प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 35, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंआत्मसिद्धि
मनसो यदि वा विषयस्तद्युगपत्किं न जानाति ।
तस्य पराधीनत्वाद्यतः प्रमादस्य कस्त्राता ॥६३॥
यदि इन्हें मनका विषय कहें तो वह सबका एक साथ ही
अनुभव क्यों नहीं कर लेता ? वास्तवमें वह तो पराधीन है क्योंकि
यदि उसे स्वतन्त्र माना जाय तो उसको प्रमादसे कौन बचा
सकता था ?
गाढध्वान्तगृहान्ततः क्षितितले दीपं निधायोज्ज्वलं
पञ्चच्छिद्रमधोमुखं हि कलशं तस्योपरि स्थापयेत् ।
तद्वाह्ये परितोऽनुरन्ध्रममलां वीणां च कस्तूरिकां
सद्रत्नं व्यजनं न्यसेच्च कलशाच्छिद्राध्वनिर्गच्छता ॥
तेजोंशेन पृथक्पदार्थनिवहज्ञानं हि यज्जायते
तद्रन्ध्रैः कलशेन वा किमु मृदो भाण्डेन तैलेन वा ।
किं सूत्रेण न चैतदस्ति रुचिरं प्रत्यक्षबाधादतो
दीपज्योतिरिहैकमेव शरणं देहे तथात्मा स्थितः ॥६४॥
एक गाढ़ अन्धकारमय घरके भीतर पृथ्वीपर एक स्फुट-
प्रकाशमय दीपक रक्खे, उसके ऊपर एक पाँच छिद्रोंवाला घड़ा
नीचेको मुख करके स्थापित करे । उसके बाहर प्रत्येक छिद्रके
सामने क्रमशः सुन्दर वीणा, कस्तूरी, रत्न और पङ्खा रक्खे ।
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