प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)
Prabandhachintamani of Acharya Merutunga
आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश
उतार कर फिरसे वैसे चढ़ा देते थे । इस प्रकार दो तीन बार कराया । प्रसन्न होकर राजा सीम्बलका भी
इसी प्रकारका मर्दन करवाने लगा । उसके अंगोंके उतार लेनेपर जब वह निश्चेष्ट हो गया तो आँखें निकलवा
लीं । [क्योंकि] सुसज्जित अवस्थामें तो उसकी आँख निकालनेमें कौन समर्थ हो सकता था ? । अतः इस
प्रकार मुञ्जने उसकी आँखें निकलवा लीं और फिर उसे काठके पींजरेमें बंद करा दिया । उसके भोज नामक
पुत्रका जन्म हुआ । उस पुत्रने सभी शास्त्रोंका खूब अभ्यास किया । छत्तीस प्रकारके आयुधोंका आकलन कर, बहत्तर
कलारूपी समुद्रका पारगामी बना । इस तरह सभी लक्षणोंसे युक्त होकर वह बड़ा होने लगा । उसके जन्म
समय किसी निमित्तज्ञ ज्योतिषीने जन्मकुण्डली बना कर दी [ जिसमें लिखा था कि-]
३४. पचपन वर्ष, सात मास, तीन दिनतक भोजराजा गौड़ देशके साथ दक्षिणापथका भोक्ता होगा ।
इस श्लोकके अर्थको जब मुञ्जराजने समझा, तो सोचा कि इसके रहनेपर मेरे लड़केको राज्य नहीं होगा;
इस आशंकासे उसने भोजको, वध करनेके लिये अन्त्यजोंके सुपुर्द किया । उन्होंने रातको उसकी मधुर मूर्ति
देखकर, अनुकम्पाके साथ कांपते हुए कहा कि-अपने इष्ट देवताको याद करो । इसपर भोजने निम्नलिखित
'काव्य, पत्रपर लिखकर, मुञ्जराजको देनेके लिये समर्पण किया ।
३५. सत्ययुगके अलंकारके समान वह राजा मान्धाता चला गया । जिस रावणके शत्रु रामचन्द्रने
महासागरमें सेतु बांधा था वह भी आज कहां है ? और फिर युधिष्ठिर प्रभृति अनेक राजा जो
आपके समय तक हो गये हैं, सब चले गये; पर यह पृथ्वी किसीके भी साथ नहीं गई । पर मैं
समझता हूं, तुम्हारे साथ तो जायगी ।
राजा उसे पढकर मनमें अत्यन्त खिन्न हुआ और बालहत्या करनेवाले अपने आपकी निन्दा करने लगा ।
[ २७ ] हाय, हे भोज ! मरण कालमें कहा हुआ तुम्हारा काव्य हृदय वेध रहा है । दौर्भाग्यके स्थान
समान मुझ पापी, दुष्टको तुम्ही शरण हो ।
[ २८ ] हे गुणागार भोज ! तुझ बिना इस राज्यसे मुझे क्या काम है ? अरे कोई चिता सजा दो, ता-
किं मैं मरकर जाकर भोजसे मिलूं ।
तब मंत्रियोंने राजाको प्रबोधित करते हुए यह वाक्य कहा-
[ २९ ] हे स्वामिन् ! यह अति अज्ञान सूचक है जो इस तरह अब आप बोल रहे हैं । जानना
वही प्रमाण है जो ऐसी कदर्थनाका कारण न हो ।
—इस प्रकार बारंबार प्रलाप करने लगा । ]
३७) बादमें, उनके पाससे अत्यन्त आदरके साथ बुलवाकर उसे युवराजकी पदवी देकर सम्मानित
किया । तैलप देव नामक तैलङ्ग देशके राजाने सेना भेज कर उस (मुञ्ज) पर आक्रमण किया ।
उस समय रुद्रादित्य नामक महामंत्री रोगग्रस्त था; उसके बारंबार निषेध करनेपर भी मुञ्जने उसके ऊपर
चढ़ाई करना चाहा । [ मंत्रीने कहा-
[ ३० ] हे महाराज ! हमारी सीख मान लीजिये, अवहेला न कीजिये । तुम्हारे उधर चले जानेपर
इस (मुञ्ज) मंत्रीको भीख माँगनी पड़ेगी ।
[ ३१ ] तुम्हारे बैठे रहनेपर और मेरे डाँघ (चले) जानेपर राजाका राज्य रुक जायगा । ऐसा
होनेपर बड़ा ही अकाज होगा और उसकेलिये तुम माउनके धनी जानो ।