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सर्वकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 278 में से

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पृष्ठ 241

१६२ प्रासादमण्डने
श्रीवत्सं केसरीं चैव सर्वतोभद्रमेव च ।
कर्णे चैव प्रदातव्यं रथे चैवं तु तत्समम् ॥४१॥
नन्दिका कर्णिकायां च द्वे द्वे शृङ्गं च विन्यसेत् ।
भद्रे चैवोरुश्चत्वारि प्रत्यङ्गं जिनमेव च ॥४२॥
शीतलो नाम विज्ञेयः सुश्रियं च विवर्धकः ।
चन्द्रप्रभस्य प्रासादो विज्ञेयश्च सुखावहः ॥४३॥
इति चन्द्रप्रभवल्लभः शीतलप्रासादः ॥१२॥
प्रासाद की समचोरस भूमि का बत्तीस भाग करें। उन मे से पांच भाग का कोण, पांच
भाग का प्रतिकर्ण, चार भाग का भद्रार्ध, कोणी और नन्दिका एक एक भाग की रक्खें। ये
सब अंग समचोरस बनावें। कोण और उपरथ के ऊपर श्रीवत्स, केसरी और सर्वतोभद्र शृंग
चढ़ावें। कोणी और नन्दिका के ऊपर दो दो शृं वत्सशृंग, भद्र के ऊपर चार चार उरुशृंग
चढ़ावें और चोबीस प्रत्यंग चढ़ावे। ऐसा शीतल नाम का प्रासाद लक्ष्मी को बढाने वाला है
और चन्द्रप्रभजिन को प्रिय है और सुख कारक है ॥३६ से ४३॥
शृंगसंख्या-कोणे ६० प्रतिकर्णे १२०, कोणीपर १६, नंदी पर १६, भद्रे १६, प्रत्यंग
२४, एक शिखर, कुल २५३ शृंग।
१३-श्रीचन्द्र प्रासाद--
तद्रूपे च प्रकर्त्तव्यो रथोर्ध्वे तिलकं न्यसेत् ।
श्रीचन्द्रो नाम विज्ञेयः सुरराजसुखावहः ॥४४॥
इति श्रीचन्द्रप्रासादः ॥१३॥
शीतलप्रासाद के प्रतिकर्ण के ऊपर एक एक तिलक भी चढ़ावें तो श्रीचंद्र नाम का
प्रासाद होता है, यह इन्द्र को सुखकारक है ॥४४॥
शृंग संख्या पूर्ववत् २५३ और तिलक ८ प्रतिकर्णे ।
१४-हितुराजप्रासाद--
नन्दिका कर्णिकायां च ऊर्ध्वे तिलकं शोभनम् ।
हितुराजस्तदा नाम सुविधिजिनवल्लभः ॥४५॥
इति सुविधिजिनवल्लभः हितुराजप्रासादः ॥१४॥