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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 243

१६४ प्रासादमण्डने
द्वादश उरःशृङ्गाणि प्रत्यङ्गानि ततोऽष्टभिः ।
शीतलश्च तदा नाम प्रासादो जिनवल्लभः ॥५१॥
इति शीतलजिनप्रासादः ॥१६॥
प्रासाद की सम चौरस भूमिका चौबीस भाग करें। उनमें से चार भाग का कोण,
तीन भाग का प्रतिरथ और पाच भाग का भद्रार्ध बनावें । कोण और प्रतिकर्ण के ऊपर एक
एक शृंग और दो दो तिलक, चारों भद्र के ऊपर कुल बारह उरुशृंग, तथा आठ प्रत्यंग
चढ़ावे । ऐसा शीतल नाम का प्रासाद शीतल जिनको प्रिय है ॥४६ से ५१॥
शृंगसंख्या-कोणे ४, प्रतिकर्णे ८, भद्रे १२, प्रत्यंग ८, एक शिखर, कुल ३३ शृंग।
तिलक-कोणे ८, प्रतिकर्णे १६, कुल २४ तिलक ।
१७ कीर्त्तिदायकप्रासाद-
तद्रूपे तत्प्रमाणे च कर्त्तव्यः पूर्वमानतः १।
कर्णोर्ध्वे च द्वयं शृङ्गे प्रासादः कीर्त्तिदायकः ॥५२॥
इति कीर्त्तिदायकप्रासादः ॥१७॥
ऊपर के शीतल जिन प्रासाद के कोणे के ऊपर का एक तिलक कम करके उसके बदले
शृंग चढ़ाने से कीर्त्तिदायक नाम का प्रासाद होता है ॥५२॥
शृंगसंख्या-कोणे ८, प्रतिकर्णे ८, भद्रे १२, प्रत्यंग ८, एक शिखर, कुल ३७ शृंग ।
तिलक-कोणे ४, प्रतिकर्णे १६ ।
१८-मनोहरप्रासाद--
'कर्णे सप्त प्रतिकर्णे पञ्च मनोहरदायकः ।
तन्मानं च प्रकर्तव्यः स्वरूपो लक्षणान्वितः ॥५३॥
इति मनोहरप्रासादः ॥१८॥
ऊपर के प्रासाद के अनुसार मान और स्वरूप जानें। विशेष यह है कि-कोणे के ऊपर
एक केसरी क्रम और दो श्रीवत्सशृंग, तथा प्रतिकर्ण के ऊपर एक केसरी क्रम चढ़ाने से
मनोहर नाम का प्रासाद होता है ॥५३॥
शृगसंख्या-कोणे २८, प्रतिकर्णे ४०, भद्रे १२, प्रत्यग ८, एक शिखर, कुल ८९ शृंग ।
१. 'कर्ण सप्तश प्रतिकर्णे प्रासादश्च मनोहरः ।' पाठान्तरे ।