प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 27, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंमनोनिग्रह
मनोनिग्रह
स्वीयोद्गमतोयवहा सागरमुपयाति नीचमार्गेण ।
सा स्वीयोद्गम एव स्थिरा सती किं न याति वार्धित्त्वम् ६५
अपने उद्गम-स्थान (निकासकी जगह) से निकलकर नीचे
मार्गसे बहनेवाली नदी समुद्रमें जा मिलती है, वह यदि उद्गम
स्थानपर स्थिर रहती तो क्या बढ़कर स्वयं ही समुद्र न बन जाती ?
एवं मनः स्वहेतुं विचारयत्सुस्थिरं भवेदन्तः ।
न बहिर्वोदेति तदा किं नात्मत्वं स्वयं याति ॥६६॥
इसी प्रकार यदि मन भी अपने कारणका विचार करता हुआ
अपने आपमें ही स्थिर हो जाय और बहिर्विषयोंमें न जाय तो
क्या वह स्वयं ही आत्मा न हो जायगा ?
वर्षास्वम्भःप्रचयात्कूपे गुरुनिर्झरे पयः क्षारम् ।
ग्रीष्मेणैव तु शुष्के माधुर्यं भजति तत्राम्भः ॥६७॥
कुओं और बड़े-बड़े झरनोंमें वर्षाऋतुमें अधिक जल इकट्ठा
हो जानेसे वह खारा हो जाता है, किन्तु ग्रीष्मऋतुमें सूखकर
अल्प परिमाणमें रह जानेपर उनका जल मीठा हो जाता है !
तद्वद्विषयोद्रिक्तं तमःप्रधानं मनः कलुषम् ।
तस्मिन्विरागशुष्के शनकैराविर्भवेत्सत्त्वम् ॥६८॥
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