवश्यक है।
जिस मन्दिर में शिला या काष्ठ द्वारा निर्माण कार्य करने वाले शिल्पी भोजन करते हैं वहीं
भगवान् शंकर देवों के साथ विराजते हैं। प्रासाद या देव मन्दिर के निर्माण मे जो पुण्य है उस पुण्य की
प्राप्ति के लिये सूत्रधार से प्रार्थना करनी चाहिए, 'हे सूत्रधार, तुम्हारी कृपा से प्रासाद निर्माण का पुण्य
मुझे प्राप्त हो।' इसके उत्तर में सूत्रधार कहे—हे स्वामिन् ! सब प्रकार आप की अक्षय वृद्धि हो।
सूत्रधार के प्रति सम्मान प्रदर्शन की यह प्रथा लोक में आजतक जीवित है, जब सूत्रधार शिल्पी
नूतन गृह का द्वार रोककर स्वामी से कहता है 'आजतक यह गृह मेरा था, अब आज से यह तुम्हारा हुआ।'
उसके अनन्तर गृह स्वामी सूत्रधार को इष्ट-वस्तु देकर प्रसन्न करता है और फिर गृह में प्रवेश करता है।
सूत्रधार मण्डन का प्रासाद-मण्डन ग्रन्थ भारतीय शिल्प ग्रन्थों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।
मण्डन ने आठ अध्यायों में देव-प्रासादों के निर्माण का स्पष्ट और विस्तृत वर्णन किया है। पहले अध्याय
में विश्वकर्मा को सृष्टि का प्रथम सूत्रधार कहा गया है। गृहों के विन्यास और प्रवेश की जो धार्मिक विधि,
हे, उन सब का पालन देवायतनो मे भी करना उचित है। चतुर्दश श्लोको मे जिन जिन प्रासादो के आकार देवो
ने शकर की पूजा के लिए बनाये उन्ही की अनुकृति पर १४ प्रकार के प्रासाद प्रचलित हुए। उनमे देश-भेद
से ८ प्रकार के प्रासाद उत्तम जाति के माने जाते हैं—
नागर, द्राविड, भूमिज, लतिन, सावन्धार (सान्धार), विमान-नागर, पुष्पक और मिश्र।
लतिन सम्भवत उस प्रकार के शिखर को कहते थे जिसके उर.शृं ग मे लता की आकृति का उठता हुआ रूप
बनाया जाता था। शिखरो के ये भेद विशेषकर शृंग और तिलक नामक अलकरणो के विभेद के कारण होते हैं।
प्रासाद के लिए भूमि का निरूपण आवश्यक है । जो भूमि चुनी जाय उसमे ६४ या सौ पद का
घर बनाने चाहिए । प्रत्येक घर का एक-एक देव होता है जिसके नाम से वह पद पुकारा जाता है । मदिर
के निर्माण मे नक्षत्रो के शुभाशुभ का भी विचार किया जाता है। यहा तक कि निर्माण कर्ता के अतिरिक्त
स्थापक अर्थात् स्थपति और जिस देवता का मन्दिर हो उनके भी नवाङ्ग नाडी वेध का मिलान आवश्यक
माना गया है। काष्ठ, मिट्टी, ईंट, शिला, धातु और रत्न इन उपकरणो से मदिर बनाए जाते हैं इनमे
उत्तरोत्तर का अधिक पुण्य है। पत्थर के प्रासाद का फल अनन्त कहा गया है। भारतीय देव प्रासाद अत्यन्त
पवित्र कल्पना है। विश्व को जन्म देने वाले देवाधिदेव भगवान का निवास देवगृह या मदिर मे माना जाता
है। जिसे वेदो मे हिरण्यगर्भ कहा गया है। वही देव मंदिर का गर्भगृह है। सृष्टि का मूल जो प्राण तत्व है
उसे ही हिरण्य कहते हैं। प्रत्येक देव प्राणतत्व है' वही हिरण्य है, “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" के
अनुसार एक ही देव अनेक देवो के रूप मे अभिव्यक्त होता है। प्रत्येक देव हिरण्य की एक-एक कला है अर्थात्
मूल-भूत प्राण तत्त्व की एक-एक रश्मि है। मन्दिर का जो उत्सेध या ब्रह्म सूत्र है वही समस्त सृष्टि का
मेरु या यूप है। उसे ही वेदो मे 'बाण' कहा गया है। एक बाण वह है जो स्थूल दृश्य सृष्टि का आधार है
और जो पृथिवी से लेकर द्यु लोक तक प्रत्येक वस्तु मे ओत-प्रोत है। द्यावा पृथिवी को वैदिक परिभाषा मे
रोदसी ब्रह्माण्ड कहते हैं। इस रोदसी सृष्टि मे व्याप्त जो ब्रह्मसूत्र है वही इसका मूलाधार है। उसे ही
वैदिक भाषा मे 'श्रोपश' भी कहा जाता है। बाण, ओपश, मेरु, ब्रह्मसूत्र ये सब समानार्थक है और इस
दृश्य जगत् के उस आधार को सूचित करते हैं जिस ध्रुव विन्दु पर प्रत्येक प्राणी अपने जीवन मे जन्म से
मृत्यु तक प्रतिष्ठित रहता है। यह मनुष्य शरीर और इसके भीतर प्रतिष्ठित प्राणतत्त्व विश्वकर्मा की सबसे
रहस्यमयी कृति है। देव मन्दिर का निर्माण भी सर्वथा इसी की अनुकृति है। जो चेतना या प्राण है। वही
देव-विग्रह या देव मूर्ति है और मन्दिर उसका शरीर है प्राण प्रतिष्ठा से पाषाणघटित प्रतिमा देवत्त्व
प्राप्त करती है। जिस प्रकार इस प्रत्यक्ष जगत् मे भूमि, अन्तरिक्ष और द्यो, तीन लोक हैं, उसी प्रकार
मनुष्य शरीर मे और प्रासाद मे भी तीन लोको की कल्पना है। पैर पृथिवी है, मध्यभाग अन्तरिक्ष है और
सिर द्यु लोक है। इसी प्रकार मन्दिर की जगती या अधिष्ठान पादस्थानीय है, गर्भगृह या मण्डोवर मध्यस्थानीय
है और शिखर द्यु लोक या शीर्ष-भाग है। यह त्रिक यज्ञ की तीन अग्नियो का प्रतिनिधि है। मूल भूत एक अग्नि
सृष्टि के लिए तीन रूपो मे प्रकट हो रही है। उन्हे ही उपनिषदो की परिभाषा मे मन, प्राण और वाक् कहते हैं।
वहा वाक् का तात्पर्य पंचभूतो से है क्योकि पंचभूतो मे आकाश सबसे सूक्ष्म है और आकाश का गुण शब्द या
वाक् है। अतएव वाक् को आकाशादि पाचो भूतो का प्रतीक मानलिया गया है। मनुष्य शरीर मे जो प्राणाग्नि
है वह मन, प्राण और पचभूतो के मिलने से उत्पन्न हुई है (एतन्मयो वाऽयमात्म वाङ् मयो मनोमयः प्राणमय'
शतपथ १४।४।३।१०) पुरुष के भीतर प्रज्वलित इस अग्नि को ही वैश्वानर कहते है ( स एपोऽग्निर्वैश्वानरो
यत्पुरुष, शतपथ १०।६।१।११)। जो वैश्वानर अग्नि है वही पुरुष है जो पुरुष है वही देव-विग्रह या
देवमूर्ति के रूप मे दृश्य होता है। मूर्त और अमूर्त, निसक्त और अनिस्सक्त ये प्रजापति के दो रूप हैं। जो
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मूर्त्त है वह त्रिलोकी के रूप मे दृश्य और परिमित है। जो अमूर्त्त है वह अव्यक्त और अपरिमित है । जिसे
पुरुष के रूप मे वैश्वानर कहा जाता है वही समष्टि के रूप में पृथिवी अंतरिक्ष और द्यु लोक रूपी त्रिलोकी है ।
"स य स वैश्वानर । इमे स लोका. । इयमेव
पृथिवी विश्वमग्निनंरः । अंतरिक्षमेव विश्वं वायुर्नरः ।
द्यौरेव विश्वमादित्यो नर । शतपथ ६।३।१।३ ।"
इस प्रकार मनुष्य देह, अखिल ब्रह्माण्ड और देव प्रासाद इन तीनो का स्वरूप सर्वथा एक-दूसरे
के साथ संतुलित एवं प्रतीकात्मक है। जो पिण्ड मे है वही ब्रह्माण्ड मे है और जो उन दोनो में है उसीका
मूर्त्तरूप देव-प्रासाद है । इसी सिद्धान्त पर भारतीय देव-मंदिर की ध्रुव कल्पना हुई है । मंदिर के गर्भ गृह
मे जो देव विग्रह है वह उस अनादि अनन्त ब्रह्म तत्व का प्रतीक है जिसे वैदिक भाषा मे
प्राण कहा गया है ।-जो सृष्टि से पूर्व मे भी था, जो विश्व के रोम-रोम मे व्याप्त है,
वही प्राण सबका ईश्वर है । सब उसके वश मे है । सृष्टि के पूर्व की अवस्था मे उसे असत्
कहा जाता है और सृष्टि की अवस्था मे उसे ही सत् कहते हैं । देव और भूत ये ही दो तत्त्व हैं जिनसे समस्त
विश्व विरचित है। देव, अमृत, ज्योति और सत्य है । भूत मर्त्य, तम और अनृत है । भूत को ही असुर कहते
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जो देव तत्त्व है वही वैदिक भाषा मे अग्नि तत्त्व के नाम से अभिहित किया जाता है। कहा है—
'अग्निः सर्वा देवता' अर्थात् जितने देव हैं अग्नि सबका प्रतीक है। अग्नि सर्वदेवमय है। सृष्टि की जितनी दिव्य
या समष्टिगत शक्तिया हैं उन सबको प्राणाग्नि इस मनुष्य देह मे प्रतिष्ठित रखती है। इसी तत्त्व को लेकर देव
प्रासादो के स्वरूपका विकास हुआ । जिस प्रकार यज्ञवेदी मे अग्नि का स्थान है उसी प्रकार देव की प्रतिष्ठा के
लिए प्रासाद की कल्पना है। देव तत्त्व के साक्षात्कार का महत्वपूर्ण सिद्धान्त यह है कि प्रत्येक प्राणी उसे अपने ही
भीतर प्राप्त कर सकता है। जो देव द्यावा पृथिवी के विशाल अंतराल मे व्याप्त है वही प्रत्येक प्राणी के अंत -
करण मे है। जैसा कालिदास ने कहा है—
'वेदान्तेषु यमाहुरेकपुरुषं व्याप्य स्थित रोदसी,
अन्तर्यश्च मुमुक्षुभिर्नियमितप्राणादिभिर्मृ ग्यते ।,
अर्थात् प्राण और मन इन दो महती शक्तियो को नियम बद्ध करके अपने भीतर ही उस देवतत्व का
जो सर्वत्र व्याप्त है दर्शन किया जा सकता है। इस अध्यात्म नियम के आधार पर भागवतो ने विशेषतः देव-
प्रासादो के भौतिक रूप की कल्पना और उनमे से उस देवतत्त्व की उपासना के महत्वपूर्ण शास्त्र का निर्माण
किया । विक्रम की प्रथम शताब्दी के लगभग भागवतो का यह दृष्टिकोण उभर कर सामने आ गया और तद-
नुसार ही देव मंदिरो का निर्माण होने लगा ।
इस सम्बन्ध मे कई मान्यताए विशेष रूप से सामने आईं । उनमे एक तो यह थी कि यद्यपि मनुष्यो
की कल्पना के अनुसार देव एक है किन्तु वे सब एक ही मूल भूत शक्ति के रूप हैं और उनमे केवल नामो का
अन्तर है । यह वही पुराना वैदिक सिद्धान्त था जिसे ऋग्वेद मे 'यो देवाना नामधा एक एव', अथवा 'एक
सद्विप्रा बहुधा वदन्ति', इन वाक्यो द्वारा कहा गया था । नामो के सहस्राधिक प्रपच मे एक सूत्रता लाते हुए
भागवतों ने देवाधिदेव को विष्णु की सज्ञा दी । 'वेवेष्टि व्याप्नोति इति विष्णुः', इस निर्वचन के अनुसार यह
सज्ञा सर्वथा लोकप्रिय और मान्य हुई । इसी प्रकार वासुदेव आदि अनेक नामो के विषयमे भी उदारदृष्टि से इस
प्रकार के निर्वचन किए गए जिनमे नामो के ऐतिहासिक या मानवीय पक्ष को गौण करके उनके देवात्मक या
दिव्य पक्ष को प्रधानता मिली । उदाहरण के लिए वासुदेव शब्द की व्युत्पत्ति विष्णुपुराण मे इस प्रकार है—
सर्वत्रासौ समस्त च वसत्यत्रेति वै यतः ।
तत स वासुदेवेति विद्वद्भि परिपठ्यते ॥ (१।२।१२)
सर्वाणि तत्र भूतानि वसन्ति परमात्मनि ।
भूतेषु च स सर्वात्मा वासुदेवस्ततः स्मृतः ॥ (६।५।८०)
इसी को महाभारत मे इस प्रकार कहा गया है—
' छादयामि जगत्सर्वं भूत्वा सूर्य इवाशुभि ।
सर्वभूताधिवासश्च वासुदेवः तत स्मृतः ॥
(शान्तिपर्व, ३४१।४१)
वासनात्सर्वभूतानां वसुत्वाद्देवयोनित ।
वासुदेवस्ततो वेदाः . . . . . ॥
उद्योगपर्व, (७०।३)
२०
इसी उदात्त धरातल पर शंकराचार्य ने वासुदेव शब्द की इस प्रकार व्युत्पत्ति दी है—
"वमति वासयति आच्छादयति सर्वमिति वा वासुः, दीव्यति क्रीडते विजिगीषते व्यवहरति द्योतते स्तूयते गच्छ-
तीति वा देवः । वासुश्चासो देवश्चेति वासुदेवः ।"
(विष्णु सहस्रनाम' शाङ्कर भाष्य, ४६ श्लोक)
इस प्रकार की तरल और तरंगित मन स्थिति भागवतो की विशेषता थी जिसके द्वारा उन्होंने सब
धर्मों के समन्वय का राजमार्ग अपनाया। देव के बहुविध नामो के विषय मे उनके दृष्टिकोण का सार यह था-
पर्यायवाचकैः शब्दैस्तत्त्वमाद्यमनुत्तमम् ।
व्याख्यात तत्त्वभावज्ञैरेवं सद्भावचिन्तकैः ॥
(वायु पुराण, ४।४५)
अर्थात् समस्त सृष्टि का जो एक आदि कारण है, जिससे श्रेष्ठ और कुछ नही है, ऐसे उस एक
तत्त्व को ही तत्त्ववेत्ता अनेक पर्यायवाची शब्दों से कहते हैं। इस सुन्दर दृष्टिकोण के कारण समन्वय और
सम्प्रीति के धर्मान्बु मेघ भारतीय महाप्रजा के ऊपर उस समय अभिवृष्ट हुए जब देव-प्रासादो के रूप मे
संस्कृति का नूतन विकास हुआ । बौद्ध, जैन और हिन्दू मंदिरों में पारस्परिक स्पर्धा या तनाव की स्थिति न थी
किन्तु वे सब एक ही धार्मिक प्रेरणा और स्फूत्ति को मूर्त्तरूप दे रहे थे । गुप्त कालीन भागवती संस्कृति का यह
विशाल नेत्र था जिसके द्वारा प्रजाएं अपने-अपने इष्टदेव का अभिलषित दर्शन प्राप्त कर रही थी ।
मानवी देह के साथ देव तत्त्व के जिस घनिष्ठ संबंध का उल्लेख ऊपर किया गया है उसका दूसरा
प्रत्यक्ष फल यह हुआ कि देवालय की कल्पना भी मानुषी देह के अनुसार ही की गई । मानुषी शरीर के जो
अंग-प्रत्यग हैं उन्हीं के अनुसार देव मदिरो के मूर्त्तरूप का विधान निश्चित हुआ । किसी समय 'पुरुषविधो वै
यज्ञ.' अर्थात् 'जैसा पुरुष वैसा ही यज्ञ का स्वरूप' यह सिद्धान्त मान्य था । उसी को ग्रहण करते हुए 'पुरुष-
विधो वै प्रासाद,' अर्थात् जैसा पुरुष वैसा ही देव मन्दिर का वास्तुगत स्वरूप, यह नया सिद्धान्त मान्य हुआ ।
पाद, खुर, जङ्घा, गर्भगृह, मडोवर, स्कंध, शिखर, ग्रीवा, नासिका, मस्तक, शिखा आदि प्रासाद सबन्धी शब्दा-
वली मे मनुष्य और प्रासाद की पारस्परिक अनुकृति सूचित होती है ।
देव-प्रासादो के निर्माण की तीसरी विशेषता यह थी कि समाज मे कर्मकाण्ड की जो गहरी
धार्मिक भावना थी वह देव पूजा या अर्चा के रूप मे ढल गई । प्रत्येक मन्दिर उस-उस क्षेत्र के लिए धर्म का
मूर्त्त रूप समझा गया । भगवान् विष्णु अथवा अन्य देव का जो विशिष्ट सौन्दर्य था उसे ही उस-उस स्थान की
प्रजाए अपने अपने देवालयो में मूर्त करने का प्रयत्न करती थी । दिव्य अमूर्त्त सौन्दर्य को मूर्त रूप मे प्रत्यक्ष
करने का सबल प्रयत्न दिखाई दिया । सुन्दर मूत्ति और मन्दिरो के रूप मे ऐसा प्रतिभासित होता था कि मानो
स्वर्ग के सौन्दर्य को पृथिवी के मानव साक्षात् देख रहे हो । जन समुदाय की सम्मिलित शक्ति और राजशक्ति
दोनो का सदुपयोग अनेक सुन्दर देव मन्दिरो के निर्माण मे किया गया । यह धार्मिक भावना उत्तरोत्तर बढ़ती
गई और एक युग ऐसा आया जब प्रतापी राष्ट्रकूट जैसे सम्राटो का वैभव ऐलोरा के कैलाश सदृश देव मन्दिरो
मे प्रत्यक्ष समझा जाने लगा । एक-एक मंदिर मानो एक एक सम्राट के सर्वाधिक उत्कर्ष और समृद्धि का प्रकट
रूप था । जन नोक मे इस प्रकार की भावना सिद्ध हुई तभी मध्यकाल मे उस प्रकार के विशाल मंदिर बन
सके जिनका वर्णन समरागणसूत्रधार एवं अपराजित पृच्छा ऐसे ग्रंथो मे पाया जाता है। उन्हीं के वास्तु
शिल्प की परम्परा सूत्रधार मण्डन के ग्रंथ में भी पाई जाती है।
उपासना
}
२१
मन्दिर या प्रासाद को देवता का आवास माना गया। तब यह कल्पना हुई कि देवता के स्थान
पर निरंतर असुरो की वक्र दृष्टि रहती है। अतएव असुरो के निवारण या शांति के लिए पूजा-पाठ करना
आवश्यक है । प्रासाद-मण्डन मे इस प्रकार के चौदह शान्ति कर्म या शान्तिक कहे गये हैं। यथा (१) जिस दिन
भूमि परीक्षा करने के लिए उसमे खातकर्म किया जाय, (२) जिस दिन कूर्म शिला की स्थापना की जाय,
(३) जिस दिन शिलान्यास किया जाय; (४) जिस दिन तल निर्माण या तल-विन्यास के लिए सूत्र-मापन
या सूत्र-पातन (सूत्र-छोड़ना) द्वारा पदो के निशान लगाए जाय; (५) जिस दिन सबसे नीचे के थर का
पहला पत्थर, जिसे खुर-शिला कहते हैं (फारसी पत्थर खाकन्दाज) रक्खा जाय, (६) जिस दिन मन्दिर
द्वार की स्थापना की जाय; (७) जिस दिन मंडप के मुख्य स्तम्भ की स्थापना की जाय, (८) जिस दिन
मंडप के स्तम्भो के ऊपर भारपट्ट रक्खा जाय; (६) जिस दिन शिखर की चोटी पर पद्मशिला रक्खी जाय;
(१०) जिस दिन गर्भ गृह के शिखर के लगभग बीच मे शुकनासा या नासिका की ऊंचाई तक पहुंच कर
झपा सिंह की स्थापना की जाय, (११) जिस दिन शिखर पर हिरण्यमय प्रासाद-पुरुष की स्थापना की जाय,
(१२) जिस दिन घण्टा या घूमट पर आमलक रक्खा जाय, (१३) जिस दिन आमलसार शिला के ऊपर
कलश की स्थापना की जाय, (१४) और जिस दिन कलश के बराबर मंदिर पर ध्वजा रोपण किया जाय ।
इनमे सख्या २ और सख्या ३ को कुछ लोग अलग मानते है किन्तु य द कूर्मशिला को एक ही पद माना जाय
तो उनकी सूची मे केवल १३ शान्ति कर्म होते हैं और तब चौदहवा शान्तिक देव-प्रतिष्ठा के अवसर पर
करना आवश्यक होगा (१।३७-३८)
प्रासाद के गर्भ गृह की माप एक हाथ से पचास हाथ तक कही गई है । कु म्भक या जाड्य-कु म्भ
या जाडूमा का निकास इसके अतिरिक्त गर्भ गृह की भित्ति के बाहर होना चाहिए । जाड्यकु म्भ आदि विभिन्न
थरो का निर्गम तथा पीठ एव छज्जे के जो निर्गम हो उन्हे भी सम सूत्र के बाहर समझना चाहिए । गर्भगृह
समरेखा मे चौरस भी हो सकता है, किन्तु उसी मे फालनां या खाचे देकर प्रासाद मे तीन-पाच सात या
नौ विभाग किए जा सकते हैं । इसका आशय यह है कि यदि प्रासाद के गर्भगृह की लम्बाई आठ हाथ है
तो दोनो ओर दो-दो हाथ के कोण भाग रख कर बीच मे चार हाथ की भित्ति को खाचा देकर थोडा आगे
निकाल दिया जा सकता है । इस प्रकार का प्रासाद तीन अगो वाला या उडीसा की शब्दावली मे त्रिरथ
प्रासाद कहा जायगा । इसी प्रकार दो कोण, दो खाचे और एक भित्तिरथ वाला प्रासाद पचरथ प्रासाद
होता है । .दो कोण, दो-दो उपरथ और एक रथ युक्त प्रासाद सप्ताग, एव दो कोण चार-चार उपरथ एव
एक रथिका युक्त प्रासाद नवाग या नवरथ प्रासाद कहलाता है ( १।४१ ) इन फालनाओ या खाचो के
अनुसार ही प्रासाद का सम्पूर्ण उत्सेध या उदय खडा किया जाता है। अतएव प्रासाद रचनाओ मे फालनाओ
का सर्वाधिक महत्त्व है। खुर-शिला से लेकर शिखर के ऊपरी भाग तक जितने थर एक के ऊपर एक उठते
चले जाते हैं उन सबका विभाग इन्ही फालनाओ के अनुसार देखा जाता है । प्रासाद के एक-एक पार्श्व को
उसका भद्र कहते है । प्रत्येक भद्र की विविध कल्पना कोण, प्रतिभद्र और बीच वाले भद्राश पर ही निर्भर
रहती है । प्रासाद की ऊंचाई मे जहा-जहा फालनाओ के जोड मिलते है वही ऊपर से नीचे तक बरसाती
पानी के बहाव के लिए बारीक नालिया काट दी जाती हैं जिन्हे वारिमार्ग या सलिलान्तर कहते है। भद्र,
फालना (प्रतिभद्र ) और कर्ण या कोण की सामान्य माप के विषय मे यह नियम बरता जाता है कि भद्र
चार हाथ का हो तो दोनो ओर के प्रतिभद्र या प्रतिरथ दो-दो हाथ के और दोनो कर्ण या कोण भी दो हाथ
लम्बे रक्खे जाते हैं अर्थात् कर्ण और फालना से भद्र की लम्बाई दुगुनी होती है ।
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प्रासाद मण्डन के दूसरे अध्याय मे जगती, तोरण और देवता के स्थापन मे दिशा के नियम का
विशेष उल्लेख है, प्रसाद के अधिष्ठान की संज्ञा जगती है। जैसे राजा के लिए सिंहासन वैसे ही प्रासाद के लिए
जगती की शोभा कही गई है। प्रासाद के अनुरूप पाच प्रकार की जगती होती है-चतुरस्र (चौरस), आयत
(लम्ब चौरस), अष्टास्र (अट्ठंस या अठकोनी), वृत्त (गोल) और वृत्तायत (लम्ब गोल, जिसका एक सिरा गोल
और दूसरा आयत होता है, इसे ही द्वयस्र या वेसर कहते हैं)। ज्येष्ठ मध्य और कनीयसी तीन प्रकार की जगती
कही गई हैं । जगती की ऊंचाई और लम्बाई की नाप प्रासाद के अनुसार स्थपति को निश्चित करनी
चाहिए, जिनका उल्लेख ग्रन्थकार ने किया है। प्रासाद की चौड़ाई से तिगुनी चौगुनी या पांचगुनी तक चौड़ी
और मण्डप से सवाई ड्योढ़ी या दूनी लम्बी तक जगती का विधान है । जगती के ऊपर ही प्रासाद का
निर्माण किया जाता है अतएव यदि प्रासाद मे एक, दो या तीन भ्रमणी या प्रदक्षिणापथ रखने हो तो उनके
लिए भी जगती के ऊपर ही गुंजायश रखी जाती है। जगती के निर्माण में चार, बारह, बीस, अट्ठाइस,
या छत्तीस कोण युक्त फालनाओ का निर्माण सूत्रधार मण्डन के समय तक होने लगा था। जगती कितनी
ऊंची हो और उसमे कितने प्रकार के गलते-गोचे बनाए जांय इसके विषय मे मण्डन का कथन है कि जगती
की ऊंचाई के अट्ठाइस पद या भाग करके उसमे तीन पद का जाड्यकुंभ या जाड्या, दो पद की करणी,
तीन पद का दासा जो पद्मपत्र से युक्त हो, दो पद का खुरक, उसके ऊपर सात भाग का कुंभ, फिर तीन
पद का कलश, एक भाग का अंतरपत्रक, तीन भाग की कपोतली या केवल, चार भाग का पुष्पकण्ठ या
अतराल होना चाहिए। जगती के चारो ओर प्राकार या दीवार और चार द्वार-मण्डप, जल निकालने के
लिए मकराकृति प्रणाल, सोपान और तोरण भी इच्छानुसार बनाए जा सकते हैं। मण्डप के सामने जो
प्रतोली या प्रवेशद्वार हो उनके आगे सोपान मे शुण्डिकाकृति हथिती बनाई जाती है । तोरण की चौड़ाई
गर्भ गृह के पदो की नाप के बराबर और ऊंचाई मन्दिर के भारपट्टो की ऊंचाई के अनुसार रखी जाती है ।
तोरण मन्दिर का विशेष अंग माना जाता था और उसे भी जगती और उसके ऊपर पीठ देकर ऊंचा
बनाया जाना था । तोरण की रचना मे नाना प्रकार के रूप या मूर्तियो की शोभा बनाई जाती थी । तोरण
कई प्रकार के होते थे । जैसे घटाला तोरण, तलक तोरण, हिण्डोला तोरण आदि । प्रासाद के सामने वाहन
के लिए चौकी ( चतुष्किका ) रखी जाती थी ।
देव मन्दिर मे वाहन के निर्माण के भी विशेष नियम थे । वाहन की ऊंचाई गर्भारे की मूर्ति के
हृत्स्थान, नाभिस्थान या स्तन रेखा तक रखी जा सकती है। शिखर के जिस भाग पर सिंह की मूर्ति बनाई
जानी है उसे शुकनासिका कहते है । उस सूत्र से आगे गूढमण्डप, गूढमण्डप से आगे चौकी और उससे आगे नृत्य-
मण्डप की रचना होती है। मण्डपो की संख्या जितनी भी हो सब का विन्यास गर्भगृह के मध्यवर्ती सूत्र से
नियमित होता है। मंदिर के द्वार के पास त्रिगाला या अलिंद या वलाणक (द्वार के ऊपर का मंडप) बनाया जाता
है । पन्द्रहवी शती मे मंदिरो का विस्तार बहुत बढ़ गया था और उसके एक भाग मे रथ यात्रा वाला बड़ा
रथ रखने के लिए रथ शाला और दूसरे भाग मे छात्रो के निवास के लिए मठ का निर्माण भी होने लगा था ।
तीसरे अध्याय मे आगार शिला प्रासाद पीठ, पीठ के ऊपर मंडोवर और मन्दिर के द्वार के निर्माण
का विस्तृत वर्णन है। प्रासाद के मूल मे नीव तैयार करने के लिए कंकरीट ( इष्ट का चूर्ण ) की पानी के
साथ खूब कुटाई करनी चाहिए । इसके ऊपर खूब मोटी और लम्बी चौड़ी प्रासाद धारिणी शिला या पत्थर
का फर्श बनाया जाता है। इसे ही भुर शिला या धर शिला भी कहते हैं। इस शिला के ऊपर जैसा भी
प्रासाद बनाना हो उसके अनुरूप सर्व प्रथम जगती या अधिष्ठान बनाया जाता है जिसका उल्लेख पहले
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हुआ है। यदि विशेष रूप से जगती का निर्माण संभव न हो तो भी पत्थर की शिलाओ के तीन थर एक
के ऊपर एक रखने चाहिए। इन थरो को भिट्ट कहा जाता है। नीचे का भिट्ट दूसरे की अपेक्षा कुछ मोटा
और दूसरा तीसरे मे कुछ मोटा रक्खा जाता है। भिट्ट जितना ऊचा हो उसका चौथाई निर्गम या निकास
किया जाता है।
भिट्ट या जगती के ऊपर प्रासाद पीठ का निर्माण होता है। प्रासाद-पीठ और जगती का भेद
स्पष्ट समझ लेना चाहिए । जगती के ऊपर मध्य मे बनाए जाने वाले गर्भ गृह या मडोवर की कुर्सी की संज्ञा
प्रासाद पीठ है। इस पीठ की जितनी ऊंचाई होती है उसी के बराबर गर्भ गृह का फर्श रक्खा जाता है ।
प्रासाद पीठ के निर्माण के लिए भी गोले गलतो का या विभिन्न थरो का विधान है। जैसे नौ अंश का
जाड्यकु भ, सात भाग की करणी, कपोतालि या केवल के साथ सात भाग की ग्रामपट्टी (जिसमें सिंह मुख की
आकृति बनी रहती है। और फिर उनके ऊपर बारह भाग का गज थर, दश भाग का अश्व थर और आठ
भाग का नर थर बनाया जाता है। प्रत्येक दो थरो के बीच मे थोडा-अतराल देना उचित है और ऊपर नीचे
दोनो और पतली कर्णिका भी रक्खी जा सकती है।
प्रासाद पीठ के ऊपर गर्भ गृह या मडोवर बनाया जाता है जिसे वास्तविक रूप मे प्रासाद का
उदय भाग कहना चाहिए । मण्ड का अर्थ है पीठ या आसन और जो भाग उसके ऊपर बनाया जाता था उसके
लिए मण्डोवर यह सज्ञा प्रचलित हुई । मडोवर के उत्सेध या उदय को १४४ भागो मे बाटा जाता है। यह
ऊंचाई प्रासाद पीठ के मस्तक से छज्जे तक ली जाती है। इसके भाग ये है—खुरक ५ भाग, कुम्भक २०
भाग, कलश ८ भाग, अतराल २॥ भाग, कपोतिका या कपोतालि ८ भाग, मची ६ भाग, जङ्घा ३५ भाग,
उरुजघा (उद्गम) १५ भाग है (जिसे गुजराती मे 'डौढिया' भी कहा जाता हैं), भरणी ८ भाग, शिरावटी
या शिरापट्ट १० भाग, ऊपर की कपोतालि ८ भाग, अंतराल ढाई भाग और छज्जा १३ भाग । इस प्रकार
१४४ भाग मडोवर के उदय मे रखे जाते है। छज्जे का बाहर की ओर निकलता जाता दश भाग होता है ।
एक विनेप प्रकार का मडोवर मेरु मडोवर कहलाता है, उसमे भरणी के ऊपर से ही ८ भाग की मञ्ची देकर
२५ भाग की जघा बनाई जाती है और फिर छज्जे के ऊपर ७ भाग की एक मञ्ची देकर १६ भाग की जघा
बनाते है। उसके ऊपर ७ भाग की भरणी, ४ भाग की शिरावटी, ५ भाग का भारपट्ट और फिर १२ भाग
का कूट छाद्य या छज्जा । इस प्रकार, मडोवर की रचना मे तीन जघायें और दो छज्जे बनाये जाते थे ।
प्रत्येक जङ्घा मे भिन्न भिन्न प्रकार को मूर्तिया उत्कीर्ण की जानी है। आमेर के जगत शरणजी के मदिर मे
मेरु मडोवर की रचना की गई हैं। एक दूसरे के ऊपर जो थरो का विन्यास है उनमे निर्गम और प्रवेश का
अर्थात् बाहर की ओर निकलता जाता और भीतर की ओर दबाव रखने के भी नियम दिए गए हैं, मंडन का
कथन है कि यदि प्रासाद निर्माण मे अल्प द्रव्य व्यय करना हो तो तीन जङ्घाओ मे से इच्छानुसार जघा, रूप
या मूर्तियो का निर्माण छोडा भी जा सकता है ( ३।२८ )।
ईटो से बने मंदिर मे भीत की चौडाई गर्भ गृह की चौडाई का चौथा भाग और पत्थर के मदिर
मे पाचवा भाग रखनी चाहिए। गभारा बीच मे चौरस (युगास्र) रखकर उसके दोनो ओर फालनाए देनी
चाहिए, जिनका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है। मडन ने फालनाओ के लिए भद्र सुभद्र और प्रतिभद्र शब्दो
का प्रयोग किया है। उन्ही के लिए उत्कल की शब्दावली मे रथ, अनुरथ, प्रतिरथ, कोणरथ शब्द आते है ।
मडोवर और उसके सामने बनाये जाने वाले मडपो के खम्मो की ऊंचाई एक दूसरे के साथ मेल मे रखनी
आवश्यक है। मंडप के ऊपर की छत या गूमट को करोट कहा गया है। इस करोट की ऊँचाई मडप की
चौड़ाई मे आधी रखनी चाहिए। इस करंट या छत मे नीचे की ओर जो कई थर बनाये जाने है उन्हे दर्दरी
कहा जाता था, गूमट के भीतरी भाग को वितान और ऊपरी भाग को सम्बरण कहते हैं। वितान में दर्दरी या
थरो की सख्या विषम रखने का विधान है।
इसके अनंतर मंदिर के द्वार का सविस्तर वर्णन है (३।३७-६६)। द्वार के चार भाग होते हैं
अर्थात नीचे देहली या उदुम्बर, दो पार्श्व स्तम्भ और उनके ऊपर उत्तरंग या सिरदल । इन चारो को ही
शिल्पी अनेक अलंकरणो मे युक्त करने का प्रयत्न करते थे। देवगढ़ के दशावतार मंदिर का अलंकृत द्वार एक
ऐसी कृति है जिसकी साज-सज्जा ने शिल्पियों ने अपने कौशल की पराकाष्ठा दिखाई है। प्रायः गुप्त युग में उसी
प्रकार के द्वार बनते रहें। शनैः शनैः मध्यकालीन मंदिरो में द्वार निर्माण कला में कुछ विकास और परिवर्तन
भी हुआ । मंडन के अनुसार उदुम्बर या देहली की चौड़ाई के तीन भाग करके बीच में मन्दारक और दोनो
पाश्र्वों मे ग्रास या सिंहमुख बनाने चाहिए। मन्दारक के लिए प्राचीन शब्द सन्तानक भी था (अंग्रेजी फेस्टून) ।
गोल सन्तानक मे पद्मपत्रो से युक्त मृणाल की आकृति उकेरी जाती थी। ग्रास या सिंह मुख को कीर्तिवक्त्र
या कीर्तिमुख भी कहते थे । देहली के दोनो ओर के पार्श्व स्तम्भो के नीचे तलरूपक (हिन्दी-तलकड़ा) नाम
के दो अलकरण बनाये जाते हैं। तलकड़ो के बीच मे देहली के सामने की ओर बीच के दो भागों मे अर्धचन्द्र
और उसके दोनो ओर एक-एक गगारा बनाया जाता है। गगारी के पास मे शंखो की और पद्मपत्र की आकृति
उत्कीर्ण की जाती हैं। द्वार की यह विशेषता गुप्त युग ते ही आरम्भ हो गई थी, जैसा कालिदास ने मेघदूत
मे वर्णन किया है (द्वारोपान्ते लिखितवपुषौ शंखपद्मौ च दृष्ट्वा, उत्तर मेघ १७) । गगारक या गगारा शब्द
की व्युत्पत्ति स्पष्ट नही है। यहां पृष्ठ ५६ और वास्तुसार मे पृ० १४० पर गगारक का चित्र दिया गया है।
द्वार की ऊंचाई से उसकी चौड़ाई आधी होनी चाहिए। और यदि चौड़ाई मे एक कला या सोलहवा अंश बढ़ा
दिया जाय तो द्वार की शोभा कुछ अधिक हो जाती है, द्वार के उत्तरग या सिरदल भाग मे उस देव की मूर्ति
बनानी चाहिए जिसकी गर्भगृह मे प्रतिष्ठा हो। इस नियम का पालन प्रायः सभी मंदिरो मे पाया जाता है।
इस मूर्ति को ललाट-विम्ब भी कहते थे। द्वार के दोनो पार्श्व स्तम्भो में कई फालना या भाग बनाये जाते थे जिन्हें
सस्कृत मे शाखा कहा गया है। इस प्रकार एक शाख, त्रिगाख, पंच शाख, सप्त शाख, और नव शाख, तक के
पार्श्व स्तम्भ युक्त द्वार बनाये जाते थे। इन्ही के लिए तिसाही, पंचसाही आदि शब्द हिन्दी में अभी तक
प्रचलित है। सूत्रधार मंडन ने एक नियम यह बताया है कि गर्भगृह की दीवार मे जितनी फालना या अंग
बनाये जाय उतनी ही द्वार के पार्श्व स्तम्भ मे शाखा रखनी चाहिए (शाखाः स्युरंग तुल्यकाः ३।५६) । द्वार
स्तम्भ की सजावट के लिए कई प्रकार के अलंकरण प्रयुक्त किये जाते थे। उनमे रूप या स्त्री पुरुषों की मूर्तियां
मुख्य थी। जिस भाग मे ये आकृतियां उकेरी जाती थी उसे रूप स्तम्भ या रूप शाखा कहते थे। पुष्प संज्ञक
और स्त्री सज्ञक शाखाओ का उल्लेख मण्डन ने किया हैं। इस प्रकार की शाखाये गुप्तकालीन मंदिर द्वारो पर
भी मीननी हैं। अलकरणो के अनुसार इन शाखाओ के और नाम भी मिलते हैं जैसे-पत्रशाखा, सिंह शाखा,
गन्धर्व शाखा, रूप शाखा आदि । खल्व शाखा पर जो अलंकरण बनाया जाता था वह मटर आदि के बेलो
मे रहते हुए गोल प्रतानो के सदृश होता था। आबू के विमलवसही आदि मंदिरो मे तथा अन्यत्र भी इसके
उदाहरण हैं। खल्व शब्द प्राचीन था और उसका अर्थ फलिनीलता या मटर आदि की वेल के लिए प्रयुक्त
होता था।
प्रासाद मडन के चौथे अध्याय मे प्रारम्भ मे प्रतिमा की ऊंचाई बताते हुए फिर शिखर निर्माण
का ब्योरे दार वर्णन किया गया है। देव प्रासादो के निर्माण मे शिखरो का महत्वपूर्ण स्थान था । मंदिर के
वास्तु मे नाना प्रकार के शिखरो का विकास देखा जाता है। शिखरों की अनेक जातियां शिल्प ग्रंथों मे कही
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गई है । वास्तविक प्रासाद शिखरो के साथ उन्हें मिलाकर अभी तक कोई अध्ययन प्रस्तुत नही किया गया है ।
बाण ने सातवीं शती में बहुभूमिक शिखरो का उल्लेख किया है । प्रारम्भिक गुप्तकाल में बने हुए साची के
छोटे देव मन्दिर में कोई शिखर नही है । देवगढ के दशावतार मंदिर में शिखर के भीतर का ढोला विद्यमान
है । यह इस बात का साक्षी है कि उस मंदिर पर भी शिखर की रचना की गई थी । शिखर का आरम्भ किस
रूप में और कब हुआ यह विषय अनुसंधान के योग्य है । पंजाब में मिले हुए उदुम्बर जनपद के सिक्को पर
उपलब्ध देवप्रासाद के ऊपर त्रिभूमिक शिखर का स्पष्ट अंकन पाया जाता है । इससे यह सिद्ध होता है कि
शिखरो का निर्माण गुप्त युग से पहले होने लगा था । ज्ञात होता है कि मंदिर के वास्तु में दोनो प्रकार मान्य
थे । एक शिखर युक्त गर्भ गृह या मण्डप या और दूसरे शिखर विहीन चौरसछत वाले सादा मंदिर जैसे साची
और मानवा के मुन्दरा आदि स्थानों में मिले है । इस प्रकार के मदिरो के विकास का पूर्वरूप कुषाण कालीन
गन्धकुटी में प्राप्त होता है, जिसमे तीन खडे पत्थरों को चौरस पत्थर से पाट कर उसके भीतर बुद्ध या
बोधिसत्व की प्रतिमा स्थापित कर दी जाती थी । कालान्तर में तो शिखर मदिरो का अनिवार्य अंग बनगया
और उसकी शोभा एव रूप विधान में अत्यधिक ध्यान दिया जाने लगा । मंदिर के गर्भ गृह में खडी हुई या
बैठी हुई देव प्रतिमा की उचाई कितनी हो और उसका दृष्टि सूत्र कितना ऊचा रखा जाय इसके विषय में
द्वार की ऊंचाई के अनुसार निर्णय किया जाता था । जैसे एक विकल्प यह था कि द्वार की ऊंचाई के आठ या
नव भाग करके, एक भाग छोडकर शेष ऊंचाई के तीन भाग करके उनमे में दो के बराबर मूर्ति की ऊंचाई
रखनी चाहिए ।
मंदिर में शिखर की रचना अत्यन्त जटिल विषय है । मडोवर के छज्जे के ऊपर दो एक थर और
लगाकर नव शिखर का प्रारम्भ करते है । वास्तुसार में इन थरो के नाम वेराडू और पहाडू कहे है (वास्तुसार
पृ ११८) किन्तु मडन ने केवल पहार नामक थर का उल्लेख किया है । शिखर के उठते हुए विन्यास में शृगो
की रचना सबसे अधिक महत्वपूर्ण है । मटोवर की विभिन्न फालनाओ की ऊंचाई स्कन्ध के बाद जब शिखर में
उठती है तो कोण, प्रतिरथ और रथ आदि की सीध में शृग बनाये जाते है । इन्ही शृगो के द्वारा शिखर का
ठाठ जटिल और सुन्दर हो जाता है । बीच के शिखर को यदि हम एक ईकाई मानें तो उसकी चारो दिशाओ में
चार उरुशृग बनाये जा सकते है । ये शृग भी शिखर की आकृति के होते हैं । यदि मूल शिखर का सामने से
दर्शन किया जाय तो वही आकृति शृग की होती है । प्रासाद के शिखर का सम्मुख दर्शन ही शृग है । मूल
शिखर और उसके चारो ओर के चार शृग इस प्रकार कुल ५ शृग युक्त रूप प्रासाद का एक सीधा प्रकार हुआ ।
बीच के शिखर को मूलमजरी और चारो ओर के मूलभूत बडे शृगो को उरुशृग कहते है । इसी के लिए
राजस्थानी और गुजराती रथपतियों में छातियाशृग शब्द भी प्रचलित है । वस्तुत. शृग और शिखर पर्यायवाची
[L2
२६
रखना चाहिये । इस अनुपात से शिखर सुहावना प्रतीत होता है । गर्भ गृह की मूलरेखा या चौड़ाइ से शिखर
का उदय सवाया रक्खा जाता है । शिखर के वलण अर्थात् नमन की युक्ति साधने के लिए उसके उदय भाग मे
और स्कन्ध मे क्रमश: रेखाओ और कलाओ की सूक्ष्म गणना स्थपति सम्प्रदाय मे प्रचलित है । उस विषय का
संक्षिप्त संकेत मंडन ने किया है । रेखाओ और कलाओ का यह विषय अपराजित पृच्छा (प्र. १३६-१४१) मे
भी आया है । खेद है कि यह विषय अभी तक स्पष्ट न होने से इस पर अधिक प्रकाश डालना सम्भव नही ।
मडन का कथन है कि खरशिला से कलश तक बीस भाग करके आठ या ८½ या ६ भाग मे मंडोवर की
ऊचाई और शेष मे शिखर का उदय रक्खा जाता है । शिखर के गूमट नुमा उठान को पद्मकोश कहा जाता है
(४।२३) पद्मकोश की आकृति लाने के लिये मडन ने अति संक्षिप्त रीति से एक युक्ति कही है (चतुर्गुणेन
सूत्रेण सपाद. शिखरोदय: (४।२३) इसके अनुसार शिखर की मूलरेखा मे चौगुना सूत्र लेकर यदि नये प्राप्त
दोनो बिन्दुओ को केन्द्र मानकर गोल रेखाये खीची जाय तो जहा वे एक दूसरे को काटती हो वह शिखर का
अतिम विन्दु हुआ । शिखर की मूल रेखा से उसकी (मूल रेखा की) सवाई जितनी ऊंचाई पर एक रेखा खीची
जाय तो वह शिखर का स्कन्ध स्थान होगा । इस स्कन्ध और पद्मकोश के अंतिम बिन्दु तक की ऊंचाई के
सात भाग करके एक भाग मे ग्रीवा, १½ भाग मे आमलक शिला, १½ भाग मे पद्मपत्र (जिन्हे आजकल
लीलोफर कहते है), और तीन भाग मे कलश का मान रहेगा ।
शिखर मे शुकनास का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है । शुकनास की ऊंचाई के पाच विकल्प कहे है । अर्थात्
छज्जे से स्कन्ध तक के उदय को जब इक्कीस भागो मे बाटा जाय तो ६, १०, ११, १२, १३, अंशो तक
कही भी शुकनास का उच्छ्रय किया जा सकता है। शुकनासिका के उदय के पुन: नव भाग करके १, ३, ५, ७,
या ६ भागो मे कही पर भी झम्पार्सिंह रखना चाहिये। शुकनासा, प्रासाद या देव मदिर की नासिका के समान
है । शिखर मे शुकनासिका का निकलता खाता नीचे के अंतराल मण्डप के अनुसार बनाया जाता है । अंतराल
मण्डप को कपिली या कौली मण्डप भी कहते है । (४।२७) अन्तराल मडप की गहराई छ: प्रकार की बताई
गई है । शिखर की रचना मे शृ ग, उरुशृंग (छातिया शृ ग), प्रत्यग और अण्डको का महत्त्वपूर्ण स्थान है ।
एव भिन्न भिन्न प्रकार के शिखरो के लिए उनकी गणना अलग २ की जाती है । इसी प्रकार तवग, तिलक
और सिहकर्ण ये भी प्रकारान्तर के अलकरण है जिन्हे प्रासाद के शिखर का भूषण कहा जाता है और इनकी
रचना भी शिखर को विभिन्नता प्रदान करती है ।
मडन के अनुसार प्रासाद के शिखर पर एक हिरण्यमय प्रासाद पुरुष की स्थापना की जाती है ।
कलश, दण्ड, और ध्वजारोपण के सबध मे भी विवरण पाया जाता है ।
पाचवें-छठे अध्यायो मे वैराज्य आदि पच्चीस प्रकार के प्रासादो के लक्षण कहे गए हैं । गर्भ गृह -
के कोण से कोण तक प्रासाद के विस्तार के ४ से ११२ तक आवश्यकतानुसार भाग किए जा सकते है और
उन्ही भागो के अनुसार फालनाओ के अनेक भेद किए जाते हैं । प्रासादो के नाम और जातिया उनके शिखरो
के अनुसार कही गई है । वस्तुत: इन भेदो के आधार पर प्रासादो की सहस्रो जातिया कल्पित की जाती
हैं । गर्भ गृह,
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आदि प्रासादो का निरूपण किया गया है। प्रयोगात्मक दृष्टि से यह विषय अत्यधिक विस्तार को प्राप्त हो
गया था । यहा तक कि मेरु-प्रासाद मे ५०१ शृग तक बनाए जाते थे। वृषभध्वज नामक मेरु मे एक-सहस्र
एक अण्डक कहे गये है। मेरु प्रासाद बहु व्यय साध्य होने से केवल राजकीय निर्माण का विषय समझा
जाता था ।
७ वें अध्याय मे, मण्डपो के निर्माण की विधि दी गई है। १० हाथ से ५० हाथ तक की चौडाई
के सम या सपाद मण्डप बनाए जाते थे । जैन मन्दिरो मे गूढमण्डप, चौकी मण्डप, नृत्य मण्डप, इन तीनो
मण्डपो का होना आवश्यक माना गया है। मण्डप के ऊपर की छत घण्टा कहलाती थी जिसे हिन्दी मे
गूमट कहते है। इसके ऊपर के भाग को सवरण और नीचे के भाग को वितान कहते थे । मडप के निर्माण मे
स्तम्भो का विशेषतः विधान किया गया है। ४, ८, १२ या २० कोने तक के स्तम्भ अथवा गोल स्तम्भ
बनाए जाते थे । स्तम्भो की सख्या के भेद से २७ प्रकार के मण्डप कहे गए है। १२ स्तम्भो से लेकर २-२
की वृद्धि करते हुए ६४ स्तम्भो तक के मण्डपो का उल्लेख है। गूमट की छत के वितान को दर्दरी, रूपकण्ठ,
विद्याधर, नर्तकी, गजतालु, कोल आदि अलकरणो से युक्त थरो से सुशोभित किया जाता था, एक से एक
विचित्र वितानो के निर्माण मे भारतीय शिल्पाचार्यो ने अपने कौशल का परिचय दिया था । यहा तक कि
एक हजार एक सो तेरह प्रकार के वितान कहे गये है। गूमट के ऊपरी भाग या सवरण के सजावट मे
घण्टी का अलकरण मुख्य था । न्यूनातिन्यून पाच घटियो से लेकर ४-४ की सख्या बढाते हुए एक सौ एक
घंटियो तक की गिनती की जाती थी ।
आठवे अध्याय मे मदिरो के एव वापी-कूप-तडागादि के जीर्णोद्धार की विधि कही गई है। साथ ही
राजपुर आदि नगरो के निर्माण को सौध, जाल-गवाक्ष, कीर्ति स्तम्भ, जलाराम आदि से सुशोभित करने का
वर्णन आया है। इसी प्रकार कोष्ठागार, मत्तवारणी, महानस, पुण्यशाला, आयुधशाला, छात्रागार, जल स्थान,
विद्या मण्डप, व्याख्यान मण्डप आदि के निर्माण का विधान भी किया गया है । इस प्रकार सूत्रधार मण्डन
ने अपने वास्तुसार सबन्धी इस ग्रथ मे सक्षिप्त शैली द्वारा प्रासाद रचना सबन्धि विस्तृत जानकारी भरने का
प्रयत्न किया है। इस ग्रथ का पठन-पाठन मे अधिक प्रचार होना उचित है ।
श्री प भगवानदास जैन ने अनुवाद और चित्रमय व्याख्या के द्वारा इस ग्रथ को सुलभ बनाने का जो
प्रयत्न किया है इसके लिए हमे उनका उपकार मानना चाहिए । व्यक्तिगत रीति से हम उनके ओर भी आभारी
, है क्योकि आज से कई वर्ष पूर्व जयपुर मे रहकर हमे उनसे इस ग्रथ के साक्षात् अध्ययन का अवसर प्राप्त
हुआ था । विदित हुआ है कि इस ग्रन्थ का वे हिन्दी भाषान्तर भी प्रकाशित करना चाहते हैं। आशा है उस
सस्करण मे विषय को स्पष्ट करने वाले रेखाचित्रो की संख्या मे और भी वृद्धि सभव होगी ।
वासुदेवशरण अग्रवाल
अध्यक्ष-कला वास्तु विभाग
ता० १-१-६२ काशी विश्व विद्यालय
विषयानुक्रमणिका
विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ
मंगलाचरण ... १ शिला और कूर्म का स्थापन क्रम ... १७
देव पूजित शिव स्थान ... २ शिला के नाम ... १८
प्रासाद की जाति ... २ धरणी शिला का मान ... १८
आठ जाति के उत्तम प्रासाद ... ३ धरणी शिला ऊपर के रूप ... २०
प्रासाद का निर्माण समय ... ४ सूत्रारंभ नक्षत्र ... २१
भूमि परीक्षा ... ४ शिला स्थापन नक्षत्र ... २१
वास्तु मंडल लिखने का पदार्थ ... ४ देवालय का निर्माण स्थान ... २१
आठ दिक्पाल ... ५ प्रासाद निर्माण पदार्थ ... २२
कार्यारंभ के समय पूजनीय देव ... ५ देव स्थापन का फल ... २२
निषेध समय ... ५ देवालय बनाने का फल ... २२
वत्समुख ... ५ वास्तु पूजा का सप्त स्थान ... २२
आय आदिका विचार ... ७ शान्ति पूजा का चौदह स्थान ... २३
देवालय मे विचारणीय ... ७ प्रासाद का प्रमाण ... २३
आय व्यय और नक्षत्र लाने का प्रकार ... ७ मण्डोवर के थरो का निर्गम ... २३
आयो की सज्ञा और दिशा ... ८ प्रासाद के अंगो की संख्या ... २३
प्रासाद के प्रशस्त आय ... ८ फालनाओ का सामान्य मान ... २४
व्यय संज्ञा ... ८
राशि, योनि, नाडी, गण, चंद्रमा आदि दूसरा अध्याय
जानने का शतपद चक्र ... ९-१० जगती ... २५
ध्वजाय और देवगण नक्षत्र वाले , जगती का आकार ... २५
समचोरस क्षेत्र का नाप ... ११ जगति का विस्तार मान . २५
ऋण लाने का प्रकार ... १२ मण्डप की जगती ... २६
दिक् साधन .. १२ भ्रमणी ( परिक्रमा ) .... २७
दिक् साधन यंत्र ... १४ जगती के कोने .... २७
खात विधि ... १४ जगती की ऊंचाई का मान .... २७
नाग वास्तु ... १४ जगती के उदय का थर मान .... २८
राहु (नाग) मुख ... १५ जगती के आभूषण .... २८
कूर्ममान ... १६ जगती का दिग्दर्शन रेखाचित्र .... २६
अपराजित के मत से कूर्म का मान् ... १६ देव के वाहन का स्थान .... ३०
धीरार्णव के मत मे कूर्ममान ... १७ देव के वाहन का उदय .... ३०
कूर्म का ज्येष्ठ और कनिष्ठ मान ... १७ देव के वाहन का दृष्टि स्थान .... ३१
२६
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जिनप्रासाद के मंडपो का क्रम .... ३१ प्रासाद के उदय से पीठका उदयमान .... ४८
जिनप्रासाद मे देवकुलिका का क्रम .. ३१ १४४ भाग का मंडोवर (दीवार) ... ४९
बावन जिनालय .... ३२ १४४ भाग के मडोवर का दिग्दर्शन ... ५१
बहत्तर देवकुलिका ... ३२ चार प्रकार की जंघा ... ५२
चौबीस देवकुलिका .... ३२ मेरु मंडोवर और उसका चित्र ... ५३
रुप और मठाका स्थान .... ३२ सामान्य मंडोवर का चित्र . ५४
शिवलिंग के आगे अन्य देव ... ३३ सामान्य मंडोवर . ५५
देव के सम्मुख न्यदेव ... ३३ २७ भाग का मडोवर सचित्र .. ५५
परस्पर दृष्टिबंध ... ३४ मडोवर की मोटाई . ५५
दृष्टिबंध का परिहार ... ३४ शुभाशुभ गर्भगृह .... ५६
शिवस्नानोदक .... ३४ लव चौरस शुभ गर्भगृह ... ५७
देवो की प्रदक्षिणा ... ३५ स्तंभ और मडोवर का समन्वय ... ५७
जनमार्ग (पनाला) .. ३५ गर्भगृह के उदय का मान और गूम्बज .... ५७
मण्डप स्थित देवो की नाली .. ३६ उदुम्बर (देहली) की ऊंचाई ... ५८
पूर्व और पश्चिमाभिमुखदेव .. ३६ उदुम्बर की रचना ... ५८
दक्षिणाभिमुखदेव .. ३७ कुम्भा से हीन उदुम्बर और तल ... ५८
पश्चिमाभिमुख देव .. ३७ अर्द्धचन्द्र (शखावत्र्त) .. ६०
सूर्य आयतन ... ३७ उत्तरंग .. ६१
गणेश आयतन ... ३८ नागरप्रासाद का द्वारमान ... ६२
विष्णु आयतन ... ३८ भूमिजादि प्रासाद का द्वारमान ... ६३
चण्डी आयतन ... ३८ द्राविड़ प्रासाद का द्वारमान ... ६४
शिव पञ्चायतन ... ३८ अन्यजाति के प्रासाद का द्वारमान ... ६४
त्रिदेव स्थापन क्रम ... ३९ द्वार शाखा ... ६४
त्रिदेवो का न्यूनाधिकमान ... ३९ शाखा के आय ६५
शाखा से द्वार का नाम और परिचय ६५
तीसरा अध्याय त्रिशाखा द्वार का चित्र ६६
न्यूनाधिक शाखामान ६७
प्रासाद धारिणी तरशिला . ४१ त्रिशाखा ६७
तरशिला का मान ... ४१ शाखा स्तंभ का निर्गम . ६७
भिट्टमान .... ४२ शाखोदर का विस्तार और प्रवेश ६७
भिट्ट का निर्गम . ४२ त्रि पंच सप्त नव शाखा का चित्र ६८
पीठ का उदयमान ... ४३ शाखा के द्वारपाल का मान . ६८
पीठोदय का थरमान . . ४५ शाखाके रूप ६९
थरो का निर्गम मान ... ४६ पञ्च शाखा ६९
कामपीठ और कणपीठ ... ४६ सप्त शाखा . . ७०
प्रासाद का उदयमान (मडोवर) .... ४७
३०
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नव शाखा ७० सुवर्णपुरुष का मान और उसकी रचना .. ८६
उत्तरंग के देव . ७१ कलश की उत्पत्ति और स्थापना .. ८७
कलश का उदयमान .. ८८
चौथा अध्याय कलश का विस्तारमान . . ८८
ध्वजादंड रखने का स्थान .. ८६
द्वारमान से मूर्ति और पवासन का मान . ७२ ध्वजाधार (स्तम्भवेध) का स्थान .... ८६
गर्भगृह का मान . ७३ ध्वजाधार की मोटाई और स्तंभिका .. ८६
गर्भगृह के मान से मूर्ति का मान . ७३ ध्वजाधार, ध्वजदड और ध्वजा का चित्र .. ६०
देवो का दृष्टि स्थान . ७३ ध्वजादड का उदयमान .... ६०
देवो का पद स्थान . ७४ ध्वजादंड का दूसरा उदयमान .. ६१
प्रहार थर . ७५ ध्वजादंड का तीसरा उदयमान .... ६१
छाद्य ( छजा ) के थर मान ७५ ध्वजादंड का विस्तारमान . . ६१
शृङ्ग क्रम .. ७५ ध्वजादंड की रचना .... ६२
उरु शृङ्ग का क्रम सचित्र ७६ विषमपर्व वाले ध्वजादड के तेरह नाम ... ६२
शिखर निर्माण . ७६ ध्वजादंड की पाटली .... ६२
२५६ रेखा की साधना सचित्र .. ७७ ध्वजा का मान ... ६३
उदय भेदोद्भव रेखा . . ७८ ध्वजा का महात्म्य ... ६३
कलाभेदोद्भव रेखा . ७८
रेखाचक्र .. ७६ पांचवां अध्याय
त्रिखंडा कला रेखा .. ७६
सोलह प्रकार के चार ७६ ग्रंथ मान्यता की याचना ... ६५
त्रिखंडा की रेखा और कला . ८० वैराज्यप्रासाद ... ६५
रेखा सत्या . ८१ फालना के भेद ... ६५
मडोवर और शिखर का उदयमान ८१ भ्रमणी ( परिक्रमा ) ... ६६
शिखर विधान . ८१ १ वैराज्य प्रासाद ... ६६
ग्रीवा, आमलसार और कलश का मान . ८२ वैराज्यादि जातिका प्रासाद चित्र
शुकनास का उदय . ८२ नागर जातिका कलामय मंडोवर चित्र
सिंह स्थान . ८२ दिशा के द्वारका नियम ... ६७
कपिली ( कोली ) का स्थान .. ८३ २ नन्दन प्रासाद ... ६८
कपिली का मान . ८३ ३ सिंह प्रासाद ... ६६
छह प्रकार की कपिली .. ८३ ४ श्रीनन्दन, ५ मदिर और ६ मलयप्रासाद ६६
प्रासाद के अंडक और आभूषण ८४ ७ विमान, ८ विशाल, ६ त्रैलोक्य भूषण प्रासाद १००
शिखर के नमन का विभाग ८४ १० माहेन्द्र प्रासाद, ११ रत्नशीर्ष
आमलसार का मान सचित्र . ८४ १२ सितशृंग प्रासाद ... १०१
आमलसार के नीचे शिखर के कोणरूप ८५ १३ भूधर, १४ भुवन मडन, १५ त्रैलोक्य विजय,
सुवर्णपुरुष ( प्रासादपुरुष ) की स्थापना . . ८६ १६ क्षिति वल्लभ, १७ महीधर प्रासाद .. १०२
३१
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१८ कैलास प्रासाद ... १०३ जिनप्रासाद के मण्डप ११७
१९ नवमंगल, २० गंधमादन, २१ सर्वांगसुन्दर, मडप के पाच मान . ११८
२२ विजयानन्द प्रासाद १०३ प्रासाद और मंडपका तलदर्शन . ११८
२३ सर्वा गतिक, २४ महा भोग, २५ मेरु प्रासाद प्रासाद और मंडपोका उदय चित्र
और प्रासाद प्रदक्षिणा का फल १०४ प्रासाद के मानसे मडप का नाप ... ११९
घूमट का घटा कलश और शुकनासका मान. .. ११९
छठा अध्याय मडप के समविषमतल .... ११९
केसरी आदि, २५ प्रासादो का नाम . १०६ मुख मण्डप .. १२०
पचीस प्रासादो की शृंगसंख्या . १०६ स्तभका विस्तार मान . १२१
अष्टविभागीय तलमान १०७ आकृति से स्तभसज्ञा . १२१
दश और बारह विभागीय तलमान १०७ प्राग्रीव मण्डप १२२
चौदह और सोलह विभागीय तलमान १०७ आठ जाति के गूढ मण्डप " १२२
अठारह, बीस और बाईस विभागीय सर्वांगपूर्ण सागोपाग वाला प्राचीन देवालयका चित्र
तलमान .. १०८ आमेर के जगतशरणजी के मन्दिर का चित्र
तलो के क्रम से प्रासाद सख्या .... १०८ प्राचीन स्तभोका रेखा चित्र .... १२३
निरधार प्रासाद . ११० आठ गूढ मडपो का रेखा चित्र ... १२४
प्रासाद तलाकृति ... ११० आबू मन्दिर के मण्डप, स्तभ और तोरण का चित्र
लम्ब चौरस प्रासाद १११ गूढमडप की फालना १२५
गोल, लबगोल और अष्टास्रप्रासाद ... १११ घूमट के उदय का तीन प्रकार .. १२५
नागरप्रासाद .. १११ घूमटका न्यूनाधिक उदय फल १२६
द्राविड प्रासाद ... ११२ बारह चौकी मडप १२६
भूमिज प्रासाद .. ११२ बारह चौकी मडप का रेखा चित्र . १२७
लतिन, श्रीवत्स और नागरप्रासाद ११२ सप्तविंशति मडपका रेखा चित्र . . १२८
मेरु प्रासाद ११२ नृत्यमडप .... १२९
द्राविडजातिका गोपुर प्रासाद चित्र सप्तविंशति मण्डप .. १३०
विमान नागर प्रासाद ... ११३ अष्टास्र और षोडशाल का मान १३०
१ श्रीमेरु २ हेमशीर्षमेरु, ३ सुरवल्लभ क्षिप्त वितान का चित्र
मेरु प्रासाद .... ११३ उत्क्षिप्त वितान का चित्र
४ भुवनमण्डन, ५ रत्नशीर्ष, ६ किरणोद्भव वितान का प्रकार १३१
७ कमल हंस मेरुप्रासाद .. ११४ वितान के थर ... १३१
८ स्वर्णकेतु और ९ वृषभध्वज मेरुप्रासाद .. ११५ वितान संख्या १३२
समतल-वितान मे नृसिंहावतार का चित्र
सातवां अध्याय वर्ण और जाति के चार प्रकार के वितान १३३
मडपविधान ११७ रगभूमि . १३४
गर्भाश्रमण्डप ११७ बलाराक का स्थान १३४
३२
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बलाएक का मान . .. १३४ छाया भेद .... १५०
प्रसाद के मान से बलाएक का मान .... १३४ देवपुर, राजमहल और नगर का मान .... १५०
उत्तरग का पेटा भाग .. १३५ राजनगर मे देव स्थान ....' १५०
पाच प्रकार के बलाएक ... १३५ आश्रम और मठ .... १५१
सवरणा .. १३६ स्थान विभाग .... १५१
प्रथम सवरणा का रेखा चित्र .. १३७ प्रतिष्ठा मुहूर्त .... १५१
दूसरी संवरणा का चित्र .... १३८ प्रतिष्ठा के नक्षत्र .... १५२
पचीस सवरणा के नाम . १३६ प्रतिष्ठा मे वर्जनीय तिथि .... १५२
प्रथम पुष्पिका संवरणा . १३६ प्रतिष्ठा मण्डप .... १५२
१८ वी शताब्दी से आधुनिक समय की यज्ञ कुण्ड का मान .... १५३
सवरणा का रेखा चित्र .. १४० आहुति सख्या से कुण्ड मान .. १५३
जैसलमेर जैन मन्दिर की संवरणाचित्र दिशानुसार कुण्डो की आकृति .... १५३
कीर्ति स्तभ का चित्र मण्डल .... १५४
दूसरी नन्दिनी संवरणा . १४१ ऋत्विजसंख्या .... १५५
प्राचीन संवरणा का चित्र .... १४२ देवस्नान विधि ... १५५
आठ वां अध्याय देवशयन .... १५५
रत्नन्यास .... १५६
शिवलिंग का न्यूनाधिक मान ... १४३ धातुन्यास .... १५६
वास्तुदोष ... १४३ औषधिन्यास .... १५६
निषेधवास्तु द्रव्य . : १४३ धान्यन्यास .... १५७
शिवालय उत्थापन दोष .... १४४ आचार्य और शिल्पियो का सन्मान .... १५७
जीर्णोद्धार का पुण्य ... १४४ प्रासाद के अंगो मे देव न्यास .... १५८
जीर्णोद्धार का वास्तु स्वरूप . १४४ प्रतिष्ठत देव का प्रथम दर्शन .. १५६
दिट् मूढ दोष . : १४४ सूत्रधार पूजन .... ५६०
दिङ् मूढ का परिहार ... १४५ देवालय निर्माण का फल .... १६०
अव्यक्त प्रासाद का चालन . : १४५ सूत्रधार का आशीर्वाद .... १६०
महापुरुष स्थापित देव १४५ आचार्य पूजन . १६०
जीर्णवास्तु पातन विधि .... १४६ जिनदेवप्रतिष्ठा .. १६१
महादोष ... १४६ जलाशय प्रतिष्ठा .. १६२
शिष्टेष्ट महा दोष . १४६ जलाशय बनाने का पुण्य .... १६२
भिन्न और अभिन्न दोष १४७ वास्तु पुरुषोत्पत्ति .. १६२
दोषो के भिन्नदोष . १४७ वास्तुपुरुष के ४५ देव . १६४
व्यक्ताव्यक्त प्रासाद . १४८ वास्तुमंडल के कोने की आठ देवी .. १६६
मग्रमर्म दोष १४८ शास्त्र प्रशंसा .. १६६
अन्य दोषो का फल ... १४६ अन्तिममंगल . १६७
८ अमृतोद्भव प्रासाद . १७३
१२ पृथ्विजय प्रासाद ... १७५ (in image: पृथ्विजय, not पृथ्वीजय)
१९ वज्रक प्रासाद .... १७९
२३ पक्षिराज (गरुड) प्रासाद .. १८१ (in image: गरुड, with ड)
मेरुप्रासाद की प्रदक्षिणा का फल . १८३
९ पुष्टि वर्द्धन प्रासाद . १९० (in image: पुष्टि वर्द्ध न)
११ श्रीवल्लभप्रासाद १९१
१२ चन्द्रप्रभजिन प्रासाद " १९१ (in image: double quotes/ditto mark '"')
१५ पुष्पदतजिन प्रासाद १९३ (in image: पुष्पदतजिन)
१९ श्रे यासजिनवल्लभ प्रासाद . १९५ (in image: श्रे यास...)
३३ कु थुनाथ जिनवल्लभ प्रासाद .. २०१ (in image: कु थुनाथ...)
Everything is verified and ready.३३
परिशिष्ट नं० १
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केसरी आदि २५ प्रसादो का नाम .... १६८
१ केसरी प्रासाद ... १६९
२ सर्वतोभद्र प्रासाद .... १७०
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