प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 57, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विधाभक्ति
जानन्तु तत्र बीजं हरिभक्त्या ज्ञानिनो ये स्युः।
मूर्त्तं चैवामूर्त्तं द्वे एव ब्रह्मणो रूपे ॥१६९॥
इत्युपनिषत्तयोर्वा द्वौ भक्तौ भगवदुपदिष्टौ ।
क्लेशादक्लेशाद्वा मुक्तिः स्यादेतयोर्मध्ये ॥१७०॥
जो लोग हरि-भक्तिसे ज्ञानी हुए हैं, वे अपने ज्ञानका बीज
(कारण) समझ लें। 'मूर्त्त (साकार) और अमूर्त्त (निराकार) दोनों
ही ब्रह्मके रूप हैं'—ऐसा उपनिषद् कहते हैं; और भगवान्ने
भी उन दोनों रूपोंके [ व्यक्तोपासक तथा अव्यक्तोपासक-भेदसे ]
दो प्रकारके भक्त बताये हैं। इनमेंसे एक (अव्यक्तोपासक) को
क्लेशसे और दूसरे (व्यक्तोपासक) को सुगमतासे मुक्ति मिलती है।
स्थूला सूक्ष्मा चेति द्वेधा हरिभक्तिरुद्दिष्टा ।
प्रारम्भे स्थूला स्यात्सूक्ष्मा तस्याः सकाशाच्च॥१७१॥
भगवान्की भक्ति स्थूल और सूक्ष्म दो प्रकारकी कही गयी
है; उनमें पहले स्थूल-भक्ति होती है और फिर उसीमेंसे सूक्ष्म-
भक्तिका उदय होता है।
स्वाश्रमधर्माचरणं कृष्णप्रतिमार्चनोत्सवो नित्यम् ।
विविधोपचारकरणैर्हरिदासैः सङ्गमः शश्वत् ॥१७२॥
कृष्णकथासंश्रवणे महोत्सवः सत्यवादश्च ।
परयुवतौ द्रविणे वा परापवादे पराङ्मुखता ॥१७३॥
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