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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 318 में से

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पृष्ठ 35

६ प्राचीनलिपिमाला.
'महावग्ग' (विनय पिटक का एक ग्रन्थ) में 'लेखा' (लिखना), 'गणना' (पहाड़े) और 'रूप'
(हिसाब) की पढ़ाई का १, जातकों में पाठशालाओं तथा विद्यार्थियों के लिखने के 'फलक' (लकड़ी की
पाटी) का २ और 'ललितविस्तर' में बुद्ध का लिपिशाला में जाकर अध्यापक विश्वामित्र से चंदन की पाटी
पर सोने के वर्णक ३ (कलम) से लिखना सीखने का वृत्तान्त मिलता है ४.
ऊपर उद्धृत किये हुए वचन ई.स. पूर्व की छठी शताब्दी के आस पास की दशा के बोधक हैं और
उनसे पाया जाता है कि उस समय लिखने का प्रचार एक साधारण बात थी; स्त्रियां तथा बालक भी
लिखना जानते थे और प्रारंभिक पाठशालाओं की पढ़ाई ठीक वैसी ही थी जैसी कि अब तक हमारे यहां
की देहाती खानगी पाठशालाओं की है, जिनमें लिखना, पट्टीपहाड़े और हिसाब पढ़ाये जाते हैं. जब
हमारे यहां की प्रारंभिक पढ़ाई का ढंग ई. स. पूर्व की छठी शताब्दी के आसपास से अब तक, अर्थात्
क़रीब २५०० वर्ष से, बिना कुछ भी परिवर्त्तन के ज्यों का त्यों चला आया है तब आश्चर्य ही क्या है कि बुद्ध
के समय भी बहुत पूर्ववर्ती काल से वैसा ही चला आता रहा हो.
महाभारत ५, स्मृति (धर्मशास्त्र) ६, कौटिल्य के अर्थशास्त्र ७, वात्स्यायन के कामसूत्र ८ आदि
ब्राह्मणों के ग्रंथ. ग्रंथों में, जिनमें व्यावहारिक विषयों का विशेष रूप से वर्णन मिलता है, 'लिखना'
और 'लिखित पुस्तकों' का उल्लेख बहुत कुछ मिलता है.
व्याकरण. पाणिनि ९ ने 'अष्टाध्यायी' नामक व्याकरण का ग्रन्थ लिखा, जिसमें 'लिपि' और
१. उपालि के मातापिता ने राजगृह में विचार किया कि बच्चे को क्या काम सिखावें. उन्होंने निश्चय किया कि
यद्यपि लेखा, गणना और रूप सिखाने से भविष्य में उसको लाभ होगा परंतु इन तीनों से क्रमशः अंगुली, छाती और
आंखों को क्लेश होगा, इससे उन्होंने उसे बौद्ध भिक्खु (श्रमण) बनाना निश्चय किया क्योंकि श्रमण सदाचारी होते हैं, खाने
पीने को अच्छा मिलता है और सोने को अच्छे बिछौने (महावग्ग १. ४६; भिक्खूपाचित्तिय ६५. १).
कलिंग के राजा खारवेल के हाथीगुंफा के लेख में उक्त राजा का लेख, रूप और गणना सीखना लिखा है
(ततो लेखरूपगणना व्यवहारविधिविशारदेन सव्वविज्जावदातेन.......): 'हाथीगुंफा ऐंड थ्री अदर इन्स्क्रिप्शन्स,' भगवानलाल
इंद्रजी संपादित, पृ. २२.
२. गुलाम कटाहक सेठ के पुत्र का फलक उठा कर उसके साथ पाठशाला जाया करता था वहीं उसने लिखना पढ़ना
सीखा (कटाहक जातक).
३. राजपूताना में अब भी लकड़ी की गोल तीखे मुंह की कलम को, जिससे बच्चे पट्टी पर सुरखी बिछा कर अक्षर
बनाना सीखते हैं, बरथा या बरतना कहते हैं.
४. ललितविस्तर, अध्याय १० (अंगरेज़ी अनुवाद, पृ. १८२-५).
५. महाभारत के कर्ता व्यास ने स्वयं गणेश को ही उक्त पुस्तक का लेखक बनाया है (आदिपर्व, १. ११२),
६. वसिष्ठधर्मसूत्र (१६. १०, १४-१५) में न्यायकर्त्ता के पास लिखित प्रमाण पेश करना और मनुस्मृति (८. १६८) में
ज़बरन लिखवाये हुए लेख को अप्रमाणित करना लिखा है. सारी स्मृतियों में जहां जहां लेख का विषय है उसकी परिसंख्या
नहीं हो सकती, केवल दो उदाहरण दिये गये हैं.
७. अर्थशास्त्र में बहुत जगह लिखने का वर्णन है, जिसमें से थोड़े से उदाहरण यहां दिये जाते हैं. वृत्तचौलकर्मा
लिपिं संख्यानं चोपयुञ्जीत (१.५.२); संज्ञांलिपिमिश्चारसंचारं कुर्युः (१.१२.८); पत्रचे संचिपपरिपदा पत्रसंप्रेषणेन मंत्रयेत (१.१५.६); अमात्यसम्पदोपेतः
सर्वसमयविदाशु ग्रन्थधावंचरो लेखवाचनसमर्थो लेखकः स्यात् (२.६.२८). यह पिछला अवतरण शासनाधिकार में से है जिसमें
राजशासनों के लिखने का ही विषय है. अर्थशास्त्र का कर्ता कौटिल्य मौर्य चंद्रगुप्त का मंत्री विष्णुगुप्त चाणक्य ही था.
८. चौंसठ कलाओं में 'पुस्तकवाचनम' (पृ. ३३); घर में रखने की सामग्री में 'यः कचित्पुस्तकः' (पृ. ४५); भार्या के प्रतिदिन
के कामों में आमद और खर्च का हिसाब रखना 'दैवसिकायव्ययपिण्डीकरणम्' (पृ. २३८).
९. मैक्समुलर, बूलर आदि कितने एक यूरोपियन विद्वान् पाणिनि को ई. स. पूर्व की चौथी शताब्दी में होना मानते
हैं और पाणिनीय व्याकरण के अद्वितीय ज्ञाता गोल्डस्टकर ने पाणिनि को बुद्ध से पूर्व होना माना है. इनमें से गोल्ड-
स्टकर का लिखना ठीक जचता है; क्योंकि पाणिनि से बहुत समय पीछे कात्यायन ने उसके सूत्रों पर 'वार्तिक' लिखे.
इसका प्रमाण यह है कि वार्तिकों में न केवल पाणिनि के छोड़े हुए प्रयोगों और अर्थों का स्पष्टीकरण है वरन बहुत से नये
प्रयोगों और नये अर्थों का भी विचार है, जो पाणिनि के पीछे व्यवहार में आये होंगे. पाणिनि से [कमसे कम तीन पीढ़ी]
पीछे वात्स्यायन व्याडि ने पाणिनि के सूत्रों पर 'संग्रह' नामक व्याख्यानरूप ग्रंथ रचा. भर्तृहरि ने अपने 'वाक्यपदीय'