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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 278 में से

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पृष्ठ 25

चौड़ाई मे आधी रखनी चाहिए। इस करंट या छत मे नीचे की ओर जो कई थर बनाये जाने है उन्हे दर्दरी
कहा जाता था, गूमट के भीतरी भाग को वितान और ऊपरी भाग को सम्बरण कहते हैं। वितान में दर्दरी या
थरो की सख्या विषम रखने का विधान है।
इसके अनंतर मंदिर के द्वार का सविस्तर वर्णन है (३।३७-६६)। द्वार के चार भाग होते हैं
अर्थात नीचे देहली या उदुम्बर, दो पार्श्व स्तम्भ और उनके ऊपर उत्तरंग या सिरदल । इन चारो को ही
शिल्पी अनेक अलंकरणो मे युक्त करने का प्रयत्न करते थे। देवगढ़ के दशावतार मंदिर का अलंकृत द्वार एक
ऐसी कृति है जिसकी साज-सज्जा ने शिल्पियों ने अपने कौशल की पराकाष्ठा दिखाई है। प्रायः गुप्त युग में उसी
प्रकार के द्वार बनते रहें। शनैः शनैः मध्यकालीन मंदिरो में द्वार निर्माण कला में कुछ विकास और परिवर्तन
भी हुआ । मंडन के अनुसार उदुम्बर या देहली की चौड़ाई के तीन भाग करके बीच में मन्दारक और दोनो
पाश्र्वों मे ग्रास या सिंहमुख बनाने चाहिए। मन्दारक के लिए प्राचीन शब्द सन्तानक भी था (अंग्रेजी फेस्टून) ।
गोल सन्तानक मे पद्मपत्रो से युक्त मृणाल की आकृति उकेरी जाती थी। ग्रास या सिंह मुख को कीर्तिवक्त्र
या कीर्तिमुख भी कहते थे । देहली के दोनो ओर के पार्श्व स्तम्भो के नीचे तलरूपक (हिन्दी-तलकड़ा) नाम
के दो अलकरण बनाये जाते हैं। तलकड़ो के बीच मे देहली के सामने की ओर बीच के दो भागों मे अर्धचन्द्र
और उसके दोनो ओर एक-एक गगारा बनाया जाता है। गगारी के पास मे शंखो की और पद्मपत्र की आकृति
उत्कीर्ण की जाती हैं। द्वार की यह विशेषता गुप्त युग ते ही आरम्भ हो गई थी, जैसा कालिदास ने मेघदूत
मे वर्णन किया है (द्वारोपान्ते लिखितवपुषौ शंखपद्मौ च दृष्ट्वा, उत्तर मेघ १७) । गगारक या गगारा शब्द
की व्युत्पत्ति स्पष्ट नही है। यहां पृष्ठ ५६ और वास्तुसार मे पृ० १४० पर गगारक का चित्र दिया गया है।
द्वार की ऊंचाई से उसकी चौड़ाई आधी होनी चाहिए। और यदि चौड़ाई मे एक कला या सोलहवा अंश बढ़ा
दिया जाय तो द्वार की शोभा कुछ अधिक हो जाती है, द्वार के उत्तरग या सिरदल भाग मे उस देव की मूर्ति
बनानी चाहिए जिसकी गर्भगृह मे प्रतिष्ठा हो। इस नियम का पालन प्रायः सभी मंदिरो मे पाया जाता है।
इस मूर्ति को ललाट-विम्ब भी कहते थे। द्वार के दोनो पार्श्व स्तम्भो में कई फालना या भाग बनाये जाते थे जिन्हें
सस्कृत मे शाखा कहा गया है। इस प्रकार एक शाख, त्रिगाख, पंच शाख, सप्त शाख, और नव शाख, तक के
पार्श्व स्तम्भ युक्त द्वार बनाये जाते थे। इन्ही के लिए तिसाही, पंचसाही आदि शब्द हिन्दी में अभी तक
प्रचलित है। सूत्रधार मंडन ने एक नियम यह बताया है कि गर्भगृह की दीवार मे जितनी फालना या अंग
बनाये जाय उतनी ही द्वार के पार्श्व स्तम्भ मे शाखा रखनी चाहिए (शाखाः स्युरंग तुल्यकाः ३।५६) । द्वार
स्तम्भ की सजावट के लिए कई प्रकार के अलंकरण प्रयुक्त किये जाते थे। उनमे रूप या स्त्री पुरुषों की मूर्तियां
मुख्य थी। जिस भाग मे ये आकृतियां उकेरी जाती थी उसे रूप स्तम्भ या रूप शाखा कहते थे। पुष्प संज्ञक
और स्त्री सज्ञक शाखाओ का उल्लेख मण्डन ने किया हैं। इस प्रकार की शाखाये गुप्तकालीन मंदिर द्वारो पर
भी मीननी हैं। अलकरणो के अनुसार इन शाखाओ के और नाम भी मिलते हैं जैसे-पत्रशाखा, सिंह शाखा,
गन्धर्व शाखा, रूप शाखा आदि । खल्व शाखा पर जो अलंकरण बनाया जाता था वह मटर आदि के बेलो
मे रहते हुए गोल प्रतानो के सदृश होता था। आबू के विमलवसही आदि मंदिरो मे तथा अन्यत्र भी इसके
उदाहरण हैं। खल्व शब्द प्राचीन था और उसका अर्थ फलिनीलता या मटर आदि की वेल के लिए प्रयुक्त
होता था।
प्रासाद मडन के चौथे अध्याय मे प्रारम्भ मे प्रतिमा की ऊंचाई बताते हुए फिर शिखर निर्माण
का ब्योरे दार वर्णन किया गया है। देव प्रासादो के निर्माण मे शिखरो का महत्वपूर्ण स्थान था । मंदिर के
वास्तु मे नाना प्रकार के शिखरो का विकास देखा जाता है। शिखरों की अनेक जातियां शिल्प ग्रंथों मे कही