प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभारतवर्ष में लिखने के प्रचार की प्राचीनता. ७
'लिपि' शब्द (जिनका अर्थ 'लिखना' है) और 'लिपिकर' (लिखने वाला) तथा 'यवनानी'
(जिसका अर्थ कात्यायन और पतंजलि ने 'यवनों की लिपि' किया है) शब्द बनाने के नियम
दिये हैं और 'स्वरित' के चिह्न तथा 'ग्रंथ' (पुस्तक) का भी उल्लेख किया है. उसी पुस्तक से
नामक ग्रंथ में लिखा है कि 'संग्रह' के, जो 'वाक्यपदीय' के टीकाकार पुण्यराज के लेखानुसार एक लाख श्लोक का था,
अस्त हो जाने पर पतंजलि ने 'महाभाष्य' लिखकर 'संग्रह' के आशय का संक्षेप किया. पतंजलि का समय ई.स. पूर्व
की दूसरी शताब्दी निश्चित है. ऐसी दशा में पाणिनि और पतंजलि के बीच कई शताब्दियों का अन्तर होना चाहिये.
१. दिवाविभानिश्शा लिपिलिबिवलि (३.२.२१).
२. इन्द्रवरुणभव यवयवन (४.१.४६).
३. यवनाल्लिप्याम् (४.१.४६ पर वार्तिक ३).
४. यवनाल्लिप्यामिति वक्तव्यम् यवनानी लिपिः (४.१.४६ पर भाष्य).
५. स्वरितेनाधिकारः (१.३.११).
एक ही बात वार बार दोहराना न पड़े इस लिये पाणिनि ने कुछ बातें शीर्षक की तरह स्थान स्थान पर लिख कर नियम
कर दिया है कि इसके आगे यह सिलसिला चलेगा. इसको अधिकार कहते हैं और यह अधिकार स्वरित चिह्न से जतलाया
गया है. यह स्वरित वेद के उच्चारण के उदात्त, अनुदात्त, स्वरित की तरह उच्चारण का ऊंचा या नीचा स्वर नहीं किंतु वर्ण
पर का लिखित चिह्न है (स्वरितो नाम स्वरविशेषो वर्णधर्मो न स्वरधर्मः पा. १.३.११ पर काशिका) क्योंकि अष्टाध्यायी का सूत्र-
पाठ एकश्रुति या एकस्वर का पाठ माना जाता है, उसमें उदात्त, अनुदात्त, स्वरित का भेद नहीं हो सकता (एकश्रुत्या सूत्राणां
पाठात् पतंजलि के महाभाष्य के पहले आह्निक पर कैयट की टीका). पतंजलि ने इस सूत्र (१.३.११) के व्याख्यान में यह
शंका उठाई है कि स्वरित से हम यह नहीं जान सकते कि यह अधिकार कहां तक जायेगा और इस शंका पर कात्यायन का
समाधान लिखा है कि जितने सूत्रों तक अधिकार चलाना हो उतनी ही संख्या का वर्ण उसपर लिख दिया जाय (यावतिथो-
ऽलनुबन्ध्यातावतो योगानिति वचनात्सिद्धम्) कैयट ने इसपर दृष्टांत दिया है कि पा. सू. ५.१.३० पर 'इ' अनुबंध लगा देने से
यह जाना जायगा कि यह अधिकार दो सूत्रों तक चलेगा. यों शिवसूत्रों में जो वर्णों का क्रम है उसके स्थानीय मान से
अ = १, इ = २, उ = ३. इत्यादि गिनती के संकेत पाणिनि के स्वरित चिह्न में होना कात्यायन ने माना है. आगे चल कर
यह भी कहा है कि जहां अधिकार अधिक संख्या के सूत्रों में जाने वाला है और अल् (= वर्ण) कम हैं वहां अधिकार
जतलाने वाले सूत्र में पाणिनि ने 'प्राक्' (अमुक शब्द या सूत्र से पहले पहले) लगाया है (पतंजलि - अथेदानीं यत्राल्पोयां-
सोऽलः भूयसश्च योगानधिकारोऽनुवर्तते कथं तत्र कर्तव्यम् ! कात्यायन - भूयसि प्राग्वचनम्. पतंजलि - भूयसि प्राग्वचनं कर्तव्यम्
भूयसि प्राग्सुत इति वक्तव्यम्). जहां पर 'प्राक्' शब्द काम में नहीं लिया है और जहां पर सूत्रों की संख्या अल् (वर्ण) से अधिक
है (जैसे ३.१.६१ का अधिकार ५४१ सूत्रों पर है) वहां कोई और स्वरित चिह्न काम में आता होगा. इसीके अनुसार पा-
णिनि ने जहां यह अधिकार किया है कि 'रीश्वर' के पहले पहले सब निपात कहावेंगे (प्रागरीश्वराग्निपाताः पा. १.४.५६) वहां
शुद्ध 'ईश्वर' शब्द काम में न लाकर कृत्रिम 'रीश्वर' काम में लिया है क्योंकि रीश्वर शब्द जहां आता है वहीं यह अधिकार
समाप्त होता है (अधिरोश्वरे १.४.६७), आगे जहां 'ईश्वर' शब्द आया है (ईश्वरे तोसुनकसुनौ ३.४.१३) वहां तक यह अ-
धिकार नहीं चलता. यों 'रीश्वर' शब्द काम में लाने से दो ही बातें प्रकट होती हैं, या तो पाणिनि ने अपने आगे के सूत्र
तोते की तरह रट लिये थे इससे 'रीश्वर' पद का प्रयोग किया, या उसने अपना व्याकरण लिख कर तैयार किया जिस-
की लिखित प्रति के सहारे अधिकार सूत्र के शब्द स्थिर किये. पाठकों से यह कहना व्यर्थ है कि इन दोनों अनुमानों में से
कौन सा मानना उचित है.
ऐसे ही पाणिनि ने अपने सूत्रों में अपने ही बनाये धातुपाठ में से 'फण आदि सात धातुओं को' (फणां च सप्तानां
६.४.१२५) 'जक्षिति आदि ६ धातु' (जक्षित्यादयः षट् ६.१.६) आदि उल्लेख किया है. वहां यह मानना उचित है कि पाणिनि ने
सूत्र बनाने के पहिले धातुपाठ रट रक्खा था, या यह कि धातुपाठ की लिखित पुस्तक उसके सामने थी ?
६. 'ग्रंथ' शब्द पाणिनि ने रचित पुस्तक के अर्थ में लिया है (समुदाह्यो ग्रन्थेोऽग्रन्थे १.३.७५; अधिकृत्य कृते ग्रंथे ४.३.८७;
कृते ग्रन्थे ४.३.११६ आदि). वेद की शाखाओं के लिये, जो ऋषियों से कही गई हैं (जिन्हें आस्तिक हिन्दू ऋषियों की बनाई हुई
नहीं मानते) 'प्रोक्त' शब्द काम में लाया गया है, 'कृत' नहीं (तेन प्रोक्तम् ४.३.१०१); और 'प्रोक्त' ग्रंथों में 'पुराणप्रोक्त'
शब्द के प्रयोग से दिखाया है कि कुछ वेद के ब्राह्मण पाणिनि के पहिले के थे और कुछ उन्हीं के काल के (पुराणप्रोक्तेषु ब्राह्मण-
कल्पेषु ४.३.१०५; वार्तिक 'तुल्यकालत्वात्'), किंतु पाराशर्य (पराशर के पुत्र) और कर्मंद के 'भिक्षुसूत्र' तथा शिलालि और
कृशाश्व के 'नटसूत्रों' को न मालूम क्यों 'प्रोक्त' में गिनाया है. जो हो, 'भिक्षुशास्त्र' और 'नाट्यशास्त्र' के दो दो सूत्र-
ग्रंथ उस समय विद्यमान थे (पाराशर्यशिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयोः । कर्मन्दकृशाश्वादिनिः ४.३.११०-११). नवीन विषय पर पहिले
पहिल बनाये हुए ग्रंथ को 'उपज्ञात' कहा है (उपज्ञाते ४.३.११५; उपज्ञोपक्रमं तदाद्याचिख्यासायां २.४.२१). किसी विषय
को लेकर (अधिकृत्य) बसे हुए ग्रंथों में 'शिशुकुन्दीय' (बच्चों के रोने के संबंध का ग्रंथ), 'यमसभीय' (यम की सभा के
विषय का ग्रंथ), 'दो नाम मिला कर बना ग्रंथ' (जैसे 'अग्निकाश्यपीय' - यह नाम पाणिनि ने नहीं दिया) और 'इंद्र-