प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 26, कुल 86 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रबोधसुधाकर
विषयेन्द्रिययोर्योगे निमेषसमयेन यत्सुखं भवति ।
विषये नष्टे दुःखं यावज्जीवं च तत्तयोर्मध्ये ॥६१॥
हेयमुपादेयं वा प्रविचार्य सुनिश्चितं तस्मात् ।
अल्पसुखस्य त्यागादनल्पदुःखं जहाति सुधीः ॥६२॥
विषय और इन्द्रियोंका संयोग होनेपर पुरुषको पलभरके
लिये जो सुख होता है, विषयके नष्ट होनेपर वही यावज्जीवन
दुःखरूप हो जाता है; अतः इन दोनोंमें त्याज्य और ग्राह्यका
भलीभाँति विचार करके यह निश्चय हुआ कि यदि बुद्धिमान्
पुरुष अल्प सुखकी वासना छोड़ दे तो वह बड़े भारी दुःखका
अन्त कर देता है ।
धीवरदत्तमहामिषमश्नन्वैसारिणो म्रियते ।
तद्वद्विषयान्भुञ्जन्कालाकृष्टो नरः पतति ॥६३॥
धीवरद्वारा काँटेमें लगाकर डाले हुए थोड़े-से मांसको खानेसे
मछलीको प्राण-त्याग करना पड़ता है, इसी प्रकार विषयोंका सेवन
करता हुआ पुरुष कालके जालमें पड़कर नष्ट हो जाता है ।
उरगग्रस्तार्धतनुर्भैकोऽश्नातीह मक्षिकाः शतशः ।
एवं गतायुरपि सन्विषयान्समुपार्जयत्यन्धः ॥६४॥
सर्पके द्वारा आधा निगल लिये जानेपर भी मेंढक सैकड़ों
मक्खियोंको खाता रहता है, इसी प्रकार तृष्णान्ध पुरुष अवस्थाके
ढल जानेपर भी विषय-सेवन करता ही रहता है ।
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