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सर्वकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

Prabandhachintamani of Acharya Merutunga

आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 181 में से

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पृष्ठ 52

प्रकरण ३७ ] मुञ्जराज प्रबन्ध [ २९
[ ३२ ] हे स्वामिन् ! यह महेता (महत्तम=महामात्य) विनति करता है कि-अब हमारा यह आखिरी
जुहार (नमस्कार) हो। हमें [जानेका] आदेश हो। क्यों कि हम तुम्हारे सिरपर राख
पड़ती देख रहे हैं।
इस प्रकार मंत्रीके निषेध करने पर भी वह सेनाके साथ चला ।]
[मंत्रीने आखिरमें कहा कि-] गोदावरी नदीको सीमा मान उसे लाँघकर आगेप्रयाण न कीजियेगा।
इस प्रकार मंत्रीने शपथ देकर आगे न जानेके लिये रोका था; तथापि मुञ्ज ने यह विचार कर कि पहले छ
बार उसे जीता है, जोशमें आकर उस नदीको पार करके, सामने किनारे जाकर पड़ाव डाला। रुद्रादित्य ने
जब राजाके उस वृत्तान्तको सुना, तो उसकी अविनयशीलताके कारण कोई भारी विपद आनेवाली है, यह
सोचकर स्वयं चिताग्निमें प्रवेश किया। इसके अनन्तर तैलपने छल और बलसे उसकी सेनाको तितर-बितर
कर मुञ्जराजाको गिरफ्तार कर लिया और मूंजकी रस्सीसे बाँध उसे कारागारमें बन्द कर दिया। काठके
पिंजड़ेमें उसे रक्खा गया था और राजा तैलपकी बहन मृणालवती उसकी परिचर्या करती रहती थी।
मुञ्जका उसके साथ पत्नीका-सा स्नेह सम्बन्ध हो गया। उधर पीछे रहे हुए उसके मंत्रियोंने एक सुरंग
खुदवाई और उसके जरिये मुञ्ज को संकेत करवाया। इतनेमें, एक बार जब वह दर्पणमें अपना प्रतिबिंब देख
रहा था, तो उसी समय मृणालवती, अनजानमें, पीछे आ खड़ी हुई। उसने भी दर्पणमें अपने बुढ़ापेके जर्जर
मुखको देखा और फिर देखा कि युवक मुञ्जराज के मुँहके पास उसका मुँह अत्यन्त मद्दा दिखाई दे रहा
है। इसलिये उसे उदास होते देख मुञ्ज ने कहा-
३६. मुञ्ज कहता है कि-ऐ मृणालवती ! गये हुए यौवनको झुरो मत; यदि सकरकी डली पीसी जा
कर सैकड़ों टुकड़ोंमें छिन्न भिन्न हो जाय, तो भी वह मीठी चूर ही लगती है।
इस प्रकार कह कर [उसे शान्त बनानेका प्रयत्न किया], बादमें अपने स्थानको जानेकी इच्छा-
वाला होते हुए भी मृणालवतीका विरह वह नहीं सह सकता था, और भयसे उसे वह वृत्तान्त भी कह
नहीं सकता था। बार बार [मृणालवती के] पूछनेपर भी, अपनी चिन्ता न कह सका। बिना नमककी और
अधिक नमक दी हुई रसोई खाकर भी जब वह उसका स्वाद नहीं जान सका तो, मृणालवती ने अत्यंत आग्रह
और प्रेमपूर्वक पूछा; तब बोला कि मैं इस सुरंगके रास्ते अपने घर जानेवाला हूँ। यदि तुम भी यहाँ चलो
तो मैं तुम्हें पटरानीके पदपर अभिषिक्त करके अपने प्रसादका फल दिखाऊं। इसपर उसने कहा कि क्षणभर
प्रतीक्षा करो; तब तक मैं अपने गहनोंकी सन्दूक ले आऊ। यह कहकर उस कात्यायिनी (ढलती उमरकी
विधवा) ने सोचा कि यह वहाँ जाकर मुझे छोड़ देगा, अपने भाई राजासे वह वृत्तान्त जाकर कह दिया। इस
पर वह राजा, उसकी विशेष विडम्बना करनेके लिये, उसको बन्धनमें बाँधकर प्रतिदिन भिक्षाटन कराने लगा।
वह घर घर घूमता हुआ, खिन्न होकर उदासीके इन वचनोंको बोला करता। जैसे कि-
३७. वे नर मूर्ख है जो स्त्रीपर विश्वास करते हैं; जिस स्त्रीके चित्तमें सौ, मनमें साठ, और हृदयमें बचीस
आदमी बसा करते हैं।
और भी-
३८. यह मुञ्ज जो इस प्रकार रस्सीमें बन्धा हुआ बंदरकी तरह घुमाया जा रहा है, वह बचपन-ही-में
झोलीके टूट जानेसे गिरकर क्यों न मर गया, या आगमें जल कर राख क्यों न हो गया।
तब किन्ही सज्जन पुरुषोंने दिलासा देते हुए कहा कि-