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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 17

( १८६ ) अथर्ववेदभाष्ये
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इन सब मूर्तियों की रचना रूप मण्डन ग्रन्थ में वर्णित लक्षणों के अनुसार यथार्थतः हुई है। स्पष्ट है
कि सूत्रधार मण्डन शास्त्र और प्रयोग दोनों के निपुण अभ्यासी थे। शिल्प शास्त्र में वे जिन लक्षणों का
उल्लेख करते थे उन्हीं के अनुसार स्वयं या अपने शिष्यों द्वारा देव मूर्तियों की रचना भी कराते जाते थे।
किसी समय अपने देश में सूत्रधार मण्डन जैसे सहस्रों की संख्या में लब्ध कीर्ति स्थपति और
वास्तु विद्याचार्य हुए। एलोरा के कैलाश मन्दिर, खजुराहो के कंदरिया महादेव, भुवनेश्वर के लिङ्गराज,
तंजोर के बृहदीश्वर, कोणार्क के सूर्यदेउल आदि एक से एक भव्य देव प्रासादों के निर्माण का श्रेय जिन
शिल्पाचार्यों की कल्पना में स्फूरित हुआ और जिन्होंने अपने कार्य कौशल से उन्हें मूर्त रूप दिया वे सचमुच
धन्य थे और उन्होंने ही भारतीय संस्कृति के मार्ग-दर्शन का शाश्वत कार्य किया।
उन्हीं की परम्परा में सूत्रधार मण्डन भी थे। देव-प्रासाद एवं नृप मन्दिर आदि के निर्माण कर्त्ता
सूत्रधारों का कितना अधिक सम्मानित स्थान था यह मण्डन के निम्न लिखित श्लोक से ज्ञात होता है—
"इत्यनन्तरतः कुर्यात् सूत्रधारस्य पूजनम् ।
भूवित्तवस्त्रालङ्कारै-र्गोमहिष्यश्ववाहनैः ॥
अन्येषां शिल्पिनां पूजा कर्त्तव्या कर्मकारिणाम् ।
स्वाधिकारानुसारेण वस्त्रताम्बूलभोजनैः ।।
काष्ठपाषाणनिर्माण-कारिणो यत्र मन्दिरे ।
भुञ्जतेऽसौ तत्र सौख्यं शङ्करस्त्रिदशैः सह ।।
पुण्यं प्रासादजं स्वामी प्रार्थयेत्सूत्रधारतः ।
सूत्रधारो वदेन् स्वामिन्नक्षयं भवतान्नघ ।।"
प्रासादमण्डनः ८. ८२-८५
अर्थात् निर्माण की समाप्ति के अनन्तर सूत्रधार का पूजन करना चाहिये और अपनी शक्ति के अनु-
सार भूमि, सुवर्ण, वस्त्र, अलङ्कार के द्वारा प्रधान सूत्रधार एवं उनके सहयोगी अन्य शिल्पियों का सम्मान
करना आवश्यक है।
जिस मन्दिर में शिला या काष्ठ द्वारा निर्माण कार्य करने वाले शिल्पी भोजन करते हैं वहीं
भगवान् शंकर देवों के साथ विराजते हैं। प्रासाद या देव मन्दिर के निर्माण मे जो पुण्य है उस पुण्य की
प्राप्ति के लिये सूत्रधार से प्रार्थना करनी चाहिए, 'हे सूत्रधार, तुम्हारी कृपा से प्रासाद निर्माण का पुण्य
मुझे प्राप्त हो।' इसके उत्तर में सूत्रधार कहे—हे स्वामिन् ! सब प्रकार आप की अक्षय वृद्धि हो।
सूत्रधार के प्रति सम्मान प्रदर्शन की यह प्रथा लोक में आजतक जीवित है, जब सूत्रधार शिल्पी
नूतन गृह का द्वार रोककर स्वामी से कहता है 'आजतक यह गृह मेरा था, अब आज से यह तुम्हारा हुआ।'
उसके अनन्तर गृह स्वामी सूत्रधार को इष्ट-वस्तु देकर प्रसन्न करता है और फिर गृह में प्रवेश करता है।
सूत्रधार मण्डन का प्रासाद-मण्डन ग्रन्थ भारतीय शिल्प ग्रन्थों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।
मण्डन ने आठ अध्यायों में देव-प्रासादों के निर्माण का स्पष्ट और विस्तृत वर्णन किया है। पहले अध्याय
में विश्वकर्मा को सृष्टि का प्रथम सूत्रधार कहा गया है। गृहों के विन्यास और प्रवेश की जो धार्मिक विधि,