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सर्वकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १६३
ऊपर के श्रीचन्द्रप्रासाद की कोणी और नन्दी के ऊपर एक २ तिलक चढाने से सुविधि-
जिनवल्लभ ऐसा हितुराज नाम का प्रासाद होता है ॥४५॥
शृंगसंख्या पूर्ववत् २५३ । तिलक-कोणी पर ८, प्रतिकर्ण पर ८, नन्दी पर ८,
कुल २४ ।
विभक्ति नवमी ।
१५-पुष्पदंतप्रासाद—
चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चतुर्विंशतिभाजिते ।
भद्रार्थं त्रिपदं वत्स ! रथौ कर्णश्च तत्समः ॥४६॥
निर्गमस्तत्प्रमाणेन सर्वशोभासमन्वितम् ।
रथे कर्णे तथा भद्रे द्वे शृङ्गे तिलकं न्यसेत् ॥४७॥
पुष्पदन्तस्तदा नाम सुविधिजिनवल्लभः ।
कार्यः सुविधिनाथाय धर्मार्थकाममोक्षदः ॥४८॥
इति पुष्पदंतप्रासादः ॥१५॥
प्रासाद की समचोरस भूमि का चौवीस भाग करे, इन में से कोण, प्रतिरथ, उपरथ
और भद्रार्थ, ये सब तीन तीन भाग का रक्खे । और निर्गम मे ये सब समदल रक्खे । भद्र के
ऊपर दो उरुशृंग चढावे । कोना, प्रतिरथ और उपरथ ये तीनो के ऊपर दो दो शृंग और
एक एक तिलक चढाने से पुष्पदंत नाम का प्रासाद होता है। यह सुविधि जिन को वल्लभ
है । ऐसा प्रासाद बनाने से धर्म अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥४६ से ४८॥
शृंग संख्या-कोणो ८, प्रतिकर्ण १६ उपरथे १६, भद्रे ८ एक शिखर कुल ४९ शृंग ।
तिलक संख्या-कोणे ४ प्रतिकर्णे ८, उपरथे ८ कुल २० तिलक ।
विभक्ति दसवीं ।
१६-शीतलजिनप्रासाद—
चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चतुर्विंशतिभाजिते ।
कर्णश्चैव समाख्यात-श्चतुर्भागश्च विस्तृतः ॥४९॥
प्रतिरथस्त्रयभागो भद्रार्थं भूतभागिकम् ।
रथे कर्णे च शृङ्गैकं तदूर्ध्वं तिलकं द्वयम् ॥५०॥
प्रा० २५